जबलपुर। मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर सियासत गर्म है। हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद राज्य की मोहन यादव सरकार की चौतरफा आलोचना हो रही है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने भी ओबीसी आरक्षण को लेकर राज्य सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं। तन्खा ने आरोप लगाया कि सरकार ने हाईकोर्ट में आरक्षण के पक्ष में मजबूती से दलीलें नहीं रखीं और न ही जरूरी आंकड़े पेश किए।

विवेक तन्खा ने कहा कि अब सरकार को सुप्रीम कोर्ट में तथ्यों और आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। शनिवार को एक दिवसीय दौरे पर जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के जरिए ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया था। हालांकि, इसे अदालत में डिफेंड करने की जिम्मेदारी भाजपा सरकार की थी, क्योंकि बाद में कांग्रेस की सरकार चली गई और भाजपा सत्ता में आ गई।

राज्यसभा सांसद तन्खा ने कहा कि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने स्पष्ट किया था कि सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50% होती है। इससे अधिक आरक्षण देने के लिए सरकार को असाधारण परिस्थितियों के समर्थन में मात्रात्मक आंकड़े (क्वांटिफायबल डेटा) प्रस्तुत करने होते हैं।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से लगता है कि सरकार पर्याप्त आंकड़े पेश नहीं कर पाई। यदि जरूरी आंकड़े प्रस्तुत किए जाते, तो संभव है कि फैसला अलग होता। अब सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प है। तन्खा के मुताबिक, आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए असाधारण परिस्थितियां साबित करना और पर्याप्त आंकड़े पेश करना जरूरी होगा।

तन्खा ने कहा कि राजनीतिक दल स्वयं इस तरह की याचिका दायर नहीं कर सकते। पार्टी के पदाधिकारी अपनी ओर से पक्ष रख सकते हैं, हस्तक्षेप कर सकते हैं या कानूनी लड़ाई में समर्थन दे सकते हैं, लेकिन अध्यादेश का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। संबंधित तथ्य और आंकड़े भी सरकार के पास ही होते हैं।