जिस रील को बना कर आईएएस-आईपीएस अफसर देश-दुनिया में मशहूर हो रहे हैं, वही आदत उनके लिए सार्वजनिक रूप से फजीहत का कारण बन रही है। मामला सीएम डॉ. मोहन यादव और फिर सीएम अनुराग जैन की ऑनलाइन समीक्षा मीटिंग का है। जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कलेक्टर-एसपी के साथ ऑनलाइन मीटिंग में कामकाज की समीक्षा कर रहे थे। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर सुझाव जुटाने के लिए सीएम अधिकारियों को निर्देश दे रहे थे। तब ही मुख्य सचिव अनुराग जैन ने दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े और एसपी सूरज कुमार वर्मा मोबाइल देखते देख लिया। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘इतना क्या जरूरी है कि आप लगातार मोबाइल पर व्यस्त हैं? बैठक की गंभीरता समझिए।’
सीएस अनुराग जैन को नाराज होता देख सीएम डॉ. मोहन यादव ने भी कहा, देख रहा हूं कि यूसीसी पर इंदौर, जबलपुर, सीधी, गुना, डिंडोरी और खंडवा के कलेक्टर ही बात कर रहे थे। नहीं बोलने वाले भी स्क्रीन पर दिख रहे हैं। यूसीसी में कई जिलों ने कुछ नहीं किया। सरकार को ढाई साल हो गए हैं। अगले ढाई साल फील्ड पर वही अफसर रहेगा, जिसकी परफॉर्मेंस ठीक हो।
इसके बाद हुई कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस में अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सचिव अनुराग जैन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जअ वरिष्ठ अधिकारी बात करें तो मोबाइल दूर रखें या स्विच ऑफ कर दें। इंदौर के एक काम गड़बड़ी पर सीएस अनुराग जैन ने फटकार लगाते हुए कहा कि आजकल कई कलेक्टरों का अपने विषय पर फोकस कमजोर दिखता है। बड़े एग्जाम पास कर लेना काफी नहीं, विषय का ज्ञान भी जरूरी है।
पंद्रह दिनों में दो बार मोबाइल कलेक्टर और एसपी के लिए फटकार का कारण बन गया। मनोचिकित्सकों के अनुसार बार-बार मोबाइल चेक करना मनोरोग बनता जा रहा है। संभव है रील बना कर ख्यात होने वाले अफसरों के साथ भी ऐसा हो रहा है। वे भूल जाते हैं कि सीएम या सीएस की बैठक में हैं और हाथ बार-बार फोन की तरफ चला जाता है।
सरकार का सिरदर्द दूर करने के लिए नया अफसर
खनन सहित अन्य विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय अनुमति देने वाली संस्था स्टेट एन्वायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (सिया) के चेयरमैन रिटायर्ड आईएएस शिवनारायण सिंह चौहान और आईएएस अफसरों के बीच जारी विवाद डेढ़ साल से सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। सिया के चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान और एप्को डायरेक्टर व सिया सचिव उमा आर माहेश्वरी के बीच पर्यावरणीय मामलों में स्वीकृति देने की बैठक न बुलाने का विवाद एफआईआर दर्ज कराने तक पहुंच गया था। सदस्य सचिव आर. उमा महेश्वरी के अवकाश पर होने के दौरान तत्कालीन प्रभारी सदस्य सचिव श्रीमन शुक्ला ने पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत मोहन कोठारी के संज्ञान से 237 प्रोजेक्टस को अनुमति दे दी थी। इससे नाराज हो कर सिया चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान ने केंद्र को पत्र भी लिखा था। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत एम. कोठारी और अपर सचिव उमा माहेश्वरी को हटा दिया था।
लेकिन इसके बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ। हर बार कोई न कोई मुद्दा सुर्खियों में छा जाता है। सरकार ने पर्यावरण विभाग का एसीएस बदल दिया है। अब एससीएस अशोक वर्णवाल की जगह आईएएस अनिरुद्ध मुखर्जी को पर्यावरण विभाग का प्रभार दिया गया है। इस जमावट के पीछे सरकार की यह उम्मीद है कि आईएएस अनिरूद्ध मुखर्जी शायद यह विवाद सुलझा पाएं। इस आस के पीछे आईएएस अनिरूद्ध मुखर्जी की छवि है। माना जा रहा है कि वे रिटायर्ड आईएएस शिवनारायण सिंह चौहान के साथ उनकी ही शैली में संतुलन स्थापित कर पाएंगे।
यूपी के मंत्री के निशाने पर एमपी के एक आईएएस
मध्य प्रदेश के एक आईएएस अफसर उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का कारण बन गए हैं। योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर गंभीर आरोप लगाते हुए एमपी के आईएएस भरत यादव का जिक्र किया है। एमपी के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर जमीन खरीदी के आरोप लगने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि यादव होने के कारण सीएम मोहन यादव को फंसाया जा रहा है। इस पर मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स' पर लिखा कि 'अखिलेश जी! एमपी कैडर के आईएएस भरत यादव से अपना रिश्ता छिपा लिया। अखिलेश जी भरत यादव आपके 'कुबेर' चंद्रपाल यादव के दामाद हैं। चंद्रपाल यादव सपा के कद्दावर नेता और पार्टी कोषाध्यक्ष रहे हैं। उम्मीद है कि आपको याद आ गया होगा।
गौरतलब है कि आईएएस भरत यादव फिलजाल राज्य सड़क विकास निगम में पदस्थ है। कुछ माह पहले वे सीएम सचिवालय में थे। आईएएस भरत यादव को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने सचिवालय से हटाया था तब वे सीएम के सबसे विश्वस्त अफसरों में शुमार होते थे। अब जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव नए आरोपों से घिरे हैं तब भी उनके करीबी रहे आईएएस भरत यादव चर्चा में हैं और इस बार विपक्ष नहीं, बीजेपी सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ही उनके बहाने सपा अध्यक्ष अखिलेश को घेर रहे हैं।
कलेक्टर बने डॉक्टर, ब्राडिंग पर उठे सवाल
झाबुआ के नए-नए कलेक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट प्रदेश के अन्य कलेक्टर साथियों की तरह नवाचार करने का जतन कर रहे हैं। कोशिश की जाती है कि उनके कामों को वायरल कर बेहतर अफसर के रूप में ब्रांडिंग की जाए। लेकिन, ऐसा करते-करते वे आलोचना का केंद्र भी बन रहे हैं। गुजरे सप्ताह वे निरीक्षण करने झाबुआ जिले के पिटोल के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे थे। उन्होंने पाया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम ड्यूटी पर गए हुए थे। ओपीडी में मरीजों और गर्भवती महिलाओं की लंबी कतार लगी थी। तब कलेक्टर के भीतर का एमबीबीएस रूप जागा औन उन्होंने खुद डॉक्टर की कुर्सी संभाली और मरीजों का इलाज शुरू कर दिया।
जनसंपर्क विभाग ने अपने मुखिया की छवि चमकाने के लिए तस्वीरें तुरंत वायरल कर दी। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों सहित अन्य को टैग कर खबर को पोस्ट किया गया। कलेक्टर की इस ब्रांडिंग मजेदार कमेंट हुए। कई लोगों ने तारीफ की तो कई ने पब्लिसिटी स्टंट करार दिया। किसी ने इसे बस एक दिन की मानव सेवा कहते हुए वाह-वाही लूटने का तरीका कहा। एक पाठक ने टिप्पणी की है कि ये डॉक्टरी करेंगे तो कलेक्टोरेट में कौन बैठेगा, वहां के पेंडिंग काम कौन करेगा? एक यूजर्स ने कहा कि प्रशासन करो साहब, फालतू के ढकोसले नहीं। जो आपका काम है वही ठीक तरह से करें तो ज्यादा सही होगा। एक यूजर्स ने तो सलाह दे दी कि ऐसे लोग सरकार में मंत्री होने चाहिए।