जीवन में एक उम्र ऐसी आती है, जब आदमी के पास पीछे मुड़कर देखने के लिए बहुत कुछ होता है। बीते वर्षों की स्मृतियां, हासिल की हुई मंजिलें, संघर्षों के निशान और थककर ठहर जाने के पर्याप्त कारण। ऐसे समय में यदि कोई फिर से एक लंबा रास्ता चुनता है, अपने कदमों को कठिन यात्रा के हवाले करता है और मंजिल तक पहुंचने का संकल्प लेकर निकल पड़ता है, तो उस फैसले को केवल एक कार्यक्रम कहकर नहीं टाला जा सकता। उसके पीछे जरूर कोई ऐसी बेचैनी होती है, जो आराम से बड़ी और उम्र से ज्यादा मजबूत होती है।

दिग्विजय सिंह 20 अक्टूबर, 2026 को उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ शुरू करने जा रहे हैं। पार्थिव शिवलिंग का निर्माण और पूजन करने के बाद उनकी यात्रा ओरछा होते हुए अयोध्या पहुंचेगी। करीब एक हजार किलोमीटर की यह पदयात्रा उनके लिए एक लंबा शारीरिक इम्तिहान भी होगी। लेकिन इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष इसकी दूरी नहीं, वह उम्र है जिसमें उन्होंने इतनी लंबी दूरी पैदल तय करने का संकल्प लिया है।

उम्र के इस पड़ाव पर जब बहुत से लोग अपनी दिनचर्या को सुविधाओं के अनुरूप समेटने लगते हैं, दिग्विजय सिंह ने अपने लिए फिर एक कठिन रास्ता चुना है। यह रास्ता आसान नहीं होगा। लंबे दिन, लगातार चलते रहने की चुनौती, शरीर की थकान और हर रोज फिर से उठकर आगे बढ़ने का अनुशासन। पदयात्रा केवल पैरों की ताकत नहीं मांगती, मन की दृढ़ता भी परखती है। रास्ते पर निकलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है अगले दिन फिर उसी संकल्प के साथ उठ खड़े होना।

दिग्विजय सिंह के लंबे सार्वजनिक जीवन को देखने का एक प्रचलित तरीका है, उन्हें उनके राजनीतिक परिचय के भीतर रखकर देखना। उनके समर्थक हैं, आलोचक हैं, उनके विचारों से सहमति और असहमति रखने वाले लोग हैं। यह सब सार्वजनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। मगर किसी व्यक्ति को उसके परिचय के एक ही खाने में रख देने से उसके व्यक्तित्व की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। राजनीति से परे भी मनुष्य की अपनी आस्थाएं होती हैं, कुछ विश्वास होते हैं, कुछ ऐसे आग्रह होते हैं जिन्हें वह समय बीतने के साथ छोड़ नहीं पाता। दिग्विजय सिंह की इस यात्रा को समझने के लिए उनके इसी पक्ष पर नजर डालनी चाहिए।

उज्जैन से यात्रा आरंभ करने का निर्णय अपने आप में भावपूर्ण है। महाकाल की नगरी में शिव आराधना के बाद पैदल निकलना, फिर बुंदेलखंड की आस्था के केंद्र ओरछा से होते हुए अयोध्या तक पहुंचना। इस मार्ग में मध्य भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियां एक साथ आती हैं। इन स्थानों के बीच की दूरी किलोमीटर में नापी जा सकती है, लेकिन लोगों की आस्था को किसी पैमाने में नहीं बांधा जा सकता। मंदिरों में प्रार्थना करते लोग, रास्तों पर मिलने वाले ग्रामीण, छोटी बस्तियों के साधारण घर और अपने विश्वास में डूबे चेहरे, पैदल यात्रा का अनुभव इन्हीं मुलाकातों से बनता है।

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दिग्विजय सिंह ने अपनी यात्रा के पीछे सनातन धर्म के नाम पर चंदा चोरी करने के आरोपों के विरुद्ध आवाज उठाने की बात कही है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद को निशाने पर लिया है। इन आरोपों पर अलग से तथ्य और बहस की जरूरत है। लेकिन इस पूरे प्रसंग में एक बड़ा सवाल भी मौजूद है—धर्म के नाम पर सार्वजनिक जीवन में जो कुछ कहा और किया जाता है, उसकी कसौटी क्या होनी चाहिए? आस्था मनुष्य का निजी और गहरा भाव है। उसका सम्मान तभी बना रहता है, जब उसके नाम पर किए जाने वाले दावों और कार्यों की जवाबदेही भी बनी रहे। किसी धार्मिक प्रतीक का इस्तेमाल करना और उस आस्था के प्रति ईमानदार होना, दो अलग बातें हैं।

इस सवाल पर सहमति-असहमति हो सकती है। यही स्वाभाविक भी है। लेकिन दिग्विजय सिंह के इस निर्णय को केवल उनके विरोध के स्वर में समेट देना भी उनकी यात्रा के एक महत्वपूर्ण पहलू को अनदेखा करना होगा। उन्होंने अपने विचार को सामने रखने के लिए एक ऐसा माध्यम चुना है, जिसमें समय देना होगा, परिश्रम करना होगा और लगातार आगे बढ़ना होगा। पदयात्रा में कोई रास्ता एक छलांग में पार नहीं होता। हर दिन की दूरी अपने पैरों से तय करनी पड़ती है। शायद इसी वजह से पैदल यात्राओं का अपना एक अलग चरित्र होता है। वे घोषणा से आगे बढ़कर उसे श्रम में बदल देती हैं।

दिग्विजय सिंह के जीवन में पद, प्रतिष्ठा और सत्ता का अनुभव रहा है। उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई है और दशकों तक सार्वजनिक जीवन के उतार-चढ़ाव देखे हैं। ऐसे लंबे सफर में समय बहुत कुछ बदल देता है। चेहरे बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं, साथ चलने वाले लोग बदलते हैं और एक समय की बड़ी घटनाएं भी धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन कुछ लोगों के भीतर अपने विश्वास को लेकर एक जिद बची रहती है। वह जिद उन्हें बार-बार लोगों के बीच ले जाती है, नए संघर्ष के लिए तैयार करती है और उम्र के साथ भी उनके कदमों को विराम नहीं लेने देती।

दिग्विजय सिंह की इस यात्रा में मुझे सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यही लगती है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसके जीवन में सार्वजनिक जिम्मेदारियों और अनुभवों के कई दशक जुड़ चुके हैं, वह फिर एक लंबी पदयात्रा की तैयारी कर रहा है। उसे मालूम है कि रास्ता कठिन होगा। उसे यह भी मालूम है कि इस यात्रा को लेकर तरह-तरह की व्याख्याएं होंगी। फिर भी वह निकलने का निर्णय ले रहा है। यह दृढ़ता अपने आप में उल्लेखनीय है।

हम अक्सर किसी व्यक्ति की उम्र का हिसाब उसके वर्षों से लगाते हैं, उसके काम करने की गति से नहीं। जबकि उम्र का एक अर्थ यह भी है कि इतने वर्षों के बाद किसी व्यक्ति के भीतर कितना उत्साह बचा है, वह अपने विश्वास के लिए कितना परिश्रम करने को तैयार है और क्या उसके भीतर अब भी कुछ ऐसा है, जिसके लिए वह अपनी सुविधा छोड़ सकता है। इस कसौटी पर देखें तो दिग्विजय सिंह की पदयात्रा एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है।

हो सकता है, इस यात्रा को लेकर उनकी सोच से हर कोई सहमत न हो। यह भी संभव है कि लोग इसके उद्देश्य पर सवाल उठाएं। लोकतंत्र में किसी यात्रा को सम्मान देने के लिए उसके हर विचार से सहमत होना जरूरी नहीं है। किसी के संकल्प को समझना और उसके विचारों का समर्थन करना अलग-अलग बातें हैं। असहमति के बीच भी किसी व्यक्ति के परिश्रम, साहस और इच्छाशक्ति को देखा जा सकता है। यही दृष्टि सार्वजनिक जीवन को व्यक्तियों की छवियों से आगे जाकर समझने में मदद करती है।

20 अक्टूबर को जब दिग्विजय सिंह महाकाल की नगरी से कदम बढ़ाएंगे, तब उनके सामने करीब एक हजार किलोमीटर का रास्ता होगा। उस रास्ते को पूरा करने के लिए केवल शुरुआती उत्साह पर्याप्त नहीं होगा। हर सुबह नया धैर्य चाहिए होगा, हर पड़ाव के बाद फिर चलने की तैयारी करनी होगी। यात्रा का असली अर्थ भी शायद वहीं खुलता है, जब आरंभ का उत्साह पीछे छूट जाता है और आगे बढ़ने के लिए केवल संकल्प का सहारा रह जाता है।

दिग्विजय सिंह की इस यात्रा का मूल्यांकन समय करेगा। इसके उद्देश्य पर बहस होगी, इसके संदेश की व्याख्या होगी और इसकी मंजिल तक पहुंचने की प्रतीक्षा भी रहेगी। लेकिन इस यात्रा की शुरुआत में ही एक बात दर्ज की जानी चाहिए कि उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने अपने लिए आराम का रास्ता नहीं, श्रम का रास्ता चुना है।

आखिर जीवन में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि वे कहां पहुंचे। उनकी पहचान इस बात से भी बनती है कि वे कितनी बार फिर चलने के लिए तैयार हुए। दिग्विजय सिंह की कहानी का यह अध्याय उसी तैयारी का है।

महाकाल के आंगन से अयोध्या तक जाने वाला रास्ता उनके लिए एक हजार किलोमीटर लंबा है। लेकिन उस रास्ते पर निकलने का निर्णय एक छोटी-सी बात याद दिलाता है। मनुष्य जब तक अपने भीतर किसी विश्वास को जीवित रखता है, तब तक उसके जीवन में आगे बढ़ने की गुंजाइश बनी रहती है। और दिग्विजय सिंह के कदमों में अभी एक लंबा सफर बाकी है।   

(लेखक केके मिश्रा मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के मीडिया सलाहकार हैं।)