केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया बीते दिनों तीन बार वायरल हुए। इनमें से दो बार वे आलोचना और ट्रोल के शिकार भी हुए। पहला मामला, ग्वालियर में शीतला माता मंदिर के दर्शन के लिए जा रहे श्रद्धालुओं को ट्रक से कुचले जाने की घटना के बाद का है। इस हादसे में 15 लोगों की मौत के बाद केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया घायलों का हाल जानने ट्रॉमा सेंटर पहुंचे थे। उनके दौरे से पहले अस्पताल में ग्रीन कार्पेट बिछा दिया गया। केवल ग्रीन कार्पेट ही नहीं बिछाया गया था बल्कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पहुंचने से पहले अस्पताल परिसर में खास साफ-सफाई की गई। टूटी टाइल्स और गड्ढों को सीमेंट-रेत से भरा गया। जब यह बात मीडियाकर्मियों ने देखी और पता किया कि ग्रीन कार्पेट किसके लिए बिछाया जा रहा है तो अस्पताल के कर्मचारियों ने बताया कि केंद्रीय मंत्री सिंधिया आने वाले हैं इसलिए ऊपर से आदेश आया है। 

एक तरफ अस्पताल में हादसे के घायलों परिजन परेशान थे और उस पर ग्रीन कार्पेट देख कर परिजनों में आक्रोश देखा गया। यही कारण है कि दौरे के बाद जब केंद्रीय मंत्री सिंधिया मीडिया से रूबरू हुए तो उनसे कार्पेट पर सवाल पूछ लिया गया। सवाल सुन कर सिंधिया भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि मैं ग्वालियर का हूं। मेरे लिए कार्पेट की क्या जरूरत है। यह क्या तमाशा है? 

मगर राजशाही शैली के लिए सिंधिया आलोचना से तो घिरे ही। इस घटना के अगले ही दिन वे फिर सामंतवादी प्रथा के पालन के कारण ट्रोल हुए। विजयादशमी के अवसर पर शमी पूजन कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र वितरित हुए तो सिंधिया निशाने पर आ गए। असल में यह आमंत्रण पत्र सचिव श्रीमंत महाराजा सिंधिया के नाम से भेजा गया। कार्यक्रम में भी केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पुत्र महाआर्यमन सिंधिया के साथ राजशाही की वेशभूषा में शामिल हुए। कई लोग उनके पैर छूत हुए दिखाई दिए। इस पर भी आलोचना हुई कि लोकतंत्र में राजशाही के प्रतीकों से मुक्ति मिलनी चाहिए।

जबकि केंद्रीय मंत्री सिंधिया एक दिन पहले ही अशोकनगर की यात्रा के दौरान बैलगाड़ी की सवारी करते हुए तथा गरबा आयोजन में डांडिया खेलते हुए दिखाई दिए थे। उनके ये कार्य खुद को श्रीमंत नहीं बल्कि आम नागरिक की तरह पेश आने के जतन हैं। मगर इसके विपरित वे श्रीमंत की छवि के कारण ही दो बार नकारात्मक टिप्पणियों से घिरे। 

पहले राम का हरण हुआ फिर पोस्ट का 

विजयादशमी पर सभी जगह बुराई के प्रतीक रावण पर राम के विजय का जश्न मनाया गया लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति राम के हरण के कारण गरमा गई। इसकी वजह बना आईएएस का तबादला और उस पर बीजेपी के विधायक व पूर्वमंत्री अजय विश्नोई की पोस्ट। रविवार रात को जबलपुर नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार का ट्रांसफर भोपाल किया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पाटन से बीजेपी विधायक अजय विश्नोई ने सोशल मीडिया पर लिखा कि दशहरे के दिन जबलपुर के राम का हरण हो गया।

आईएएस की तुलना भगवान राम से करना कांग्रेस को नागवार गुजरा। कांग्रेस ने बीजेपी विधायक अजय विश्नोई के बयान पर आपत्ति जताई। विवाद हुआ तो अजय विश्नोई ने पोस्ट हटा दी। यानी बकौल अजय विश्नोई दशहरे पर जबलपुर से राम का हरण हुआ और विवाद होने पर पोस्ट का हरण हो गया। 

हालांकि, अजय विश्नोई ने अपन सरकार को घेरा जरूर। उनका सवाल मौजू हैं कि अच्छे अधिकारी को क्यों नहीं टिकने दिया जाता है। नगर निगम कमिश्नर रामप्रकाश अहिरवार यदि काबिल नहीं थे तो भोपाल नगर निगम कमिश्नर की जिम्मेदारी क्यों दी? और अगर काबिल थे तो जबलपुर से एक योग्य अफसर छीन क्यों लिया? 

आखिर बीजेपी विधायक को यह हुआ क्या है? 

मध्यप्रदेश में जब नवरात्रि के धार्मिक अनुष्ठान हो रहे तब एक बयान ने धर्म की राजनीति में एक आहूति दे दी। सिरोंज से बीजेपी विधायक उमाकांत शर्मा की एक सोशल मीडिया पोस्ट धार्मिक टिप्पणी के कारण चर्चा  में आई। बीजेपी विधायक उमाकांत शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करते हुए सनातन धर्म के परिवारों से अपील की कि वे अपने बच्चों को क्रिश्चियन मिशनरी स्कूलों और मदरसों में न पढ़ाएं। उनकी यह अपील तेजी से वायरल हुई। विधायक उमाकांत शर्मा की पोस्ट पर कांग्रेस ने प्रतिक्रिया दी कि एक तरफ बीजेपी क्रिश्चियन स्कूलों और मदरसों को निशाना बना रही है, वहीं दूसरी ओर खुद सत्ताधारी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के बच्चे कॉन्वेंट और महंगे क्रिश्चियन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं।  

कांग्रेस ने सिरोंज विधायक की इस अपील को पूरी तरह गलत और समाज में वैमनस्य फैलाने वाला बताया है। उमाकांत शर्मा ने इस पर कोई टिप्पणी तो नहीं की लेकिन सिरोंज में बच्चों की कम उपस्थिति को देखते हुए 11 मदरसों को बंद करने के आवेदन भी चर्चा में आ गए। इसतरह, विधायक उमाकांत शर्मा ने इस पोस्ट के जरिए हिंदुत्व की अपनी छवि को चमका लिया। 

नए संगठन महामंत्री का एजेंडा, पोल खोल अभियान  

बीजेपी के नए संगठन महामंत्री चंद्रशेखर तिवारी ने पार्टी की सबसे दुखती रग पर हाथ रख दिया है। बीजेपी अंदरूनी सिर फुटव्वल को दूर करने के लिए संगठन महामंत्री चंद्रशेखर तिवारी विधायकों से मुलाकात कर उनकी बात सुनेंगे। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव व प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी होंगे। तय किया गया है कि बीजेपी विधायकों की ब्यूरोक्रेसी से नाराजगी को सबसे पहले सुना जाए। कार्यक्रम तय होने के बाद दो अलग-अलग चरणों में बीजेपी विधायकों को मुख्यमंत्री निवास में बुलाया जाएगा। इस बैठक में विधायकों को इतना सहज वातावरण दिया जाएगा कि वे सरकार, मंत्रियों और प्रशासनिक कामकाज पर खुल कर बात रख सकें।

इन विशेष बैठकों के दौरान मुख्यमंत्री और संगठन प्रमुख विधायकों से उनके संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्यों की प्रगति की विस्तृत रिपोर्ट मांगेंगे। कई विधायकों की शिकायत रही है कि मंत्री और कलेक्टर सहित अन्य अफसर उनकी बात नहीं सुनते हैं। शिकायतें कितनी दूर होगी, यह बात अलग है लेकिन इस कवायद से विधायकों को कम से कम अपनी बात कहने का मौका मिल जाएगा।

मध्यप्रदेश के प्रभारी नियुक्त हुए बिप्लव कुमार देब की उपस्थिति में हुई कोर ग्रुप की बैठक के बाद तो यह कवायद और भी जरूरी हो रही है। इस बैठक में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने उनके निवास पर हुए प्रदर्शन के बाद अफसरों की कार्य प्रणाली पर रोष जाहिर किया था। केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ब्यूरोक्रेसी के कामकाज पर नकारात्मक टिप्पणी की थी। इसके बाद संगठन ने अपने विधायकों में फैले असंतोष पर बात करना ही बेहतर समझा है।