भोपाल। मध्य प्रदेश में वन अधिकार कानून लागू होने के 18 साल बाद भी आदिवासियों की बेदखली और उनके साथ हिंसा का सिलसिला जारी है। जागृत आदिवासी दलित संगठन ने आरोप लगाया है कि सरकार कानून को दरकिनार कर आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर रही है। संगठन ने कहा कि प्रदेश में दो लाख से ज्यादा आदिवासियों पर बेदखली की तलवार लटक रही है, जबकि छह लाख वन अधिकार दावों में से 3.6 लाख से ज्यादा दावे खारिज किए जा चुके हैं।

संगठन ने 16 अक्टूबर को वक्तव्य जारी कर कहा कि आदिवासियों को उजाड़कर राजनीतिक हमदर्दी दिखाने के बजाय सरकार को वन अधिकार कानून, 2006 का युद्ध स्तर पर क्रियान्वयन करना चाहिए। संगठन ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीब दो दशक के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि इस दौरान भी आदिवासियों के साथ दमन जारी रहा। उनकी फसलें रौंदी जाती रही, खेतों पर कब्जा कर प्लांटेशन लगाए गए और मारपीट के साथ झूठे मुकदमों के जरिए उन्हें प्रताड़ित किया गया।

सीहोर जिले की बुधनी तहसील के कोसमी गांव में आदिवासियों को बेदखल किए जाने की घटना को संगठन ने सरकारी अन्याय का ताजा उदाहरण बताया। संगठन के मुताबिक, मामला सामने आने के बाद मुख्यमंत्री ने प्रभावित आदिवासियों को आश्वासन दिया, लेकिन प्रदेश के आदिवासी समुदाय पिछले दो दशकों से ऐसे आश्वासन सुनते आ रहे हैं। संगठन ने सवाल उठाया कि कुछ परिवारों को राहत देने की घोषणा से प्रदेश के लाखों आदिवासियों की समस्याएं कैसे दूर होंगी।

JADS ने कहा कि पिछले साल बारिश के दौरान देवास जिले के खिवनी अभयारण्य में उजड़े आदिवासी परिवार एक साल बाद भी आश्वासनों पर कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं। बुरहानपुर की बलड़ी पंचायत, खंडवा के भिलाईखेड़ा समेत बुरहानपुर, दमोह, मंडला और डिंडोरी के आदिवासी क्षेत्रों में भी बेदखली और हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

संगठन ने आरोप लगाया कि एक ओर आदिवासियों को जंगल और जमीन से बेदखल किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर खनन और विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। विज्ञप्ति में केन-बेतवा परियोजना, पुनासा और सिंगरौली की धिरौली कोयला खदान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जंगलों के डूबने और खनन के लिए जमीन दिए जाने के मामलों में राजनीतिक दलों के नेता चुप रहते हैं।

संगठन ने बुरहानपुर और खंडवा में लकड़ी की कथित तस्करी का मुद्दा उठाते हुए नेताओं के साथ वन विभाग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। उसने कहा कि जंगलों की रक्षा करने में विफल रहने वाला वन विभाग आदिवासियों के खिलाफ कार्रवाई और हिंसा में शामिल रहता है।

जागृत आदिवासी दलित संगठन के हरसिंग जमरे ने कहा कि वर्ष 2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन में गलतियां स्वीकार की थीं और वन अधिकार दावों की दोबारा जांच का वादा किया था। इसके बावजूद संगठन के मुताबिक, प्रदेश में छह लाख दावों में से 3.6 लाख से ज्यादा दावे खारिज किए जा चुके हैं।

वहीं, JADS कार्यकर्ता नासरी बाई निगवाल ने कहा कि सरकार बिरसा मुंडा, टंट्या मामा और भीमा नायक जैसे आदिवासी क्रांतिकारियों के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करती है, लेकिन उनके समुदाय के लोगों को आज भी बेदखली, हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ रहा है। संगठन ने सभी राजनीतिक दलों से आदिवासियों के प्रति सांत्वना और हमदर्दी दिखाने के बजाय वन अधिकार कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की।