"तुम्हें यहां बैठे-बैठे बहुत दिन हो गए। तुमने हमारा कोई उपकार नहीं किया। मैं कहता हूँ, अब यहाँ से भागो और हमें छोड़ दो। ईश्वर के नाम पर उठो और जाओ। हमें भगवान के भरोसे छोड़ दो। तुम्हारे जाने के बाद अराजकता मचे, तो मचे, मगर तुम चले जाओ।" 

— महात्मा गांधी 

भारत छोड़ो आंदोलन के शुरू होने के कुछ महीनों पहले महात्मा गाँधी के व्यवहार में काफी विस्मयकारी परिवर्तन दिखने लगा था। उनमें व्याग्रता बढ़ती जा रही थी और उनकी वाणी में कठोरता (कटुता नहीं) प्रवेश करती जा रही थी। वे समझ चुके थे कि अब अंग्रेजों से छुटकारे को टाला नहीं जा सकता और न ही इंतजार ही किया जा सकता है। वे अराजक भारत स्वीकार करने को तैयार थे बजाए शांत मगर गुलाम भारत के। उसके करीब 84-85 बरस बाद जो बात उन्होंने तब कही थी, अनायास आज वही स्थिति दोहराती नजर आ रही है। 

पिछले एक दशक से ज्यादा का समयकाल भारतीय समाज में आगे बढ़ने के बजाए पीछे लौटता नजर आ रहा है। "जीडीपी ग्रोथ" अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने में सहायक हो सकती है मगर समाज और राष्ट्र को आगे बढ़ाने का एकमात्र जरिया नहीं हो सकती। समाज तो सामाजिक और सांस्कृतिक सद्भाव से आगे बढ़ता है। वर्तमान समय भारतीय लोकतंत्र पर भारी पड़ रहा है। 

उसी दौर में बापू ने पंडित नेहरू से कहा था, "अंग्रेजों की तानाशाही के आगे घुटने टेककर बैठ जाना आज भयानक बात होगी। इससे देश की नैतिक बल की रीढ़ टूट जाएगी। यदि देश ने अंग्रेजों के आगे घुटने टेक दिए, तो अन्य हमलावर के आगे भी घुटने ही टेकेगा। अकर्मण्यता हमें लकवे का शिकार बना देगी। कर्मठता हमारी शिराओं में शक्ति का संचार करेगी।" 

नेहरू ने शंका व्यक्त करते हुए कहा था, "नैतिक कारणों से अंग्रेजों के साथ संघर्ष चाहे जितना भी न्यायसंगत हो, किन्तु इससे युद्धोद्योग में क्या बाधा नहीं पड़ेगी और एक ऐसे मौके पर जब भारत खतरे में आ गया है?" गांधी ने जवाब दिया, "ईश्वर में विश्वास करो। हम और तुम यही तो चाहते हैं कि युद्ध का नैतिक आधार बदल दिया जाए? भारत औपनिवेशिक दासता का सबसे बड़ा प्रतीक है। अगर हमी आजाद नहीं हुए, तो दुनिया के और गुलामों के आगे क्या उम्मीद है? वैसी हालत में इस लड़ाई को लड़ा जाना व्यर्थ हो जाएगा।" और भारत ने अंग्रेजों को "भारत छोड़ो" का अल्टीमेटम दे दिया। 

आज भारत के लोकतंत्र के सामने खतरा खड़ा हो गया है और परिस्थितियां पुनः नए संघर्ष और नई रचनात्मक नैतिकता की मांग कर रही हैं। वस्तुतः चुनाव आयोग तो बहाना बना है जैसे भारत की आजादी के पहले द्वितीय विश्वयुद्ध बना था। दमनकारी सत्ताएं अंततः अपने आंतरिक अवरोध की ही शिकार होती हैं। आज लोकतंत्र पर मंडराते खतरे के बारे में सोचते हुए एकाएक अरुंधति रॉय की पुस्तक "लिसनिंग टू ग्रासहॉपर्स: फील्ड नोट्स ऑन डेमोक्रेसी" की शुरुआती पंक्तियाँ याद आईं। वे लिखती हैं, "जबकि हम अभी भी मौत के बाद के जीवन को लेकर बहस कर रहे हैं, लेकिन क्या हम इस बहस में एक और प्रश्न जोड़ सकते हैं? क्या लोकतंत्र के बाद (अलावा) कोई और जीवन है? (यदि है) तो वह किस तरह का जीवन होगा? लोकतंत्र से मेरा आशय यह नहीं है कि यह एक आदर्श या आकांक्षा है। मेरा आशय है एक कामचलाऊ सा मॉडल, पश्चिमी उदार लोकतंत्र और इसके जो भी प्रकार हैं। 

तो क्या लोकतंत्र के बाद कोई जीवन है?

आज भारत के नागरिक जिन्हें संविधान "हम भारत के लोग" मानता है, के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि लोकतंत्र नहीं तो इसके आगे या बाद में क्या? हम सब इस प्रश्न से बचना चाह रहे हैं। भारत जिसे वर्तमान सत्ता पक्ष "लोकतंत्र की जननी" दोहराता नहीं थक रहा है, वह लोकतंत्र को किस तरह से या किस रूप में परिभाषित कर रहा है या हमें समझाना चाह रहा है? समझना होगा। आधुनिक लोकतंत्र वस्तुतः मताधिकार और उस अधिकार के प्रयोग से परिभाषित होता है। 

परन्तु किसी देश के करोड़ों लोगों को यदि उस अधिकार से वंचित कर दिया जाता है तो वह कैसा लोकतंत्र होगा? कुछ समय पहले तक हमें सांप्रदायिकता, सामाजिक भेदभाव, आर्थिक असमानता, लिंगभेद जैसे खतरे नजर आते थे और हमें भरोसा था कि भारतीय लोकतंत्र अपने संवैधानिक लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रयत्नों से इन खतरों से निपट लेगा। परंतु आज तो "लोकतन्त्र" ही खतरे में दिखाई दे रहा है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि इस पर मंडराते संकट को कैसे दूर किया जाए? यह धारणा थी कि सरकार को बदल देने से परिस्थितियों में बदलाव आएगा और सरकार को “मताधिकार” से बदला जा सकता है। परंतु एस आई आर प्रक्रिया जैसे मसलों ने हमारे सामने प्रश्न चिह्न नहीं पूरा पहाड़ खड़ा कर दिया है और समस्या यह है कि इस पहाड़ को कैसे पार किया जाए? 

सबसे खतरनाक और विचित्र तथ्य यह है कि हम अब राजनीतिक चुनाव के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कर पाने में असहाय सा महसूस कर रहे हैं। भारतीय संविधान या संवैधानिक व्यवस्था के तीन अंग हैं, विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका। लोकतंत्र में परिवर्तन का माध्यम सामान्यतया विधायिका के माध्यम से आता है। परंतु भारत की वर्तमान व्यवस्था एक बड़े विचित्र दौर में है। इस वक्त विधायिका जो कानून बनाती है, कार्यपालिका के सामने कमोवेश विवश नजर आ रही है। भारत का आधे से ज्यादा प्रतिनिधित्व करने वाला राजनीतिक तबका, जिसे विरोधी या विपक्षी कहा जाता है और नागरिक समाज का बहुत बड़ा वर्ग, एक अफसर, जिसे "मुख्य चुनाव आयुक्त" कहा जाता है, के सामने कमोवेश असहाय नजर आ रहा है। 

देश की करीब 60 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दल एक व्यक्ति/पद के सामने कमोवेश किंकर्तव्यविमूड़ से नजर आ रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के लाखों लोगों का दिल्ली जमावड़ा इस व्यक्ति को अभी भी हिला नहीं पाया। एक अफसर का राष्ट्रपति से भी ज्यादा बचाव (Immunity)? वह इस वक्त भारत का सबसे ताकतवर व्यक्ति है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी ज्यादा सुरक्षित और संरक्षित? क्या संविधान निर्माताओं ने कभी ऐसी किसी स्थिति की परिकल्पना भी की होगी? वे तो बेचारे "महाभियोग" तक के प्रावधान की सोच पाए, परंतु वर्तमान सरकार ने तो मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके द्वारा किए गए कार्यों के प्रति आजीवन उत्तरदायित्व से मुक्ति दे दी। 

क्या हमारी परिकल्पना में भी कभी ऐसी स्थिति आ सकती थी? परंतु यह हुआ। यहीं यह बात भी कौंधती है कि संविधान में और भी संवैधानिक अधिकारियों का उल्लेख है, जैसे संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्य, भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारत का महान्यायवादी। तो ये सब भी उस संरक्षण के हकदार क्यों नहीं हैं, जिसके अधिकारी मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी के दो चुनाव आयुक्त हैं? इस खुले रहस्य को जो अब तक नहीं जानते थे, वे भी अब अच्छे से समझ चुके हैं। 

संविधान के अनुच्छेद 324(5) में स्पष्ट उल्लेख है कि "मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जा सकेगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है अन्यथा नहीं और मुख्य चुनाव आयुक्त की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा।" अतएव सरकार ने संभवतः संवैधानिक मंशा के अनुरूप मुख्य चुनाव आयुक्त व आयुक्तों की सेवा की शर्तों में अत्यंत "लाभकारी" परिवर्तन कर डाला!

डॉ. राममनोहर लोहिया अपने एक अविस्मरणीय व्याख्यान "निराशा के कर्तव्य" (सन 1962) में कहते हैं, "पिछले 1500 बरस में हिन्दुस्तान की जनता ने एक बार भी किसी अंदरूनी जालिम के खिलाफ विद्रोह नहीं किया। यह कोई मामूली चीज नहीं है। इस पर लोगों ने कम ध्यान दिया है। कोई विदेशी हमलावर आए, उस वक्त देशी राजा मुकाबला करे वह अलग बात है। एक जो राजा अंदरूनी बन चुका है, देश का बन चुका है, लेकिन जालिम है, उसके खिलाफ जनता का विद्रोह नहीं हुआ। यानी ऐसा विद्रोह जिसमें हजारों, लाखों हिस्सा लेते हैं, बगावत करते हैं।" 

वे इसके बाद काफी विस्तार में जाते हैं और समझाते हैं कि 1500 वर्ष के अभ्यास के कारण झुकना उनकी (देश की) हड्डी और खून का एक अंग बन गया है। इसी झुकने को हमारे देश में बड़ा सुंदर नाम दिया जाता है कि हमारा देश तो समन्वयी है, हम सभी अच्छी चीजों को अपने में मिला लेते हैं। वास्तव में समन्वय दो किस्म का होता है। एक दास का समन्वय और दूसरा स्वामी का समन्वय। अतएव हमें समझना होगा कि वर्तमान परिस्थिति हमसे किस तरह के समन्वय या प्रतिक्रिया या प्रतिरोध की मांग कर रही है। 

राहुल गांधी पिछले लंबे समय से चुनाव में धांधली और चुनाव आयोग की कारगुजारियों पर बहस छेड़े हुए थे। परन्तु बात बन नहीं रही थी। जनता को आदत ही नहीं रही कि वह विरोध में खड़ी हो सके। महात्मा गांधी ने अपने 34 वर्षों की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता के माध्यम से भारतीय जनता में साहस का संचार कर उसे निर्भीक बनाया था। परंतु आजादी के बाद परिस्थितियों ने पुनः अतीत को अपनाना शुरू कर दिया था। थोड़ा प्रतिरोध आपातकाल के दौरान दिखा और उसे भी अब पचास बरस हो गए। 

परंतु पिछले दो-तीन महीनों में प्रतिरोध के स्वर उभरे और दूसरे दौर में पहले 2 अक्टूबर को थोड़ा संघर्ष हुआ। वहीं 12 अक्टूबर को बहुत बड़ी तादाद में जनसैलाब उमड़ा और उसकी खासियत यह थी कि इस विरोध प्रदर्शन ने न केवल राजनीतिक मतभेदों की सीमा का अतिक्रमण किया बल्कि इसमें नागरिक समाज संगठनों ने भी सक्रिय भागीदारी की। इसके बेहद सकारात्मक परिणाम आने की संभावना बन रही है। परंतु यहाँ यह पुनः याद दिलाना जरूरी है कि भारत की अधिकांश आबादी महज एक व्यक्ति के सामने लाचार सी खड़ी है। यह भी आश्चर्यजनक है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का काम मतदाताओं में चुनावों के प्रति विश्वास पैदा करना है। और जब इसका उल्टा हो रहा है, तब उन्हें स्वयं ही इस्तीफा दे देना चाहिए। परंतु समस्या यह है कि सत्ताधारी दल में तो राजनीतिक चेतना का सर्वथा अभाव हो गया है। वे मानने लगे हैं कि वे तो न्यूनतम 50 वर्षों तक शासन में रहेंगे। 

डॉ. लोहिया इसी व्याख्यान में एक जगह समझाते हैं, "मानवीय निराशा के बारे में एक मोटी सी बात बता दूँ कि जैसे-जैसे संगठन मजबूत बनता है, शक्तिशाली बनता है, वैसे-वैसे वह लबड़-घोघों भी बनने लग जाता है। समाज का प्रायः यह नियम मालूम होता है कि पहले शक्ति बढ़ाओ, देश बनाओ और जब शक्ति बढ़े तो आदर्शवादिता कम हो जाती है। हरेक संगठन में यह पेंच मालूम पड़ता है। कोई पुरानी भाषा का विद्वान इस बात को कहेगा कि यह काल की गति है और समय सब सड़ा दिया करता है और बुढ़ापे में दुर्गन्ध है, निर्बलता है। यह खाली व्यक्ति नहीं, बल्कि देश और संगठन के मामले में भी ऐसा पेंच लगा हुआ है।"

वर्तमान भारतीय राजनीतिक तंत्र की सबसे बड़ी विफलता यही है कि इसने कभी भी आंतरिक असहमति को पनपने ही नहीं दिया। जबकि आजादी के पहले की राजनीति में हमें असहमति के स्वरों को आदर दिए जाने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं और इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण महात्मा गाँधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू हैं। दोनों अनेक मुद्दों पर असहमत होते हुए भी साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। इसका मुख्य कारण था परस्पर सम्मान और परस्पर विश्वास। आज की राजनीति में इसकी शून्यता अनुभव की जा सकती है। 

वर्तमान परिस्थिति से बाहर आने का एकमात्र तरीका यह है कि पिछले दिनों जो कुछ दिल्ली में दिखाई दिया, वह अब प्रत्येक राज्य में दिखाई देना चाहिए। इतना ही नहीं, इस प्रतिरोध की कमान भी स्थानीय यानी उसी राज्य के व्यक्तियों के हाथ में होना अनिवार्य है। दरअसल एक कथित उग्र-राष्ट्रवाद का जाप करते-करते देश के बहुत से लोग यह भूल गए कि राष्ट्र पनपते तो लोकतंत्र से ही हैं। कोई भी निरंकुश राष्ट्र या तानाशाही वाला राष्ट्र कभी भी उन्नत नहीं हो पाया। 

जर्मनी और इटली इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। आज जबकि भारतीय समाज और राजनीति की सुई मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग पर अटकी है, तो ऐसी परिस्थिति में आवश्यक है कि उसके खिलाफ होने वाले संघर्षों का स्वरुप लोकतांत्रिक हो। किसी निर्णयात्मक परिणाम की भविष्यवाणी से बचना बेहद जरूरी है। 

वास्तविकता यह है कि यह "सत्य" की लड़ाई है और इसे अहिंसा और शांति से ही लड़ा जा सकता है। आधी शताब्दी से पड़ी तटस्थता की लत आसानी से छूटने वाली नहीं है। पक्षधरिता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारतीय जनता पार्टी में कमोवेश आलस्य का समावेश हो चुका है और आदर्शवादिता उनका उपकरण नहीं रही। वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कभी भी केडर आधारित दल नहीं रहा है। अतएव उसके लिए जनाधार ही एकमात्र जरिया है। वहीं जिस तरह का विषैला वातावरण बन गया है, उसमें एक सुसंस्कृत और शालीन समाज की पुनर्स्थापना अगर असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल और हैरान कर देने वाला सफर है। परंतु समाधान तो उसी से निकलेगा। सरकार के रोज नए पैतरे सामने आएँगे और नागरिक समाज को उसका त्वरित उत्तर देने की क्षमता तुरंत विकसित करनी होगी। 

अंत में महात्मा गांधी की इस बात पर गौर करिए, "देश का हर नागरिक अपनी सरकार के प्रत्येक कार्य के लिए जिम्मेदार होता है। और यह बिल्कुल ठीक है कि जब तक सरकार के कार्य सहन करने लायक रहें तब तक उसका समर्थन किया जाए। लेकिन जब सरकार के कार्य उसे और उसके राष्ट्र को नुकसान पहुँचाएं, तब अपना समर्थन वापिस ले लेना उसका कर्तव्य हो जाता है।" हम सब अपना-अपना कर्तव्य निभाएं।

(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)