भिलाई। दुर्ग जिले के खम्हरिया स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पिछले कुछ दिनों के दौरान छात्राओं के अचानक बीमार पड़ने की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। अब तक कक्षा 9वीं और 11वीं की कुल आठ छात्राएं एक जैसी स्थिति का सामना कर चुकी हैं। छात्राओं के अचानक चीखने-चिल्लाने, हाथ-पैर अकड़ने, रोने और बेहोश होने की घटनाओं के बाद स्कूल प्रबंधन, अभिभावक और प्रशासन सतर्क हो गया है।
सोमवार को यह मामला उस समय फिर सामने आया जब तीन छात्राओं की अचानक तबीयत बिगड़ गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, छात्राएं जोर-जोर से चिल्लाने लगीं, उनके हाथ-पैर अकड़ गए और आंखों से आंसू बहने लगे। कुछ ही देर बाद वे बेहोश होकर गिर पड़ीं। स्कूल प्रबंधन ने तुरंत उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। वहां कुछ घंटे निगरानी में रखने के बाद उनकी हालत सामान्य हो गई। अस्पताल की प्रारंभिक जांच में किसी गंभीर शारीरिक बीमारी की पुष्टि नहीं हुई।
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यह पहली बार नहीं है जब स्कूल में ऐसी घटना हुई हो। इससे पहले 9 जुलाई को पांच छात्राएं और 11 जुलाई को तीन छात्राएं इसी तरह की परेशानी का शिकार हुई थी। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने स्कूल परिसर में चिंता का माहौल बना दिया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर के निर्देश पर जिला अस्पताल दुर्ग से विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम स्कूल भेजी गई। डॉक्टर बालमुकुंद नेताम और डॉक्टर रानू नायडू ने छात्राओं की जांच के बाद प्रारंभिक तौर पर इसे मास हिस्टीरिया और शारीरिक कमजोरी से जुड़ी स्थिति बताया। स्कूल की प्राचार्य सुषमा दीवान ने कहा कि सभी छात्राओं की तबीयत में सुधार है लेकिन इस तरह की घटनाओं का बार-बार होना चिंता का विषय है।
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इस बीच जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए छात्राओं की मेडिकल जांच के साथ उनकी काउंसलिंग कराने के निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम फिलहाल स्कूल में लगातार निगरानी बनाए हुए है ताकि किसी भी नई स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी घटनाओं को चिकित्सा विज्ञान में मास साइकोजेनिक इलनेस (Mass Psychogenic Illness-MPI) कहा जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है। इसमें तनावपूर्ण माहौल या भावनात्मक दबाव के कारण एक व्यक्ति के लक्षण दूसरे लोगों में भी दिखाई देने लगते हैं। यह समस्या विशेष रूप से किशोरावस्था की लड़कियों में अधिक देखी जाती है। इसमें चक्कर आना, घबराहट, सांस लेने में दिक्कत, बेहोशी और हाथ-पैर अकड़ने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। जबकि, जांच में किसी जैविक बीमारी का पता नहीं चलता। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में काउंसलिंग, मानसिक तनाव कम करना और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना सबसे प्रभावी उपाय होता है।
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