"हमें लंबे समय से यह सोचने की आदत हो गई है कि सत्ता केवल विधानसभाओं के जरिये ही हाथ में आती है। मैंने इस विश्वास को एक गंभीर भूल माना है, जो हमारी जड़ता या मोह के कारण पैदा होता है। ब्रिटिश इतिहास के ऊपरी अध्ययन से हम यह सोचने लगे हैं कि पार्लियामेंट के जरिये ही सारी सत्ता छनकर नीचे जनता तक पहुंचती है। सत्य यह है कि सत्ता जनता के हाथ में होती है और वह कुछ समय के लिए उन लोगों के हाथ में सौंपी जाती है, जिन्हें जनता चुनती है। जनता से अलग परिस्थितियों में इनकी कोई सत्ता या हस्ती नहीं है।"
— महात्मा गाँधी
जंतर-मंतर पर हुए हालिया आंदोलन पर विस्तृत विचार करने के बाद तीन शब्द उभरते हैं पहला है दुराग्रह, दूसरा आग्रह और तीसरा सत्याग्रह। युवाओं द्वारा अभिमंत्रित यह आंदोलन तमाम कारणों से चर्चा में रहा है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह परिणाममूलक रहा। इस आंदोलन का मकसद था तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। और इस्तीफा करवा लिया गया। बहुत सारे मत इस बात को लेकर हैं कि अगर एक व्यक्ति/मंत्री से इस्तीफा ले लिया गया तो क्या व्यवस्था सुधर जाएगी? यह कि, बात तो पूरी शिक्षा प्रणाली पर होनी चाहिए और ऐसे अन्य तमाम तर्क सुनने को मिल रहे हैं।
परंतु मुख्य बात यह है कि आंदोलन ने यह वायदा नहीं किया था कि वह भारतीय शिक्षा प्रणाली या शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करवा देगा। उन्होंने भ्रष्टाचार और नाकामयाबी का एक प्रतीक चुना और उसकी अस्मिता को ध्वस्त कर दिया। जो "दुराग्रह" पिछले बारह वर्षों से अपराजित सा दिख रहा था, इस आंदोलन के भागीदारों ने उसे पहली बार अपनी मनमानी कर पाने से न केवल रोका बल्कि उसे कमोवेश मजबूर किया कि वह अपनी गलती स्वीकार करे।
मंत्री ने चाशनी में लपेटकर अपना इस्तीफा दिया तो दिया लेकिन हम सब जानते हैं कि चाशनी के भीतर कड़वी गोली छिपी हुई है। वर्तमान सत्ता वस्तुतः जनमानस की अवहेलना पर ही टिकी है, वरना क्या किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में संभव है कि जिस मंत्री को व्यापक जनमानस के विरोध के चलते मंत्रीमंडल से हटना पड़ा हो, अगले ही दिन राष्ट्र की संसद में सत्ताधारी दल के सांसद उनका अभिनंदन करें?
अतएव पहला शब्द "दुराग्रह" वर्तमान भारत की भी नियति बन गया है। यह बात भी लगातार उभारी जा रही है कि युवाओं की भाषा शिष्ट नहीं थी और उनका रवैया बेहद अपमानजनक था। यहाँ पर हमें रुककर अतीत में निगाह दौड़ानी होगी कि सन 1992 में राम जन्म भूमि – बाबरी मस्जिद विवाद के बाद जिस स्तर की भाषा और गाली-गलौज मुस्लिम समाज के खिलाफ और मस्जिदों के सामने आरंभ हुई, और जो आज भी बदस्तूर जारी है, किस वर्ग के लोगों ने उसकी शुरुआत की थी और उसे निरंतरता प्रदान की। इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कुछ प्रदर्शन स्थलों, इंस्टाग्राम एवं अन्य माध्यमों से कहा गया उसे उचित ठहरा दिया जाए। पिछली पीढ़ी को यह स्वीकार करना होगा कि उसने भविष्य की पीढ़ी से भाषा ही छीन ली। अतएव अब जो उनके पास है वे वही तो संप्रेषित करेंगे। परंतु वहीं दूसरी ओर कई इतने रचनात्मक पोस्टर देखने, सुनने और पढ़ने में आए, जिससे लगा कि भारत में अभी भी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता भरपूर है।
गौर करिए जंतर-मंतर पर लिपिस्टिक लगाती एक लड़की से जब रिपोर्टर ने पूछा कि वह इस समय ऐसा क्यों कर रही है, तो उस लड़की ने जो जवाब दिया वह अंदर तक रोमांचित कर गया। हंसते हुए उसने कहा, "लाठी खाते समय भी सुंदर तो दिखना ही चाहिए।" इतना आत्मविश्वास होना आसान नहीं है यह संपूर्ण प्रतिबद्धता से ही आता है। सवाल जेन-ज़ेड की मानसिकता तक भी सीमित नहीं है। इसीलिए हमें यह समझना होगा कि इस वर्ग ने भारत सरकार से "आग्रह" किया था कि वह उनकी मांग पर सकारात्मक निर्णय ले। किसी एक परीक्षा के पेपर लीक होने के बाद बीस से ज्यादा युवाओं की आत्महत्या कोई छोटी-मोटी घटना नहीं है।
बाइस लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों को दोबारा परीक्षा देना मानसिक और आर्थिक यातना से कमतर भी नहीं है। इसलिये वे आग्रह से "सत्याग्रह" की यात्रा पर अनायास ही कूच कर चले थे। जंतर-मंतर में भगतसिंह और अंबेडकर की उपस्थिति को हम देख पा रहे थे, लेकिन वहाँ वास्तव में जो हवा थी उसमें तो गाँधी ही घुले थे।
जवाहर लाल नेहरू ने पुस्तक राष्ट्रपिता में "भय का अंत" शीर्षक में लिखा है, “किंतु ब्रिटिश राज में भारत में सबसे प्रमुख भावना भय की थी। एक सर्वव्यापी, दुखदायी, गला घोंटने वाला भय। फौज का भय, पुलिस का भय, कोने-कोने में फैली खुफिया पुलिस का भय, जमींदार के गुमाश्ते का भय, दमनकारी कानूनों का भय, कैद का भय, अफसरों का भय, महाजन का भय और उसे बेकारी तथा भूख का भय जो हर समय मुंह बाए खड़ी रहती थी।
गांधी जी ने अपनी शांत किंतु दृढ़ आवाज इसी सर्वव्यापी भय के विरुद्ध बुलंद की। उन्होंने कहा "डरो मत!" गांधी के इस सौ साल पुराने मंत्र को आज पुनः दोहराया जाना अनिवार्य हो गया है। भारतीय राजनीति में संभवतः राहुल गांधी ही हैं जो वर्तमान में विद्यमान “भय अथवा डर” के खिलाफ लंबे समय से डटे हुए थे। वहीं युवाओं की सामूहिकता ने उन्हें डर से लड़ना सिखाया।
जंतर-मंतर में लाठी, आंसू गैस, बंदूकों से लैस पुलिस हमेशा "तैयार" खड़ी रहती थी। बीस जुलाई को जिस पैमाने पर बलप्रयोग हुआ वह आजाद भारत के इतिहास में इससे पहले शायद ही कभी हुआ हो। इसके बावजूद अधिकांश आंदोलनकारियों की ओर से कोई प्रतिकार सामने आता नहीं दिखा। यह सब होता देख इतिहासकार सुधीर चन्द्र की पुस्तक "गाँधी एक असंभव संभावना, (2011)" अनायास याद आई। इस आंदोलन ने बिना नाम लिए भी गाँधी को एक संभावना की तरह प्रस्तुत किया और कमोवेश असंभव को संभव भी बनाया।
हम देख रहे थे कि आजादी के बाद से गाँधी द्वारा स्थापित मूल्यों, विचारों और उनके रचनात्मक कार्यों से समाज ने कमोवेश दूरी बना ली है। परंतु हर बार जब सारे रास्ते बंद होते नजर आते हैं, तब एकाएक गाँधी विचार मार्गदर्शन के लिए सामने खड़ा होता है। पहली बार आपातकाल के पहले और बाद का समय और उसके पचास बरस बाद भारत का वर्तमान सांप्रदायिक विभाजन के कगार पर खड़ा समाज अंततः गांधी में ही समाधान तलाशता और पाता है। अभी भी कमोवेश "सविनय अवज्ञा" ने अपना कार्य कर दिखाया। सविनय अवज्ञा में पहले पहल आंतरिक रूपांतर की स्थिति आती है और तदुपरांत बाह्य यानी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चिंतन सामने आता है।
भारतीय युवाओं ने पहली पहल की ओर रुख किया है। उन्होंने धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक पूर्वाग्रहों पर विजय पाई है। उनके आंदोलन ने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी है। यहाँ गुरुद्वारे और मस्जिद सबके लिए खुले रहे। सारी दुनिया से जंतर-मंतर में खाना आया। वे गरीब लोग जो रेहड़ी या ठेले पर खाना बेच कर अपनी जीविका चलाते हैं, वे इन साथियों को मुफ्त खिला रहे हैं। यह अपनापन एकाएक नहीं पनपता, यह हम सभी में आंतरिक तौर पर मौजूद रहता है, लेकिन इसकी अभिव्यक्ति अनायास ही परस्पर विश्वास और प्रेम से प्रकट होती है। ऐसा सिर्फ जंतर-मंतर, दिल्ली में नहीं, इंदौर, अहमदाबाद, मुंबई, बैंगलोर, जयपुर जैसे तमाम जगहों पर हुआ। यानी भारतीय समाज में यह भाईचारा अभी भी विद्यमान है।
भारत में वतर्मान सर्वव्यापी दक्षिणपंथी राजनीति के लिये यह बड़ा झटका है। प्रो. अरुण त्रिपाठी कहते हैं कि संघ, एक आज्ञापालक समाज की परिकल्पना कर उसे स्थापित करना चाहता है। एक ऐसा समाज जिसमें प्रश्न नहीं पूछे जाते हों। परंतु यह आंदोलन उन पर कुठाराघात कर गया। गाँधी कहते हैं, "भय एक ऐसी चीज है, जिसे मैं नापसंद करता हूँ। एक आदमी दूसरे आदमी से क्यों डरे?" यह आंदोलन इसके प्रमाण भी देता है। दिल्ली में एक लड़का बैरिकेड के पार खड़े सिपाहियों से बड़ी संजीदगी से पूछता है कि, अब लाठीचार्ज कब करेंगे? उस दिन मैं आ नहीं पाया था। बिहार में लाठीचार्ज करती पुलिस के सामने "राष्ट्रगान" करते युवा प्रतिबोध की नई इबारत लिख रहे हैं।
मुमताज़ शकेब का शेर है,
“तमाम ऊँचे दरख्तों से बच के चलता हूँ,
मुझे खबर है के साया किसी के पास नहीं।"
युवाओं के सामने यह सवाल तो खड़ा हो ही गया कि वे आखिर किसके पीछे चलें या कौन उनका मार्गदर्शन करेगा। जब निराशा हाथ लगी तो वे खुद ही चल पड़े। एक डिजिटल एंकर कह रहे थे, कि यह पीढ़ी (जेन ज़ी) किसी का प्रवचन नहीं सुनना चाहती। मुद्दा सुनने या न सुनने का नहीं बल्कि विश्वसनीयता का है। भारत सरकार नीट आदि परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और लापरवाही को स्वीकार करने के बजाय सन 2024 में बने कानून में परिवर्तन कर उसे और भी कठोर बना रही है।
परंतु सवाल तो अपराधी को पकड़ने और सबूत इकट्ठा करने का है और केन्द्रीय ख़ुफ़िया एजेंसियां उसमें नाकाम रहीं हैं। वर्तमान सत्तासीन आँचलिक राजनीतिक दलों को नष्ट कर कमोवेश एकदलीय प्रणाली की ओर बढ़ना चाहते हैं। परंतु अब यह संभव नहीं लग रहा है। सत्ताधारियों के साथी आंदोलनकारियों की भाषा पर आपत्ति उठा रहे हैं, परंतु उनके उद्देश्य पर चर्चा करने से डर रहे हैं। गांधी की सभा प्रार्थना से शुरू होती थी और जंतर-मंतर में दिन क्रांति गीतों से शुरू होता था। बात तो संप्रेषणीयता की है। इस आंदोलन को वामपंथी छात्र संगठनों ने ऊंचाई तक पहुंचाया और विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से समर्थन दिया।
इस आंदोलन की सबसे सुखद अनुभूति यह है कि इसकी पूरी अवधि में कभी भी ऐसा आभास नहीं हुआ कि हिंसा हो सकती है। युवाओं ने अपने असंतोष को हिंसा में बदलने नहीं दिया। अनेक लोगों ने इस आंदोलन की तुलना नेपाल और बांग्लादेश में हुए युवा विद्रोह से करनी चाही। जबकि इस आंदोलन ने कभी भी सत्ता परिवर्तन को मुद्दा बनाया ही नहीं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत और उपलब्धि दोनों ही है। इस आंदोलन ने सिर्फ वर्तमान सत्ताधारियों को ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों को समझा दिया है कि परिवर्तन के लिए पाँच वर्षों तक इंतजार करना अब जरूरी नहीं। जो सरकार बनी है, उसे अंततः वही करना होगा जो कि जनता के हित में है।
शासक वर्ग को भी यह समझना होगा कि उनके खिलाफ अपशब्दों का खुल्लम-खुल्ला उपयोग क्यों किया जा रहा है। यह कोई सामान्य घटना नहीं है कि लड़कियां उन्हीं अपशब्दों का प्रयोग कर रही हैं जो उनकी अस्मिता को चोट पहुंचा रहे हैं। इससे व्यवस्था को यह समझ जाना चाहिए कि पानी सिर के ऊपर जाने ही वाला है। भाजपा का अपने मंत्री का अभिनंदन जिसे जनता के गुस्से के कारण हटाना पड़ा बता रहा है कि इनकी लोकतंत्र की समझ में कहाँ कमी है।
गाँधी कहते थे, मेरे पास अपना कुछ भी मौलिक नहीं है, जो कुछ भी मैंने ग्रहण किया वह यहाँ पहले से मौजूद था। सदाशयता, भाईचारा, सर्वधर्म समभाव, भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह उसी का कमाल है कि लड़कियां आंदोलन स्थल पर बिना किसी डर के रात-दिन डटी रहीं। पुलिस अब कह रही है कि इस आंदोलन में तीन हजार से अधिक अपराधियों की भागीदारी को उसने चिन्हित किया है। परंतु किसी भी आंदोलनकारी ने उसके साथ किसी भी तरह के अपराध की बात नहीं कही।
यानी आंदोलन की पवित्रता ने उनके मानस को भी प्रभावित किया। इस आंदोलन ने दुराग्रह को अपने आग्रह से बदला है और सत्याग्रह की यात्रा शुरू की है। परंतु गंतव्य तक पहुंचने में समय लगेगा। बात को सुधीर चन्द्र की पुस्तक की अंतिम पंक्तियों से समेटते हैं। वे लिखते हैं, "कसक तो यह भी कि कभी हमारे ही मानने और बनाने से सम्भव बने गांधी आज हमारे ही न मानने से असम्भव बन गए हैं। असंभव भी ऐसे वक्त में जब हमें संसार को पहले से ज्यादा जरूरत है उनकी।" याद रहे गांधी ने कहा था कि मैं कब्र से भी तुम्हें देखता रहूंगा और ये विकास वहां भी रुकेगा नहीं। बापू पुनः ठंडी बयार की तरह जंतर-मंतर में बहे हैं और असंभव एक बार पुनः संभव हो पाया है।