भोपाल। बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य और नई पीढ़ी के सामने खड़ी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दलित और आदिवासी संगठनों ने भोपाल डिक्लेरेशन को नए सिरे से रिवाइव करने का फैसला लिया है। राजधानी भोपाल में आयोजित दो दिवसीय ड्राफ्टिंग सत्र में इस बात पर सहमति बनी कि भोपाल डिक्लेरेशन-2 को समकालीन हालात के अनुरूप नया एजेंडा बनाकर जनता के बीच ले जाया जाएगा।

ड्राफ्टिंग सत्र में शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, भूमि व वनाधिकार, निजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को नए दलित-आदिवासी एजेंडा का केंद्र बनाया गया। वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा नीतियों के कारण आदिवासी क्षेत्रों में संसाधनों की लूट बढ़ी है और दलित समाज को योजनाबद्ध तरीके से हाशिये पर धकेला जा रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि 1999 का भोपाल डिक्लेरेशन अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ था, लेकिन आज की चुनौतियाँ उससे कहीं ज़्यादा गंभीर हैं। उन्होंने कहा कि आज संविधान, आरक्षण और लोकतंत्र पर सीधा हमला हो रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और निजीकरण ने दलित-आदिवासी समाज को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है। इसलिए भोपाल डिक्लेरेशन को नई पीढ़ी की जरूरतों के हिसाब से फिर से गढ़ना जरूरी है।

बैठक में यह भी तय हुआ कि भोपाल डिक्लेरेशन-2 को अंतिम रूप देने से पहले देशभर में क्षेत्रीय संवाद और परामर्श बैठकें की जाएंगी, ताकि ज़मीनी स्तर की समस्याएं और सुझाव दस्तावेज़ में शामिल हो सकें। सत्र में शामिल संगठनों ने स्पष्ट किया कि भोपाल डिक्लेरेशन-2 संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए साझा संघर्ष का रोडमैप होगा, जिसे दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में जनता के बीच ले जाया जाएगा।

"भोपाल डिक्लेरेशन 2" का ड्राफ्ट लगभग तैयार हो चुका है। सोमवार को प्रथम सत्र में तय एजेंडे पर 60 से अधिक एक्सपर्ट्स के साथ विमर्श की गई। इसके अगले दिन यानी मंगलवार को अगले सत्र में पांच सौ से अधिक लोगों के साथ चर्चा हुई। आयोजकों ने बताया कि इन सभी सुझावों को जोड़कर 13 जनवरी 2027 को अंतिम “भोपाल डिक्लेरेशन-2” जारी किया जाएगा। इस बीच अलग-अलग राज्यों में जिला स्तर पर सुझाव लिए जाएंगे और उन्हें ड्राफ्ट में शामिल किया जाएगा। साथ ही Gen-Z से भी संवाद कर उनके विचारों को समझा जाएगा। 

क्यों जरूरी है भोपाल डिक्लेरेशन-2

बहुजन इंटेलेक्ट संगठन के मनोज राजे ने कहा कि 2002 में लॉन्च हुआ भोपाल डिक्लेरेशन अपने समय का एक ऐतिहासिक दस्तावेज था। उसके कई प्रावधान लागू हुए और लाखों दलित-आदिवासी परिवारों को उसका लाभ मिला। लेकिन समय के साथ चुनौतियां बदली हैं। आज भूमंडलीकरण, निजीकरण, जल-जंगल-जमीन पर बढ़ता दबाव, शिक्षा और रोजगार में घटते अवसर ये सब नई समस्याएं हैं। इसलिए पुराने ढांचे को जस का तस दोहराने के बजाय, नए हालात के मुताबिक एक नया दस्तावेज जरूरी है।

उन्होंने बताया कि इसी सोच के साथ बहुजन इंटेलेक्ट, आदिवासी सेवा मंडल और डोमा परिषद ने मिलकर भोपाल डिक्लेरेशन-2 बनाने का फैसला किया। चूंकि भोपाल डिक्लेरेशन-1 दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में लागू हुआ था, इसलिए सभी संगठनों ने सर्वसम्मति से उनसे कार्यक्रम की अध्यक्षता करने का आग्रह किया।इस सामूहिक मंथन का उद्देश्य भोपाल डिक्लेरेशन की उपलब्धियों की समीक्षा करते हुए सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ा एक भविष्यपरक साझा एजेंडा तैयार करना है।

कार्यक्रम का संयोजन बहुजन इंटेलेक्ट, आदिवासी सेवा मंडल और डोमा परिषद द्वारा किया जा रहा है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े कई अन्य सामाजिक संगठन भी इसमें सहभागी हैं। ड्राफ्टिंग प्रक्रिया के तहत देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रशासकों, नीति-निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों से चरणबद्ध परामर्श किया जा रहा है।