भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों का मुद्दा जोरदार तरीके से गूंजा। प्रश्नकाल के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार को घेरते हुए मौतों की वास्तविक संख्या, बीमारी की जानकारी मिलने की तारीख और राहत राशि को लेकर तीखे सवाल किए। जवाब में उप मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सदन में स्वीकार किया कि बीते 21 दिसंबर से अब तक दूषित पानी के कारण 20 मौतें हुई हैं। मंत्री ने बताया कि कुल 459 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीमारी की पहली खबर 29 दिसंबर को सामने आई थी। इसके बाद प्रभावित क्षेत्र से मरीजों के स्टूल और पानी के सैंपल जांच के लिए राष्ट्रीय जीवाणु संक्रमण अनुसंधान संस्थान, कोलकाता, एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर और जिला सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला इंदौर भेजे गए थे। जांच में ई कोलाई और हैजा (कॉलरा) के संक्रमण की पुष्टि हुई थी। सरकार ने सदन को यह भी बताया कि यह मामला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जनहित याचिका के रूप में विचाराधीन है और न्यायिक आयोग गठित किया जा चुका है।
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हालांकि, स्थानीय लोगों का दावा है कि भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण अब तक 33 लोगों की जान जा चुकी है। ऐसे में सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और स्थानीय दावों में 13 मौतों का अंतर सामने आया है। इसे लेकर विपक्ष ने सरकार पर आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया है। उमंग सिंघार ने सदन में कहा कि जब सांप बिच्छू के काटने से मौत पर चार-चार लाख रुपये दिए जाते हैं तो यहां इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद केवल दो-दो लाख रुपये की सहायता क्यों दी गई। उन्होंने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और राजेंद्र शुक्ल की जिम्मेदारी तय करने और नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांग की।
इस दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई। भाजपा सदस्यों ने यूनियन कार्बाइड त्रासदी का हवाला देते हुए नैतिकता के सवाल उठाए। हंगामे के बीच कांग्रेस विधायक आसन के सामने आकर खड़े हो गए जिसके चलते विधानसभा की कार्यवाही पांच मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी थी। दोबारा कार्यवाही शुरू होने पर भी विवाद शांत नहीं हुआ और दो बजे तक के लिए सदन स्थगित कर दिया गया। उमंग सिंघार ने यह भी सवाल उठाया कि जब सदन में 45 मिनट कुत्तों के मुद्दे पर चर्चा हो सकती है तो इतने लोगों की मौत पर गंभीर बहस क्यों नहीं हो रही। अध्यक्ष ने बार-बार दोनों पक्षों से अपने स्थान पर लौटने की अपील की लेकिन हंगामा जारी रहा।
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मंत्री प्रहलाद पटेल और पूर्व अध्यक्ष सीताशरण शर्मा सहित कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि चूंकि मामला न्यायिक आयोग और अदालत में विचाराधीन है इसलिए इस पर सदन में विस्तृत चर्चा नहीं हो सकती। विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने चर्चा का आश्वासन दिया था इसलिए प्रश्न तक सीमित रहते हुए न्यायिक मर्यादा का पालन किया जाए।
सदन के बाहर भी कांग्रेस विधायकों ने प्रदर्शन और नारेबाजी की। उन्होंने सरकार पर असंवेदनशीलता का आरोप लगाया। इसी बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यह विषय राजनीति से ऊपर है और इसे पक्ष-विपक्ष के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने मृतकों के परिजनों को दी जाने वाली सहायता राशि दो लाख से बढ़ाकर पांच लाख रुपये करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में दोषी पाए जाने वाले एक आईएएस अधिकारी को निलंबित कर सख्त कार्रवाई की गई है। सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि इंदौर नगर निगम से इस संबंध में कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं मांगी गई है। जिस पर विपक्ष ने और सवाल उठाए।
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