एडीजी (ट्रेनिंग) राजाबाबू सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। इसबार कारण जानलेवा हमले का डर है। हुआ यूं कि एडीजी राजाबाबू सिंह के त्रिलंगा स्थित घर के बाहर कार से कुछ युवक पहुंचे थे। अज्ञात युवकों ने गाली-गलौज की। एक युवक के हाथ में डंडा भी था। इस घटना के बाद वरिष्ठ आईपीएस राजाबाबू सिंह ने थाने में आवेदन दे कर बताया कि उन्हें जान का खतरा है और उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करायी जाए। उन्होंने अपने शिकायती पत्र में लिखा है कि मेरे द्वारा प्रशिक्षण शाखा में पदभार ग्रहण करने के बाद से पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में कई नवाचार करवाए जा रहे हैं एवं अभी हाल में प्रशिक्षण में सनातन धर्म के उदात्त मानव मूल्यों का समावेश से जुड़े कुछ नवाचारों के कारण मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि कतिपय असामाजिक तत्वों द्वारा मेरे प्रशिक्षण में किए गए नवाचारों से खफा होकर कोई बड़ा षडयंत्र किया जा रहा है एवं मेरी जान को खतरा प्रतीत हो रहा है।
राजा बाबू सिंह ने ग्वालियर के तिघरा स्थित पुलिस ट्रेनिंग सेंटर से राजस्थान पुलिस के जवानों को बाहर किया था। वे लगातार ट्रेनिंग सेंटर में खाने का दुष्प्रचार एआई वीडियो के जरिए कर रहे थे। उन्हें शक है कि इसी कारण उन पर हमला हो सकता है। इस मामले की जांच करवाने की मांग के साथ आवास पर कम से कम रात के समय हथियारबंद पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए।
एडीजी राजाबाबू सिंह ने छात्र जीवन के दौरान साल 1992 में अयोध्या में कारसेवक के रूप में पहुंचे थे। मध्य प्रदेश कैडर के 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी राजाबाबू सिंह की इच्छा है कि वे 2027 में रिटायर होने के बाद अयोध्या से जुड़ जाएं। वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भी बड़े पदों पर रहे हैं। उनका स्वयं का यह कहना कि सनातन धर्म के उदात्त मानव मूल्यों का समावेश से जुड़े कुछ नवाचारों के कारण खफा होकर कोई बड़ा षडयंत्र किया जा रहा है। यह जांच कि विषय है लेकिन राजधानी में सीनियर पुलिस अधिकारी के घर हुई इस वारदात से पता चलता है कि बदमाशों के हौसल इतने बुलंद हो गए हैं।
डर का आलम यह है कि एक सुरक्षाकर्मी तथा कवर्ड कैम्पस में निजी सुरक्षाकर्मी होने के बाद भी उन्हें पुलिस आयुक्त से सुरक्षा की गुहार लगानी पड़ी है। सुरक्षाकर्मी के साथ रहने वाले आईपीएस राजाबाबू सिंह डंडा लेकर आए एक युवक से क्या जान का खतरा हो सकता था या यह पुलिस अफसर को चुप बैठाने का तरीका मात्र था। बड़ी पोस्ट पर बैठे अफसर का रिटायरमेंट के पहले सनातनी मूल्यों के नवाचार करना व विरोधियों से डरना कम मामूली बात नहीं है।
कलेक्टर को नाकारा कह कर क्यों पलट गए बीजेपी विधायक
गुना में एक दिलचस्प मामला हुआ। एक दिन पहले तक कलेक्टर किशोर कन्याल और जिले के अफसरों को नाकारा बता रहे बीजेपी के बेबाक विधायक पन्नालाल शाक्य दूसरे ही दिन अपने बयान से पलट गए। अपने बयानों से चर्चा में रहने वाले विधायक पन्नालाल शाक्य का यूं पलटने की भी अपनी वजहें हैं।
कलेक्टर किशोर कन्याल ने शहर की जीवनदायिनी गुनिया नदी का पुनरुद्धार और अतिक्रमण हटाने की योजन गुनिया विकास सलाहकार समिति के समक्ष प्रस्तुत की थी। योजना के अनुसार सफाई कार्य और अतिक्रमण हटाने की मुहिम शुरू होनी है। इस समिति की बैठक में विधायक पन्नालाल शाक्य शामिल नहीं हुए थे, लेकिन विक्रमोत्सव के मंच से विधायक पन्नालाल शाक्य ने न केवल कलेक्टर की कार्ययोजना पर सवाल उठाए, बल्कि इस योजना को कागजी घोड़े दौड़ाना करार दिया। एसडीएम शिवानी पांडे को कहा था कि नवरात्र शुरू हो गए। आप दुर्गा स्वरूप हैं, घूम जाएं तलवार लेकर खटाखट, देखो कितना मजा आता है। आज अगर हम न कर पाए, तो फिर कभी नहीं होगा। आप जैसे नकारा अफसर आते जाएंगे और चले जाएंगे।
इस बयान के बाद विधायक शाक्य चर्चा में आ गए थे। अगले ही दिन विधायक ने कहा कि नाकारा शब्द का अर्थ गलत निकाला गया। उनकी मंशा है कि जिला प्रशासन अच्छा काम करे। इसके लिए वह स्वयं भी प्रशासन का सहयोग करेंगे। इस यू टर्न की अपनी राजनीतिक वजहें हैं। गुना कलेक्टर किशोर कान्याल के काम से क्षेत्र के सांसद केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खुश हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सार्वजनिक मंच से कलेक्टर के कार्यों की प्रशंसा करते हुए उन्हें सेल्यूट कर दिया था।
अब जब उन्हीं सिंधिया के समर्थक विधायक पन्नालाल शाक्य ने कलेक्टर किशोर कन्याल को मंच से नाकारा कह दिया तो कलेक्टर समर्थक सक्रिय हुए। स्वाभाविक है कि सिंधिया का नाम आएगा तो समर्थक तो विपरीत दिए गए बयान से मुकरेंगे ही। यही हुआ कि विधायक पन्नालाल शाक्य ने कह दिया कि वे कलेक्टर को नाकारा नहीं कह रहे थे बल्कि वे तो प्रशासन का सहयोग करने को तैयार हैं। इस तरह एक राजनीतिक पैतरे ने कलेक्टर का तनाव घटा दिया लेकिन तब तक बयान फैल चुका था तथा विधायक पन्नालाल शाक्य का मंतव्य पूरा हो ही गया।
कलेक्टरों को कोर्ट की फटकार, कर क्या रहे हैं
बीते कुछ समय से प्रदेश के कलेक्टर हाई कोर्ट की फटकार खा रहे हैं। हर फटकार के बाद लगता है कि अब तो प्रशासनिक सुधार हो जाएगा लेकिन सुधार होता नहीं है। इस बार तो अवैध माइनिंग के एक मामले असली ट्रक मालिक के बदले किसी दूसरे पर कार्रवाई कर दी गया। मामला कोर्ट पहुंचा तो छिंदवाड़ा कलेक्टर को न केवल फटकार मिली बल्कि 50 हजार का हर्जाना भी देना पड़ेगा।
चौरई (छिंदवाड़ा) में एक ट्रक को अवैध खनिज परिवहन करते हुए पकड़ा गया था। पूछताछ में ड्राइवर ने ट्रक के मालिक का नाम सारंग रघुवंशी बताया। ड्राइवर के बयान के आधार पर पूरा केस तैयार कर लिया गया। कलेक्टर ने वाहन राजसात करने और जुर्माना लगाने का आदेश पारित कर दिया। लेकिन सारंग रघुवंशी ट्रक मालिक नहीं है। प्रशासन ने न तो वाहन के रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों की जांच की और न ही वास्तविक मालिक बलवीर सिंह से संपर्क किया। कोर्ट ने पाया कि पूरी कार्रवाई केवल मौखिक बयान पर आधारित थी, जो प्रशासनिक प्रक्रिया की गंभीर खामी को दर्शाता है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों की स्वतंत्र जांच करे, न कि अधीनस्थ की रिपोर्ट को आंख मूंदकर स्वीकार करे।
कोर्ट ने यहां तो कलेक्टर के विरूद्ध कम सख्त टिप्पणी की है। वरना, शहडोल कलेक्टर को (निर्दोष पर एनएसए की कार्रवाई करने पर दो लाख जुर्माना दी थी। अवैध रेत खनन की शिकायत पर सुशांत के पिता हीरामणि बैस ने गिरफ्तारी को हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान पता चला कि एनएसए की कार्रवाई नीरजकांत द्विवेदी नाम के किसी अन्य अपराधी पर होनी थी, लेकिन बाबू ने गलती से सुशांत बैस का नाम लिख दिया। दलील दी गई थी कि कलेक्टर ने न तो स्वतंत्र गवाहों के बयान लिए और न ही फाइल का उचित अध्ययन किया।
इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लगता है कि अफसर आंखों पर पट्टी बांध कर काम कर रहे हैं। सुनवाई पूरी होने तक सुशांत एक साल से ज्यादा का वक्त जेल में गुजार चुका था। कोर्ट ने कलेक्टर को कहा था वे 30 दिनों के भीतर दो लाख रुपए अपनी जेब से मुआवजे के रूप में पीड़ित सुशांत सिंह बैस के खाते में जमा करवाएंगे। यह टिप्पणी कोर्ट ने जनवरी में की थी लेकिन मामले थम नहीं रहे हैं। प्रशासिनक भूल−चूक से निर्दोष कानूनी मामले झेल रहे हैं। अब एक और कलेक्टर को जेब से मुआवजा देना होगा।
विवादित शराब अधिकारी व विवादित कलेक्टर में झगड़ा
बीते वर्षों में अपने कार्यों के कारण विवाद में रहे शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना और आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही एक बार फिर चर्चा में हैं। इसबार दोनों अधिकारी आपस में उलझ गए हैं। दोनों के बीच सितंबर से जारी विवाद में हाई कोर्ट से कलेक्टर को झटका लगा है। आबकारी अधिकारी से प्रभार लेने के आदेश पर ऋजु बाफना की मंशा पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने आदेश को रोक दिया है।
कलेक्टर ऋजु बाफना ने आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही पर कई आरोप लगाए थे। कलेक्टर का मानना हैं कि आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही जरूरत पड़ने पर कॉल रिसीव नही करते थे। कलेक्टर कार्यालय में आयोजित बैठकों में भी वह अनुपस्थित रहते थे। मुख्य आयोजनों में भी वह अधिकतर समय अनुपस्थित रहे। एक आरोप यह भी था कि आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही अधिकतर समय इंदौर में ही रहा करते थे। फरवरी 2026 में कलेक्टर ऋजु बाफना ने आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इस नोटिस का जवाब देने के पहले ही आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही का निलंबन आदेश निकाल दिया गया। हाई कोर्ट ने कलेक्टर ऋजु बाफना की मंशा पर सवाल उठाते हुए सभी आदेशों को निराधर बताया और आबकारी अधिकारी को पुनः अपने पद पर नियुक्त करने के आदेश दिए हैं।
असल में आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही आलीराजपुर में रहने के दौरान भी विवादों से घिरे थे। उन पर शादी के झांसे के मामले में मामला दर्ज हुआ था जो आरोप बाद में झूठा पाया गया। कहा गया कि गुजरात की शराब तस्करी लिंक को तोड़ने के कारण उन पर आरोप लगा था। बाद में जब आलीराजपुर में आबकारी की आय घटी तो विनय रंगशाही को दोबारा आबकारी अधिकार बनाकर भेजा गया था। इसी तरह, आईएएस ऋजु बाफना भी प्रशिक्षण के दौरान मानवाधिकार आयोग में कार्यरत एक अधिकारी के विरुद्ध यौन उत्पीड़न की शिकायत कर चर्चा में आई थीं। उनका कार्यकाल भी विवादों के कारण जाना जाता है। अब शाजापुर में कोर्ट के आदेश के बाद बात खत्म होगी, लगता नहीं है।