भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के चर्चित 90 डिग्री ब्रिज विवाद में राज्य सरकार ने बड़ा प्रशासनिक निर्णय लिया है। करीब 11 महीने पहले निलंबित किए गए दो तत्कालीन प्रभारी चीफ इंजीनियर समेत सात इंजीनियरों की बहाली को मंजूरी दे दी गई है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रमुख सचिव सुखबीर सिंह के प्रस्ताव पर विभागीय मंत्री राकेश सिंह ने इस फैसले को स्वीकृति दी। सभी अधिकारियों को फिलहाल प्रमुख अभियंता कार्यालय में पदस्थ किया जाएगा। हालांकि, कुछ अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच जारी रहेगी।
यह कार्रवाई 23 जून 2025 को हुई निलंबन प्रक्रिया के लगभग 11 महीने बाद की गई है। जिन अधिकारियों को बहाल किया गया है उनमें प्रभारी मुख्य अभियंता जीपी वर्मा और संजय खांडे, प्रभारी कार्यपालन यंत्री शबाना रज्जाक, सहायक यंत्री शानुल सक्सेना, उपयंत्री उमाशंकर मिश्रा, अनुविभागीय अधिकारी रवि शुक्ला के अलावा सेवानिवृत्त अधिकारी जावेद शकील और एमपी सिंह के नाम शामिल हैं।
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जानकारी के अनुसार, ब्रिज डिवीजन से जुड़े जीपी वर्मा, रवि शुक्ला और उमाशंकर मिश्रा के खिलाफ जांच आगे भी जारी रहेगी। इन अधिकारियों पर निर्माण कार्य में लापरवाही और तकनीकी त्रुटियों के आरोप हैं। वहीं, डिजाइन विंग से जुड़े संजय खांडे, शबाना रज्जाक और शानुल सक्सेना को बिना विभागीय जांच के बहाल किया गया है। विभाग का कहना है कि इन अधिकारियों ने आरोप पत्र के जवाब में डिजाइन संबंधी गलती से इनकार किया था और तकनीकी परीक्षण में उनके पक्ष को आधार माना गया।
पूरे मामले की जांच तीन वरिष्ठ इंजीनियरों की टीम ने की थी। जांच रिपोर्ट में सामने आया कि ऐशबाग क्षेत्र में बने इस आरओबी का कोण 90 डिग्री नहीं बल्कि लगभग 119 डिग्री था। अधिकारियों के मुताबिक, जगह की कमी के कारण यही अधिकतम संभव एंगल रखा गया था। हालांकि, निर्माण के दौरान दोनों ओर के स्लैब को सीधी लाइन में जोड़ने से आवश्यक कर्व विकसित नहीं हो पाया। जिससे ब्रिज की संरचना विवादों में आ गई।
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जांच में यह भी पाया गया कि यदि निर्माण के समय अधिकारियों ने पर्याप्त तकनीकी निगरानी और समय पर निर्णय लिए होते तो डिजाइन में आवश्यक सुधार किए जा सकते थे। इसके अलावा रेलवे क्षेत्र में सर्कुलर पिलर के बजाय वॉल टाइप पिलर बनाए जाने को भी गंभीर तकनीकी त्रुटि माना गया।
अधिकारियों पर अलग-अलग स्तर पर आरोप लगाए गए थे। शबाना रज्जाक और शानुल सक्सेना पर रेलवे की अनुमति के बिना ड्राइंग अनुमोदित करने का आरोप था। संजय खांडे पर कथित रूप से गलत डिजाइन को मंजूरी देने का मामला सामने आया। वहीं, उमाशंकर मिश्रा और रवि शुक्ला पर रेलवे की अनुमति के बिना कार्य कराने के आरोप लगे थे। जीपी वर्मा पर आरओबी निर्माण में त्रुटिपूर्ण कार्यवाही कराने की जिम्मेदारी तय की गई थी। सेवानिवृत्त अधिकारी जावेद शकील और एमपी सिंह पर भी निर्माण और डिजाइन अनुमोदन में लापरवाही के आरोप लगाए गए थे।
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लोक निर्माण विभाग अब पूरे मामले में विभागीय जांच अधिकारियों की नियुक्ति करेगा। दस्तावेजों, तकनीकी रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के बयानों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। विभाग का अनुमान है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने में लगभग चार से पांच महीने का समय लग सकता है।