अहिंसा मनुष्य जाति के हाथ में बड़ी से बड़ी शक्ति है। मनुष्य के बुद्धिचातुर्य ने संहार और सर्वनाश के जो प्रचंड से प्रचंड अस्त्र-शस्त्र बनाये हैं, उनसे भी अहिंसा अधिक प्रचंड शक्ति है। सर्वनाश और संहार मानव धर्म नहीं है। मनुष्य आवश्यकता पड़ने पर अपने भाई के हाथों भरने के लिये तैयार रहकर स्वतंत्रता से जीता है, उसे मारकर कभी नहीं। प्रत्येक हत्या अथवा दूसरे को पहुंचाई चोट, फिर उसका उद्देश्य कुछ भी रहा हो, मानवता के खिलाफ एक अपराध है।
महात्मा गांधी
तो क्या मानवता अपना धर्म परिवर्तन कर रही है? या इसके बदले शैतानियत मानव जाति का नया धर्म बन गई है। हमारी सभ्यता क्या अब "मानवता" (Human) से "अमानवीय" (In human) के रूप में स्वीकार्य होती जा रही है। भारत जैसा देश अब मुँह पर पट्टी बांध कर नहीं बल्कि मुँह सिलकर रेत में अपना सिर दबाकर जीवित रहने का दिखावा भर कर रहा है? यह महज प्रश्न नहीं बल्कि अस्तित्व में रहने या न रहने का मुद्दा बनता जा रहा है। ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इजराइल द्वारा छेड़ा गया युद्ध तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर गया है। आसार अच्छे और बुरे में आगे बढ़ते हुए विनाश और सम्पूर्ण विनाश की ओर बढ़ गए हैं।
अमेरिका से ईरान की दूरी करीब 11,680 किलोमीटर (ग्यारह हजार छः सौ अस्सी किलोमीटर) और इजराइल से ईरान को दूरी करीब 1800 (एक हजार आठ सौ किलोमीटर) है। इन तीनों देशों की सीमाएं कही भी एकदूसरे से मिलती नहीं नजर आती हैं। फिर यह प्रलयकारी नपुंसक हमला क्यों किया गया? नपुंसक इसलिए क्योंकि इस या किसी भी युद्ध से कुछ भी हासिल नहीं होता, सिवाय आत्म पतन के।
गांधी एक और बेहद महत्वपूर्ण स्थापना करते हैं कि "कुछ मित्रों ने मुझसे कहा कि सत्य और अहिंसा का राजनीति और दुनियावी व्यवहार में कोई स्थान नहीं है। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। व्यक्तिगत मोक्ष के साधनों के रूप में सत्य और अहिंसा का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है। प्रतिदिन के जीवन में उन्हें स्थान देने तथा उनका उपयोग करने का प्रयोग मैं सदा से करता आया हूँ।" तो सवाल राष्ट्रों की सार्वभौमिकता के सम्मान का है।
इजरायल पर बात करना इसलिये व्यर्थ है क्योंकि उसका अमेरिका से पृथक अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। वह अपने आप में एक "परजीवी राष्ट्र" है, जिसकी जड़ें अमेरिका सींच रहा है। अमेरिका ने ईरान के आसपास के देशों जैसे सऊदी अरब, कतर, बेहरीन, ओमान, जोर्डन, अबुधाबी, संयुक्त अरब अमीरात आदि को भी स्वतंत्र राष्ट्र से परजीवी या अमेरिका पर निर्भर राष्ट्रों के झुण्ड में बदल दिया। परंतु भेड़ों का झुण्ड कितना ही बड़ा हो वे एक शेर के सामने टिक नहीं पातीं। वजह, उस मानसिकता का है जिसमें अरब देश पूरी तरह से आलसी, विलासी और परनिर्भर समुदाय, जिसमें उनकी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा भी शामिल है, के शिकार हो गए हैं।
और अमेरिका ? एक खूंखार या कहें तो नृशंस इकाई के रूप में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद स्वयंभु की भूमिका में प्रकट हो गया है। अमेरिका ने जो ईरान में किया ऐसा उसने पहली बार नहीं किया है। ईरान की अपनी समस्याएं और विषमताएं हैं और उसे लेकर विश्वव्यापी चिंता भी जताई जा रही है। परंतु सवाल तो यह है कि अमेरिका जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुहाई देकर ईरान को नेस्तनाबूत कर देना चाहता है, क्या ऐसी शैतानियत से कुछ सकारात्मक हो पाना संभव है?
हम सभी ईरान में महिलाओं और विरोधियों की स्थितियों को चिंतित है। परंतु क्या राष्ट्र को समाप्त कर वहां लोकतंत्र स्थापित हो पाएगा। अभी तो इस फेहरिस्त पर गौर करिये। इस सूची में अमेरिका द्वारा राष्ट्राध्यक्षों की जबरन बेदखली उनकी हत्या और राष्ट्रों की सर्वभौमिकता को नष्ट करने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
(1) वेनेजुएला - यहां के राष्ट्रपति माडुरो का रातों-रात अपहरण कर अमेरिका ले गया। वजह बताई नशीली दवाईयों की तस्करी। जबकि वास्तविकता थी, वहां के तेल पर कब्जा।
(2) लीबिया – राष्ट्रपति कर्नल गद्दाफी को इसलिए सत्ता से बेदखल कर दिया क्योंकि उन्होंने अमेरिकी डॉलर में भुगतान के विकल्प को स्वीकार नहीं किया था।
(3) ईराक - सद्दाम हुसैन को हटाने के पीछे ईराक के तेल भंडारों पर कब्जा करना था।
(4) उत्तरी वियतनाम - वहां के राष्ट्रपति डियम और उनके भाई को गिरफ्तार कर इसलिए मार दिया गया क्योंकि अमेरिका वहाँ अपनी पसंद का नेता नियुक्त करना चाह रहा था।
(5) ईरान - यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन चाहता है। दशकों पहले वह वहां के चुने गए लोकतांत्रिक राष्ट्रपति मोहम्मद मोसादेघ को हटाकर पुन: राजशाही स्थापित करवा चुका है। वजह यह थी कि राष्ट्रपति मोहम्मद ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
(6) ग्वाटेमाला - राष्ट्रपति अरबेंज को इसलिए बेदखल कर दिया क्योंकि उन्होंने अमेरिकी खेतों पर कर लगा दिया था।
(7) कांगों - राष्ट्रपति लुमंबा को इसलिये मृत्युदंड दे दिया गया क्योंकि उन्होंने यूरेनियम खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।
(8) क्यूबा – महान क्रांतिकारी चेग्वेवारा को पकड़कर मार डाला क्योंकि वे समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे।
(9) अफगानिस्तान - अमेरिका ने रूस के खिलाफ स्थानीय मिलिशिया तैयार कर प्रशिक्षित किया और आज वहां की स्थिति हम सबके सामने है। क्या वहां लोकतंत्र स्थापित हो गया?
(10) चिली - राष्ट्रपति साल्वाडोर अलौदे को हटाने की वजह थी, उनके द्वारा तांबे की खदानों का राष्ट्रीयकरण।
(11) घाना - राष्ट्रपति क्वामे को इसलिए देशनिकाला दे दिया गया क्योंकि उन्होंने विदेशी बैंकों को नियंत्रित करने की हिमाकत की थी।
(12) ग्रेनेडा - यहां राष्ट्रपति जनरल हडसन को पकड़कर उम्रकैद दे दी गई क्योंकि वे रूस का साथ दे रहे थे।
तो ईरान में अमेरिका पुन: वही पुराना ‘‘प्रयोग’’ कर रहा है। याद रखिए ईरान दुनिया के सबसे पुराने राष्ट्रों और सभ्यताओं का सम्मिलन है। गौर करिए मोहम्मद मोसादेहा सन् 1951 से 1953 तक ईरान में मजलिस द्वारा चुने गए राष्ट्रपति थे। उन्होंने सन् 1951 में ही एंग्लो-इरानियन आईल कंपनी (अब बी.पी.) का नियंत्रण ब्रिटेन के हाथ से लेकर उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया। सन् 1953 में ऑपरेशन अजाक्स के माध्यम से सी.आई.ए. (अमेरिकी खुफिया एजेंसी) और एम.आई.- 16 (ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसी) ने उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया। वे तीन साल नजरबंद रहे और उसके बाद सन् 1967 में अपनी मृत्यु होने तक वे अहमदाबाद (ईरान) में रहे। उनकी साम्राज्यवाद से सीधी लड़ाई पश्चिमी देशों को रास नहीं आई।
इसके बाद शाह का साम्राज्यवादी शासन पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका को बहुत रास आ रहा था। लेकिन आम ईरानी शोषण और भ्रष्टाचार से त्रस्त थे और परिणाम हुआ सन् 1979 में ईरान में क्रांति या इस्लामी क्रांति सामने आई। इसके बाद ईरान का नया नामकरण इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान हो गया। अयातोल्लाह खौमेनी यहां के प्रमुख बने। अब यहां सर्वोच्च पद पर इमाम होते है पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है। इतिहास के अध्ययन से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि अमेरिका और ब्रिटेन ने वहां नागरिक शासन को नष्ट कर राजशाही को पुर्नस्थापित करवाया और अब 50 बरस बाद पुन: वहां लोकतंत्र के नाम पर कठपुतली सरकार चाहते है जिससे कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तेल भंडार पर उनका सीधा कब्जा हो जाए।
गौरतलब है हमने इस आलेख में करीब 11 राष्ट्राध्यक्षों का तख्तापलट/हत्या/बेदखली जो अमेरिका के माध्यम से हुई का संज्ञान लिया। फेहरिस्त अभी और लंबी है। इस श्रृंखला में नवीनतम नाम अयातुल्लाह खामनेई का है। वे ईरान के राष्ट्रप्रमुख थे, उनका उस पद पर रहना या न रहना वहां की अवाम पर निर्भर करता था। परंतु अमेरिका और इजरायल को वहां अपनी सल्तनत चाहिये थी ठीक वैसी जो वहां राजशाही की वापसी के दौरान थी।
ईरान की मजलिस ने अभी अपना नया नेता चुना और अमेरिका ने उसके सिर के लिए 83 करोड़ रू. पुरस्कार की घोषणा कर दी। परंतु ईरान परजीवी नहीं है। सवाल तो यही है कि इक्कीसवीं शताब्दी में क्या राष्ट्र के तौर पर सिर्फ संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ही रहेगा और बाकी सब उसके उपनिवेश में बदल जाएंगे? (शायद रूस और चीन को छोड़कर) परंतु मुद्दा इससे भी बड़ा यह है कि मानव द्वारा सहस्त्राब्दियों में अर्जित स्वतंत्रता और संप्रभुता किसी एक राष्ट्र या राष्ट्राध्यक्ष की सनक से बिखर जाएगी?
क्या यह इतनी कमजोर और भुरभुरी है कि जो एक झटका भी सहन कर सकती ? पं. जवाहरलाल नेहरू ने तो भारत की आजादी के पहले ही कह दिया था कि विश्व को भविष्य में सबसे ज्यादा खतरा अमेरिका से रहेगा। हमें यह समझना होगा कि कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था हर सूरत में संवाद और संवेदना पर आधारित रहती है। वहीं हिंसा का मतलब है पूरी तरह से संवादहीनता और संवेदनहीनता आज संवादहीनता सिर्फ राष्ट्रों में ही नहीं हमारे और आप जैसे साधारण व्यक्तियों के जीवन में भी घर करती जा रही है।
इसी के परिणामस्वरूप अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा के इस्तेमाल के प्रति हमारा हौसला बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका और इजरायल भी यहीं कर रहे है। भारत जैसे देश भी अपनी गरिमानुकूल आचरण नहीं कर पा रहे है। यह सर्वाधिक आबादी वाले देश की बेबसी का प्रतीक है।
महात्मा गांधी हिंद स्वराज्य के ‘‘गोला बारूद’’ अध्याय में सन् 1909 में ही हिंसा के विस्तार होते स्वरूप को बेहद रोचक ढ़ंग से समझाया है। वे चोर-चोरी का सामान, चोर के विरूद्ध प्रतिकार आदि पर बात करते हुए कहते हैं ‘‘एक हथियारबंद आपको लूट कर ले गया। वह पुनः चुनौती देता है। सब तैयार होकर बैठ जाते हैं। लुटेरा आसपास के लोगों को हैरान करने लगता है। आप कहते हैं, ‘‘मैं यह सब आप लोगों के लिए तो करता हूँ। मेरा जो माल गया उसकी कोई बिसात नहीं।’’
लोग कहते हैं, ‘‘पहले तो वह हमें लूटता नहीं था। आपने जब से उसके साथ लड़ाई शुरु की है तभी से उसने यह काम शुरु किया है।’’ आप कहते हैं कि ‘‘क्या लुटेरे को ऐसे ही छोड़ दिया जाए? इससे तो आपकी इज्जत चली जाएगी।’’ लोग दुविधा में फंस जाते हैं। आप गरीबों से कहते हैं, ‘‘कोई फिक्र नहीं । आइये मेरा धन आपका ही है। मैं आपको हथियार देता हूँ। मैं आपको उसका उपयोग सिखाऊंगा। आप उस बदमाश को मारिये, छोड़िये नहीं। लोगों ने खुद होकर मुसीबत मोल ली। चोर से बदला लेने का परिणाम यह आया कि नींद बेचकर जागरण मोल ले लिया। जहां शांति थी वहां अशांति पैदा हुई। पहले तो जब मौत आती थी तभी मरते थे। अब तो सदा ही मरने के दिन आए।
‘‘ईरान में 150 से ज्यादा छोटी बच्चियों की मौत ने हमारा कलेजा छलनी नहीं किया। क्यों ? क्योंकि हमें लगता है कि हम बच जाएंगे। अभी शायद पंजाब में गैस सिलेंडर की पंक्ति में खड़े एक व्यक्ति की ही मौत हुई है। क्या सदा ही मरने के दिन नहीं आ गए?
युद्ध में कोई पक्ष या कोई विपक्ष नहीं होता सिर्फ़ हिंसा होती है और ‘‘हिंसक समुदाय’’। हम किसी भी ओर हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। युद्ध भले ही अमेरिका, इजराइल बनाम ईरान में हो लेकिन थोड़ा बहुत तो हम सभी मर रहे हैं या मारे जा रहे हैं।
शारीरिक न सही मानसिक और मनोवैज्ञानिक पतन मृत्यु से कमतर नहीं होता। सुना था बिरले ही होते हैं, जो अपनी मौत का जश्न मनाते हैं। मगर आज तो किसी के घर पर, किसी अस्पताल पर, किसी बंदरगाह पर, किसी हवाई अड्डे पर या किसी खेत पर गिरती मिसाइल या बम हमें दुखी नहीं रोमांचित करता है। अपने घर/देश से हजारों मील दूर बैठे राजनीतिज्ञ दूसरे के आशियानों/सपनों को एक नपुंसक ताकत से नष्ट कर रहे हैं।
फरमीदा रियाज इसके बावजूद लिखती हैं,
‘‘मैं सांप बनकर नहीं जी सकती,
अपने ईमान के अटल पत्थर पर
फन पटक-पटक कर जान दे दूंगी।