'इस क्षेत्र को बदनामी से बचाओ, उर्जा मंत्री तो भगवान का बंदा है। उर्जा मंत्री बिजली पोल पर भी चढ़ जाए नाली में उतर जाए। ऐसा जनसेवक नहीं चाहिए हमें। भोपाल जाकर मुख्यमंत्री जी से कहूंगा ऐसा जनसेवक नहीं चाहिए हमें। ऐसा जनसेवक चाहिए जो प्रामाणिकता से काम करे। अगर माननीय मुख्यमंत्री जी की सरकार को कोई बदनाम करेगा तो मैं निवेदन करूंगा कि ऐसे नाकारा मंत्री को उठाओ।''
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक बिजली मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर पर यह आरोप लगा कि उनकी कार्यप्रणाली मोहन सरकार को बदनाम कर रही है। यह आरोप किसी ओर न लगाया होता तो अलग बात थी, बिजली मंत्री प्रद्युम्न सिंह के काम की ऐसी तीखी आलोचना ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायक पन्नालाल शाक्य ने की है।
गुना में अघोषित बिजली कटौती के मुद्दे पर परेशान बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य अपने समर्थकों के साथ बिजली अधिकारियों के पास पहुंचे थे। इस बातचीत के वीडियो में विधायक शाक्य कहते सुनाई दे रहे हैं कि इस क्षेत्र को बदनामी से बचाओ। विधायक पन्नालाल शाक्य अधिकारी से कहते हैं, ''जिनकी यहां की जवाबदारी है इनके नट बोल्ट कसो। वो तो ढीले पड़े हैं बिल्कुल।''
मीडिया से बातचीत में विधायक पन्नालाल शाक्य ने कहा कि, ''हम दूसरे ढंग के हैं। ना अधिकारी का नुकसान हो, ना ही जनता को परेशानी होनी चाहिए, यही निवेदन किया है।'' उन्होंने कहा कि, ''ऐसी स्थिति नहीं बने कि बिजली के मामले में मोहन सरकार बदनाम हो जाए। उसके लिए भी जरुरी बदलाव हैं, वो करें। अक्षम हो तो कुर्सी खाली करो और कुर्सी में बैठे तो अपनी सक्षमता बताओ। बिजली में भले चार्ज लगा लो। मुफ्त में मत चलवाओ और जो मुफ्त में जलाते हैं उन पर केस दर्ज करवाओ।'' विधायक पन्नालल शाक्य का साफ कहना था कि सिंधिया कैम्प के मंत्री प्रद्युम्न सिंह की ''कार्यशैली से मोहन सरकार बदनाम हो रही है।''
बात केवल एक मंत्री की नहीं है। बीजेपी एमएलए पन्नालाल शाक्य ने सिंधिया समर्थक दूसरे मंत्री गोविंद सिंह राजपूत का नाम लिए बिना कहा कि प्रभारी मंत्री महाराज से बड़ा है। वो महाराज के साथ किसी को चलने नहीं देते। मुझे हवाई पट्टी से हटा दिया कि चलो हटो।''
मामला सिंधिया गुट के तीन विधायकों का है, इनमें से दो मंत्री हैं। बात संगठन तक पहुंची है। विधायक पन्नालाल शाक्य तलब भी किए गए हैं। नसीहत के बाद संभव है कि उनके तेवर कुछ ठंडे हो जाएं मगर यह भी सच है कि मन पर पड़ी खरोंच जाती नहीं है।
मुस्कुरा कर मिले, मोहन यादव ने बदल दिया शिवराज का फैसला
मध्य प्रदेश की राजनीतिक सुर्खियों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुलाकात हुई। दोनों की भावभंगिमाओं से राजनीतिक अर्थ निकाले गए। इस मुलाकात की तस्वीर खूब शेयर हुई। यह बात और है कि मुलाकात के बाद मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में मोहन सरकार ने शिवराज सरकार का फैसला बदल दिया है। यह फैसला सरकारी स्कूलों के करीब 92 लाख बच्चों की यूनिफार्म से जुड़ा है।
मोहन कैबिनेट ने निर्णय लिया है कि कक्षा 1 से 8वीं तक के विद्यार्थियों को सत्र 2026-27 से रेडिमेड यूनिफॉर्म दी जाएगी। निविदा प्रक्रिया के लिए मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम को अधिकृत किया गया है। तय किया गया है कि शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने के पहले ही 2 जोडी यूनिफॉर्म प्रदान की जाएगी। यह नई बात नहीं है कि सरकार तैयार यूनिफॉर्म प्रदान करेगी। पहले भी यह व्यवस्था थी लेकिन यूनिफॉर्म की क्वालिटी को लेकर सवाल उठने लगे तो फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यूनिफॉर्म की सिलाई का काम स्व सहायता समूह को दे दिया था। इसमें भी घोटाला हो गया और तमाम शिकायतें सामने आने लगी। तब सरकार ने परेशान होकर यूनिफॉर्म देना बंद किया और यूनिफॉर्म के लिए एक फिक्स अमाउंट, स्टूडेंट के अकाउंट में डायरेक्ट ट्रांसफर करना शुरू किया।
स्कूल शिक्षा विभाग एक बार फिर रेडिमेड यूनिफॉर्म देने का निर्णय ले लिया है जिसके पीछे भ्रष्टाचार से मुक्ति का तर्क दिया गया है। वैसे इस प्रक्रिया में भी भ्रष्टाचार के पुराने अनुभव रहे हैं। वर्ष 2023 में शिकायतें मिली थीं कि अधिकारियों ने ड्रेस सिलवाई नहीं बल्कि बाजार से खरीद लिया गया। बाजार से खरीदी गई यूनिफॉर्म की क्वालिटी घटिया थी। इस मामले के उजागर होने के बाद तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस ने स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए थे।
यूनिफॉर्म देने में हुए लाखों के घोटाले के बाद शिवराज सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को यूनिफॉर्म के लिए सीधे खाते में राशि देने का निर्णय लिया था। अब एक बार फिर बीजेपी की मोहन सरकार ने अपनी ही पार्टी की शिवराज सरकार के एक और निर्णय को बदल दिया है। असल में सरकार यूनिफॉर्म वितरण में होने वाले भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना चाहती है। पहले वाली सरकार भी यही चाहती थी लेकिन सिस्टम ऐसा हो चुका है कि किसी भी राह निकलो भ्रष्टाचार होना तय है और बच्चों का खराब यूनिफॉर्म मिलना थी तय है। भ्रष्टाचार के मुददे पर गोल-गोल घूम रही सरकार का यह निर्णय कारगर नहीं हुआ तो इसे भी बदला जाना तय है।
बीजेपी को चुनौती, दम है तो कार्रवाई करो
बार-बार के विवादास्पद बयानों और अपनी हरकतों के कारण बीजेपी को शर्मसार करने वाले बीजेपी एमएलए मानने को तैयार नहीं हैं। पार्टी की समझाइश के बाद भी विधायक प्रीतम लोधी और चिंतामणि मालवीय कुछ दिन चुप रहे लेकिन इस सप्ताह फिर विवादास्पद बयानों के कारण चर्चा में आ गए।
शिवपुरी जिले के पिछोर में देवी अहिल्या बाई होलकर की 301 वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में आयोजकों ने अहिल्या बाई की तस्वीर के साथ ग्वालियर-चंबल अंचल के कुख्यात डकैत रामबाबू गडरिया की तस्वीर भी रख दी। इतना ही नहीं कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पिछोर से बीजेपी विधायक प्रीतम सिंह लोधी ने डकैत को 'रामबाबू जी' कहकर संबोधित किया और उसे अपना भाई बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि वह रामबाबू से न सिर्फ जेल में मिले, बल्कि जंगल में भी उनके साथ दोस्ती निभाई। विधायक प्रीतम लोधी ने कहा कि क्या एक गुंडा और एक डकैत इंसान नहीं होते हैं? वह बहुत सौभाग्यशाली हैं कि आज उन्हें अपने भाई की तस्वीर पर माल्यार्पण करने का अवसर प्राप्त हुआ है। उन्होंने पाल-बघेल समाज के लोगों को भरोसा दिलाया कि जिस तरह रामबाबू के साथ था, वैसे ही आपके साथ रहकर आपका संरक्षण करूंगा। प्रीतम लोधी के अनुसार रामबाबू गडरिया सामंतशाही से परेशान होकर डकैत बना था।
पांच लाख का इनामी डकैत रामबाबू गड़रिया गिरोह का 1989 से 2007 तक आतंक रहा। दिन-दहाड़े अपहरण, लूट और हत्याओं के साथ कई पुलिसकर्मी भी गिरोह के निशाने पर आए। सबसे खौफनाक वारदात में मुखबिरी के शक में ग्वालियर के भंवरपुरा गांव में 13 गुर्जरों को एक लाइन में खड़ा करके गोली मारने की थी। यह घटना देशभर में सुर्खियां बनी थी। विधायक प्रीतम लोधी वहीं हैं, जिनके बेटे ने कुछ समय पहले राह चलते पांच लोगों पर अपनी थार गाड़ी चढ़ा दी और घायलों को धमकाया। इसके बाद पुलिस कार्रवाई पर विधायक ने एक आईपीएस अधिकारी को धमकी दी थी।
दूसरी तरफ, आलोट सीट से बीजेपी विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में शक्ति का केंद्र जनता या जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि नौकरशाही बन गई है। उन्होंने मुख्य सचिव से लेकर कलेक्टर स्तर तक प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव और रिस्ट्रक्चरिंग की मांग करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से कॉर्पोरेट मॉडल में बदल रही है।
ये नेता मानो बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं कि संगठन में हिम्मत तो इसका कार्रवाई कर के दिखाए। संगठन इन्हें भोपाल बुला कर समझाइश दे सकता है मगर पहले दी गई नसीहतें कारगर नहीं हुईं, अब कितना असर करेगी?
तीखी बयानबाजी पर विरोध के फूल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी तथा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच हुए वाक् युद्ध के बाद प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री को तंज कसते हुए मोहन लाल अभिनंदन यादव कहा था। माना जा रहा है कि उसी बयान के जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुजालपुर की सभा में तीखी प्रतिक्रिया दी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को दो कौड़ी का प्रदेशाध्यक्ष तक कह दिया। इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव और तेज हो गया।
मुख्यमंत्री के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया। मुख्यमंत्री के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कई जिलों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए है। इस विरोध प्रदर्शन की एक विशेषता यह रही कि कांग्रेस ने जवाब में भाषा का स्तर कम न करते हुए दूसरे विकल्प चुने। मुख्यमंत्री के बयान के बाद कांग्रेस प्रदेश्याध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि किसानों की समस्याओं को उठाने पर उन्हें रद्दी कहा जा रहा है। उन्होंने हंगामे की जगह मुद्दे को संवेदनशील बनाने का प्रयास किया और कार्यकर्ताओं ने कहा कि धरना प्रदर्शन की जगह बीजेपी नेताओं को फूल दे कर सीएम के बयान का विरोध किया जाए। ऐसा हो भी रहा है।
पूर्व में देखा गया है कि विपक्ष के प्रदर्शन को दबाने के लिए सरकार द्वारा पुलिस बल का प्रयोग किया जाता है। ऐसे में विरोध को प्रभावी बनाने के लिए कांग्रेस ने विरोध का तरीका बदल दिया है। ऐसा करने पर विरोध दबाने में बल प्रयोग का मौका न मिलेगा और कांग्रेस की बात ज्यादा से ज्यादा जनता तक पहुंच पाएगी।