धार। मध्य प्रदेश के धार स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर एक बार फिर सियासत गर्म है। हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष की मांग को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष अब भोजशाला परिसर में नमाज नहीं पढ़ सकेंगे। हालांकि, मुस्लिम पक्ष अब इस फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती देने की तैयारी में है।

मुस्लिम पक्ष और जैन समाज से जुड़े पक्षकारों ने साफ संकेत दिए हैं कि वे हाई कोर्ट के 242 पन्नों के विस्तृत फैसले का गहन अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। मुस्लिम पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट नूर मोहम्मद शेख ने कहा कि अभी केवल कोर्ट द्वारा घोषित निष्कर्ष सामने आए हैं। सर्वे प्रक्रिया, एएसआई की कार्यप्रणाली, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के पालन सहित कई मुद्दों पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्तियां दर्ज कराई थीं। अब यह देखा जाएगा कि कोर्ट उन आपत्तियों को कितना महत्व दिया है।

मुस्लिम पक्ष ने स्पष्ट किया है कि इस मामले में विशेष अनुमति याचिका दायर की जाएगी। एडवोकेट शेख के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट अब इस विवाद में अंतिम संवैधानिक मंच है और वहां कानूनी आधारों पर फैसले को चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि फैसला पढ़ने के बाद यह तय किया जाएगा कि किन-किन बिंदुओं पर हाई कोर्ट के निर्णय को चुनौती दी जानी है।

मामले में जैन समाज से जुड़े पक्षकारों ने भी संकेत दिए हैं कि वे फैसले का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय करेंगे। उनका कहना है कि भोजशाला का इतिहास केवल हिंदू और मुस्लिम पक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि जैन परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े पहलू भी इसमें शामिल हैं। जैन समाज के कुछ प्रतिनिधियों का मानना है कि फैसले में उनके पक्ष और ऐतिहासिक संदर्भों पर कितना विचार किया गया है, यह निर्णय की विस्तृत प्रति पढ़ने के बाद ही स्पष्ट होगा।

बता दें कि हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में एएसआई की 2100 पन्नों की सर्वे रिपोर्ट को अहम माना है। 2024 में 98 दिनों तक चले वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान भोजशाला परिसर से जुड़े कई पुरातात्विक तथ्यों का अध्ययन किया गया था। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि उन्होंने सर्वे प्रक्रिया और रिपोर्ट पर कई आपत्तियां दर्ज कराई थीं। अब यह देखा जाएगा कि कोर्ट ने उन बिंदुओं पर क्या निष्कर्ष निकाला है।