भोपाल। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR के दौरान मतदाता सूची तैयार करने वाले Electoral Registration Officers यानी ERO के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं और डिजिटल सिस्टम के जरिए चुनावी प्रक्रिया का केंद्रीयकरण किया जा रहा है।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि निष्पक्ष चुनाव के लिए निष्पक्ष चुनाव आयोग जरूरी है। उन्होंने गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का उदाहरण देते हुए कहा कि इन मतदाताओं के मामले में ERO ने सुनवाई के बाद उनके नाम जोड़ने के आदेश दिए, लेकिन पोर्टल पर उन नामों को जोड़ने की व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल खड़ा होता है कि जब ERO किसी मामले में फैसला कर चुका है तो उसे लागू करने का अधिकार उसके पास क्यों नहीं है।

बता दें कि हालिया रिपोर्टों में भी गोवा के 97 मतदाताओं का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन मतदाताओं को ERO स्तर पर योग्य पाए जाने के बावजूद अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सका और ECINet में उन्हें वापस जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। दिग्विजय सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची से जुड़े अधिकारों का इस तरह केंद्रीयकरण लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी आपत्तियां सामने आई हैं और इस पूरे मामले को गंभीरता से समझने की जरूरत है।

दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि SIR और मतदाता सूची में नाम काटे जाने के मुद्दे को गांव-गांव और पोलिंग बूथ तक ले जाना होगा। जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से कटे हैं, उनकी पहचान कर उन्हें दोबारा जुड़वाने के लिए प्रयास करना चाहिए। पूर्व सीएम ने कहा कि उनकी लड़ाई केवल राजधानी या जिला स्तर पर नहीं, बल्कि हर पोलिंग बूथ पर है। उन्होंने कांग्रेस के जिला अध्यक्षों और विधायकों से अपील की कि SIR से जुड़े बुकलेट और अन्य सामग्री प्रत्येक पोलिंग बूथ तक पहुंचाई जाए, ताकि लोगों को चुनावी प्रक्रिया में हो रहे बदलावों और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों की जानकारी दी जा सके।

पूर्व सीएम ने कहा कि चुनाव आयोग को यह भी बताना चाहिए कि SIR के दौरान कितने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं के नाम काटे गए और कितने नाम जोड़े गए। विधानसभा क्षेत्रवार यह जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, क्योंकि भविष्य में परिसीमन और आरक्षित सीटों की स्थिति पर भी मतदाता संख्या का असर पड़ेगा।