ऐसा लग रहा है जैसे मध्‍यप्रदेश में सबकुछ अफसरों का ही किया धरा है। यहां जनप्रतिनिधियों की कोई सुन ही नहीं रहा है। तभी तो इंदौर में दूषित पानी वितरित किया जाता रहा है। डेढ़ दर्जन लोगों की मौत हो गई और नेता कह रहे हैं, अफसर हमारी सुन नहीं रहे हैं। भोपाल में गोकशी हो रही है, गोमांस का व्‍यापार हो रहा है। वह भी बीजेपी सरकार की नाक के नीचे बल्कि सहमति से। इसका दोषी अफसरों पर है कि उन्‍होंने ही गोकशी पर रोक जैसे बीजेपी के एजेंडे को ही बेच दिया। 

सवाल यह है कि क्‍या अफसरों पर दोष है कि उन्‍होंने स्‍लाटर हाउस का ठेका उस असलम चमड़ी को दे दिया जिस पर गोकशी और गौवंश तस्‍करी का आरोप था। यह ठेका महापौर परिषद ने स्‍वीकृत किया था। महापौर परिषद की प्रमुख महापौर मालती राय है। सवाल उठ रहा है कि क्‍या महापौर परिषद ने स्‍वीकृति देते समय ठेकेदार के पुराने रिकार्ड की पड़ताल नहीं की थी। 

अब हंगामा हुआ है तो आरोपी को जेल भेजा गया है। बीजेपी विधायक रामेश्‍वर शर्मा एनएसए की कार्रवाई की बात कह रहे हैं। कांग्रेस ने प्रदर्शन कर सवाल उठाए हैं कि महापौर परिषद इस मामले में दोषमुक्‍त कैसे है। इसके पहले ‘लव जेहाद’ तथा ड्रग्‍स सहित अन्‍य अपराधों के आरोपी मछली कारोबारी शारिक मछली के परिवार पर कार्रवाई की गई थी। मछली परिवार बीजेपी को फंडिंग करता था, उसके परिजन बीजेपी पदाधिकारी भी थे। हिंदु संगठनों ने लव जेहाद का मुद्दा उठाया तो मछली पर कार्रवाई की गई। तब फोटो जारी कर उसकी बीजेपी नेताओं के साथ निकटता को बताया गया था। 

पहले मछली और अब गाय, जिन मुद्दों पर बीजेपी अपना पूरा राजनीतिक नेरेटिव खड़ा करती है, उन्‍हीं मामलों पर अफसर कैसे पलिता लगा सकते हैं? जबकि सब उनकी जानकारी में होता है। तर्क दिए जा रहे हैं कि ऐसे सभी मामले बीजेपी नेताओं के प्रश्रय में ही होते हैं। जब बात खुल जाती है तो दोष अफसरों के सिर मढ़ दिया जाता है। यह एक तरफ संरक्षण देना तथा दूसरी तरफ विरोध करने जैसा है। बीजेपी नेता खामोश हैं और हिंदुवादी संगठन हंगामा मचा रहे हैं। 

बाबर के नाम पर अडंगा, अफसरों की ठसक टूटी 

अफसरों के आयोजन पर एक बार फिर हिंदुवादी संगठनों ने टेढ़ी निगाह कर दी है। इस बार भी एक सत्र को रद्द कर दिया गया है। अब आगे पूरे आयोजन से सरकारी भागीदारी खत्‍म करवाने की मुहिम छेड़ दी गई है। मामला है, भारत भवन में आयोजित तीन दिवसीय भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलफ) से जुड़ा है। इस आयोजन में ‘बाबर क्वेस्ट फॉर हिंदुइज्म’ विषय पर एक सत्र रखा गया था। इस पर हिंदुवादी संगठनों और साहित्‍यकारों ने गहरी आपत्ति दर्ज करवाई। उनका उनका सवाल है कि साहित्यिक मंच पर ऐसे ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से विवादित विषयों को किस उद्देश्य से जगह दी जा रही है। यह समाज में संवाद के बजाय टकराव को बढ़ावा दे सकता है।

हिंदु उत्सव समिति ने श्यामला हिल्स थाने में लिखित शिकायत दर्ज कर आयोजन पर रोक लगाई ने और प्रकरण दर्ज कराने की मांग की है। एमपी साहित्‍य अकादेमी ने साफ किया कि वे इस आयोजन की भागीदार नहीं हैं। अन्‍य संगठनों ने आयोजन से सरकारी भागीदारी खत्‍म करने की मांग की। विरोध के चलते सत्र निरस्‍त कर दिया गया और आयोजन स्थल पर पोस्टर पर सफेद कागज चिपका दिया गया। 

मुख्‍य मुद्दा भारत भवन और कलाकारों के संबंध का है। भारत भवन कलाकारों तथा उनके संगठनों को किराए पर दिया नहीं जाता है। जबकि अफसरों की संस्‍था को यह आसानी से दिया जाता है बल्कि सरकारी संस्‍थाएं धन भी देती हैं। इसका कारण यह है कि भोपाल लिट फेस्‍ट साहित्यिक आयोजन कम और रिटायर्ड व वर्तमान आईएएस अफसरों का इमेज मेकिंग आयोजन अधिक है। देश के अन्‍य लिट फेस्‍ट की तुलना में भोपाल लिट फेस्‍ट अफसरी ठसक के कारण जाना जाता है। अब सवाल उठ रहे हैं कि कलाकारों के लिए सख्‍त रहने वाला संस्‍कृति विभाग आईएएस अफसरों के लिए कारपेट बिछा देता है। जबकि ऐसी ही आपत्ति पर ग्‍वालियर में बरसों से होने वाले बिटिया उत्‍सव पूरा ही खत्‍म कर दिया गया था। अब तो आरोप लग रहे हैं कि रिटायर्ड आईएएस अगुआई वाले भोपाल लिट फेस्‍ट के लिए तो बाकायद आईएएस अफसरों ने भीड़ जुटाई है। मुहिम सफल हुई तो अफसरों के इस आयोजन की ठसक अगले साल सरकारी मदद से वंचित होगी। 

अदने से पुलिसकर्मी को कोर्ट का सपोर्ट, नेतागिरी किनारे 

जबलपुर के एक छोटे से पुलिसकर्मी को हाईकोर्ट से सपोर्ट दे कर बीजेपी नेता की नेतागिरी को किनारे कर दिया है। मामला सड़क पर धमकाने का है। हेलमेट चेकिंग के दौरान पूर्व महापौर बीजेपी नेता प्रभात साहू ने अदने से पुलिसकर्मी से अभद्रता की थी। मामला थाने पहुंचा था। रसूख के आगे पुलिस ने सरेंडर कर दिया और बीजेपी नेता पर नामजद मुकदमा दर्ज करने के बदले ‘अज्ञात’ को आरोपी बना दिया। इतना ही नहीं ईमानदारी से ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी को ही सस्पेंड कर दिया गया और उल्टा उसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कर ली गई। 

मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब थानों में पुलिसकर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं तो वे आम जनता को सुरक्षा कैसे देंगे? कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को पुलिस विभाग का मनोबल गिराने वाला बताया है। हाई कोर्ट ने जबलपुर के पूर्व महापौर प्रभात साहू और पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। लार्डगंज थाना प्रभारी 20 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश हो कर दोनों एफआईआर की केस डायरी पेश करेंगे। उम्‍मीद कर सकते हैं कि कर्मचारियों को धमकाने वाले बीजेपी नेताओं को राहत देने वाले प्रशासन के लिए यह केस नजीर बनेगा और कर्मचारी राजनीतिक रूप से प्रताडि़त नहीं होंगे।   

अफसरों की धड़कनें थमने, बढ़ने का समय आ गया 

बेहतर पोस्टिंग का इंतजार कर रहे और अपनी वर्तमान मनचाही पोस्टिंग को बचाने का जतन कर रहे अफसरों की धड़कनें बढ़ने और थमने का मौका आ गया है। मैदान से लेकर मंत्रालय तक पदस्‍थ आईएएस अफसरों के कामकाज की समीक्षा का रिजल्‍ट आने को है। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने 15 जनवरी को कलेक्टर, कमिश्नर, नगर निगम आयुक्त, जिला पंचायत और स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की कांफ्रेंस बुलाई है। इस कांफ्रेंस में से लेकर मुख्य सचिव कार्यालय और सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा तैयार अफसरों के कामकाज की समीक्षा को बताया जाएगा। 

इसके बाद ही इसके बाद नई पदस्‍थापना का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा। अभी कलेक्टर से लेकर सचिव स्तर के पदोन्नत अधिकारी भी नई पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। इन अधिकारियों को पदोन्नत करते हुए वर्तमान पदों को उच्च पद के बराबर बना दिया गया है। अब अफसर कोशिश में है कि समीक्षा का रिजल्‍ट तो बेहतर हो ही, पोस्टिंग भी मनचाही मिल जाए। स्‍वाभाविक है कि इसके लिए राजनीतिक और प्रशासनिक जोड़-तोड़ भी जारी हो गए हैं।