बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक में हुई बातें ज्यों-ज्यों बाहर आ रही हैं, ब्यूरोक्रेसी से नाराजगी की परतें खुलती जा रही हैं। खबरों के मुताबिक डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने बैठक में अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि कई अधिकारी जनप्रतिनिधियों और सरकार की अपेक्षाओं के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं। उन्होंने एनएसयूआई कार्यकर्ताओं के घर में घुसने से जुड़ी एक घटना का भी जिक्र किया। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं पर प्रशासन को सावधानी से काम करना चाहिए। हालांकि, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तपाक से कह दिया कि आपके पास महत्वपूर्ण विभाग है, कफ सिरप से मौत जैसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? 

खबर है कि उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अधिकारियों के व्यवहार का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वह अपने संसदीय क्षेत्र में लगातार आते-जाते हैं, फिर भी कई बार कलेक्टर तय प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते। इस नाराजगी ने उन आरोपों और आंकलन की पुष्टि की है कि अफसर मंत्रियों की भी नहीं सुन रहे हैं। एक तरफ मंत्री अपने विभाग में अफसरों के व्यवहार की शिकायत कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सत्ता के मुखिया का सपोर्ट अपने अफसरों को है, मंत्रियों के साथ नहीं है। यही कारण है कि बैठक में इस चर्चा का अंत इस बात से हुआ कि प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

कांग्रेस भी पूछ रही, अफसरों का हिसाब

राजनीतिक नेतृत्व को अफसर नजरअंदाज कर पा रहे हैं क्योंकि उन्हें सत्ता से शह मिल जाती है। अफसरों का एटीट्यूड ठीक नहीं होने की शिकायत केवल बीजेपी के नेता नहीं कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस भी इसका हिसाब मांग रही है। कांग्रेस नाराज है कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बालाघाट पहुंचे और प्रोटोकॉल का नजरअंदाज कर कलेक्टर और एसपी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं रहे। कांग्रेस इसे केवल अफसरों के कार्यक्रम में अनुपस्थित रहने तक सीमित नहीं रखना चाहती है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि दौरे की सूचना प्रशासन को थी। सवाल यह है कि अधिकारियों को क्या निर्देश मिले थे और उनकी गैरमौजूदगी की वजह क्या थी? जांच की मांग करते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है। कांग्रेस जानना चाहती थी कि प्रशासन को दौरे की सूचना कब मिली थी? कलेक्टर और एसपी की क्या जिम्मेदारी तय थी? क्या उनकी जगह दूसरे अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई? सुरक्षा और प्रोटोकॉल पर क्या लिखित निर्देश जारी हुए? राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय ने क्या निर्देश दिए? जिला प्रशासन ने क्या लिखित निर्देश जारी किए?  कांग्रेस का यह रूख इस मुद्दे को लंबे समय तक जीवित रख सकता है। 

कम से कम मुख्यमंत्री को हुई शिकायत तो सुनो 

अफसरों के कार्य व्यवहार पर जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही नाराज हो तब मुख्य सचिव की ओर से जारी निर्देश भी मायने रखते हैं। मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने सभी जिला कलेक्टरों को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने जिलों में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के अंतर्गत दर्ज शिकायतों का विस्तृत विश्लेषण तैयार करें। यह काम एक माह में करना होगा। कलेक्टरों से कहा गया है कि वे बताएं कि उनके क्षेत्र में किन विषयों और किन क्षेत्रों से सबसे ज्यादा शिकायतें आ रही हैं। प्रशासनिक मुखिया की कोशिश है कि जिन क्षेत्रों और विषयों में ज्यादा शिकायत पाई जाएंगी वहां विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा। समस्याओं के स्थायी निराकरण के लिए एक तंत्र विकसित किया जाए। सीएस अशोक वर्णवाल की कोशिश यह भी है कि आवेदकों को बेवजह दफ्तरों के चक्कर न कटवाए जाएं। शिकायतों को अपने कार्यक्षेत्र से बाहर का बताने की आदत भी खत्म हो। अब नए सीएस की यह पहल कलेक्टर कितनी पूरी करेंगे, उससी से जनता का संतोष पता चलेगा। 

भागीरथपुरा में आखिर दोष छोटे अफसरों का ही

भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण हुई 35 मौतों को लेकर जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। इसमें इंदौर में पदस्थ रहे आधा दर्जन आईएएस को जिम्मेदार नहीं माना गया है। जबकि दोषी छोटे अफसर ही हैं। भागीरथपुरा कांड की 112 पन्नों की रिपोर्ट में पूर्व निगम कमिश्नर व वर्तमान इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा, पूर्व निगम कमिश्नर व वर्तमान में एमडी पर्यटन दिलीप यादव, पूर्व निगम कमिश्नर व वर्तमान सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल को क्लीन चिट दी गई है। साफ तौर पर कहा गया है कि प्रशासनिक तौर पर निगम में पानी के काम की जिम्मेदारी एडिशनल कमिशनर स्तर पर होती है, ऐसे में निगम कमिश्नर स्तर पर कोई भी देरी नहीं हुई है। इनके द्वारा प्रशासनिक तत्परता से काम किया गया है।

तत्कालीन एडिशनल कमिशनर आईएएस भव्या मित्तल और रोहित सिसोनिया की ओर से दो टेंडर के काम में देरी बताई गई है। हालांकि सीधे तौर पर इनकी जिम्मेदारी नहीं बनती है क्योंकि फाइल को पुटअप करने में और प्रशासनिक काम में लापरवाही टेक्निकल और इंजीनियर फील्ड के अधिकारियों द्वारा की गई।  जांच रिपोर्ट में पाया गया कि एग्जीक्यूटिव इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव  2013 से ही जल शाखा में पदस्थ हैं। हर टेंडर से लेकर मॉनिटरिंग काम में उनकी जिम्मेदारी थी। वहीं, वह इसमें खासे विफल रहे और पूरी तरह से जिम्मेदारी उनकी बनती है।

अब सवाल यह है कि छोटे अफसर दोषी और जिम्मेदार हैं तो बड़े अफसर क्या करते हैं? वे सिस्टम दुरुस्त भी नहीं कर पाते? मुद्दा यह भी है कि 2019 में प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने जल दूषित होने की रिपोर्ट दी थी। इसके आधार पर तत्काल काम किए जाने की जरूरत थी, जो उस समय आगे बढ़कर नहीं किए गए। वर्ष 2025 में भी पानी के सैंपल रिपोर्ट खराब आई थी। लगातार शिकायतें आ रही थीं। सीवर और पानी की लाइन में दूरी नहीं थी। वहीं कई जगह यह क्रॉस हो रही थी, लेकिन इसमें लीकेज का ध्यान नहीं रखा गया। इन सभी कारणों से पानी दूषित हुआ और इसके कारण यह कांड हो गया तो प्रशासनिक अधिकारियों ने इन लापरवाहियों की निगरानी क्यों नहीं की?

आप तो ऐसे न थे साहब...

खण्डवा कलेक्टर ऋषभ गुप्ता का एक वीडियो खूब वायरल हुआ। जो उन्हें जानते हैं कि वे अचरज में है कि ऋषभ गुप्ता ऐसा कैसे कर सकते हैं? मामला कुछ यूं है कि अपनी दुकान से जुड़े विवाद को लेकर करीब 10 सालों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे 65 वर्षीय प्रकाशचंद राजाणी मंगलवार को जनसुनवाई में कलेक्टर ऋषव गुप्ता के पास पहुंचे थे। कलेक्टर ने बुजुर्ग का आवेदन संबंधित अधिकारी को फॉरवर्ड कर दिया और उन्हें जाने को कहा। वे इस कार्रवाई को समझ नहीं पाए। उन्होंने सिर्फ इतना पूछ लिया कि आवेदन पर क्या लिखा गया है? अपने सवाल कलेक्टर ऋषभ गुप्ता को सहन नहीं हुआ और जानकारी देने के बजाय उन्होंने पुलिसकर्मियों को बुजुर्ग को बाहर निकालने का फरमान सुना दिया। इस पर कर्मचारियों और आवेदक बुजुर्ग के बीच तीखी बहस हुई। इसके बाद पुलिस उन्हें खींचकर बाहर ले गई। 

बात यहीं नहीं थमी। जब कलेक्टर ऋषभ गुप्ता को अहसास हुआ कि घटना का वीडियो बन गया है तो वे पत्रकारों पर नाराज हुअए रिकॉर्डिंग बंद करवा दी। लेकिन वीडियो तो वायरल हो चुका। इस पूरे घटनाक्रम ने 2014 बैच के आईएएस अधिकारी ऋषव गुप्ता के रवैये पर कई सवाल उठ रहे हैं। वे आईआईटी दिल्ली से पढ़ाई कर कॉरपोरेट की नौकरी कर चुके हैं। एक सवाल पूछने पर उनकी कॉरपोरेट स्टाइल में कलेक्टरी लोगों को पसंद नहीं आई। उनके पहले के व्यवहार से प्रभावित लोग भी हैरत में पूछ रहे हैं, साहब, आप तो ऐसे नहीं थे?