विपक्ष का कोई नेता कहे तो आरोप को नजरअंदाज भी किया जा सकता है मगर यहां तो सत्ता पक्ष बीजेपी के एमएलए तथा पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया ने अफसरों को डकैत कह दिया है। वरिष्ठ नेता का आक्रोश देख समझा जा सकता है कि प्रदेश में करप्शन किस स्तर तक जड़े जमा चुका है कि बीजेपी एमएलए भी सार्वजनिक रूप से नाराजग जाहिर करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
मामला दमोह के कलेक्ट्रेट सभागार में हुई बैठक का है। कामकाज की समीक्षा के दौरान बीजेपी एमएलए जयंत मलैया ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। गरीबों के लिए आने वाले सरकारी धन का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। मैं यहां एक बात रखना चाहता हूं कि नेता लोग और कर्मचारी पैसे खा रहे हैं। यहां तक कि पार्षद भी गरीब लोगों से पैसे खा रहे हैं। इसमें नगर पालिका को लोग भी शामिल हैं। इसमें कोई भी पार्टी वार्टी की बात नहीं है।
पार्टी-वार्टी की बात नहीं है कह कर जयंत मलैया ने बता दिया कि उनका आक्रोश पार्टी लाइन से अलग है। वे इस बात से खफा हैं कि सिस्टम से जुड़े लोग अपने हित साधने में लगे हैं। बीजेपी के वरिष्ठ नेता पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया का यह खुला और सीधा आरोप सुन कर बैठक में सभी सन्न रह गए। पास में बैठे कलेक्टर प्रताप नारायण यादव भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाए। पूर्व मंत्री जयंत मलैया ने केवल विपक्ष ही नहीं बल्कि बीजेपी नेताओं की पीड़ा को भी स्वर दे दिया है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार इस कदर फैल रहा है कि आम आदमी के सामान्य आवश्यक कार्य भी नहीं हो पा रहे हैं।
बालाघाट में बच्चों की मौत पर कलेक्टर की खीज
बालाघाट के बैहर-बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौत के मामले थम नहीं रहे हैं। शुक्रवार रात फिर बैगा आदिवासी बच्चे की मौत की खबर ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की हकीकत जाहिर कर दी है। बैहर-बिरसा अंचल में बच्चों की लगातार हो रही मौतों को लेकर आंकड़ों में भी अंतर है। स्थानीय स्तर पर तथा मीडिया में अब तक 30 बच्चों की मौत होने का दावा किया जा रहा है, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 10 मौतें होना ही दर्ज है। जबकि प्रशासन ने दो दिन पहले ही 24 मृत बच्चों के परिजनों के बैंक खातों में दो-दो लाख रुपये की सहायता राशि हस्तांतरित की है तो मौत के सरकारी आंकड़ें पर संदेह और आक्रोश बढ़ गया है।
एक तरफ इस राशि को कम बताते हुए ज्यादा सहायता की मांग की जा रही है वहीं बच्चों की मौत का कारण हेल्थ सिस्टम की खामियां बताते हुए आक्रोश में बालाघाट बंद भी रखा जा चुका है। जबकि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग बीमारी की रोकथाम तथा प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के प्रयासों का दावा कर रहा था। जनता के आक्रोश के बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को हटा दिया गया है।
इस बीच लापरवाही के आरोपों से जिला प्रशासन ने आलोचनाओं का मुंह बंद करने की कोशिश की। कलेक्टर सत्यम कुमार के निर्देश पर आदेश निकाला गया कि जिले में किसी भी स्कूल या अस्पताल में बिना अनुमति मीडिया, यूट्यूबर सहित अन्य व्यक्तियों का प्रवेश प्रतिबंधित होगा। यह आदेश 3 नवंबर तक के लिए लागू था। माना गया कि देश भर में हो रही आलोचना से खीज कर कलेक्टर ने यह आदेश निकलवाया। इसे मीडिया को रोकने तथा आलोचना का गला घोंटने की कोशिश बताया गया।
कहा गया कि प्रशासन बच्चों की मौत नहीं रोक पा रहा है लेकिन उससे जुड़ी खबरों को ही रोकने की कोशिश कर रहा है। क्या किसी व्यक्ति के स्कूल या अस्पताल में जा कर वीडियो बनाने, फोटो लेने या किसी से उसके दर्द पर बात करने लेने से बच्चों की मौत रूक जाएगी? सवाल उठे कि सच को डंडे में दम पर छिपाने की कोशिश क्यों हो रही है? विरोध तेज हुआ तो जिला प्रशासन ने आदेश वापस ले लिया।
पीडब्ल्यूडी अब अफसरों को देगा सजा!
सुनने में यह बात अचरज भरी लग सकती है कि मध्य प्रदेश में लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी विभाग की गड़बड़ियों के दोषी अफसरों को भी दंड भुगतना होगा। अब तक पुल गिरे या इमारत ढहें, तकनीकी खामी हो या वित्तीय गड़बड़ी हमेशा दोषी सिर्फ ठेकेदार को माना जाता है। पुल की डिजाइन गलत हो या गलत नक्शा नोटिस केवल ठेकदार को दिया जाता था। कई बार ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट भी कर दिया जाता था। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में टेंडर पास करने वाले इंजीनियर और अफसर बच निकलते थे। उन पर कोई सीधी जिम्मेदारी तय नहीं होती थी। कभी मामला बड़ा हुआ और वे निलंबित हुए तो जांच से बच कर निकल आते थे।
लेकिन अब विभाग ने पीडब्ल्यूडी ने यह फैसला लिया है कि सड़क और बड़े भवनों के निर्माण कार्यों में अब सिर्फ ठेकेदार पर कार्रवाई नहीं होगी, दोषी अफसर भी सजा भुगतेंगे। विभाग ने टेंडर प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर बनी कमेटियों की जिम्मेदारी नए सिरे से तय की है। इसके तहत तकनीकी और वित्तीय जांच करने वाली समितियों के अधिकारियों की जवाबदेही साफ कर दी गई है। उम्मीद कर सकते ही यह व्यवस्था हाथी के दिखाने के दाँत की तरह नहीं होगा बल्कि इसका असर भी मैदान पर दिखाई देगा। ऐसा हुआ तो अफसरों की लापरवाही के कारण बदनाम पीडब्ल्यूडी विभाग की साख में सुधार शुरू हो जाएगा।
मध्यप्रदेश में फर्जी आईएएस का बोलबाला
यह एक तथ्य है कि मध्य प्रदेश में आईएएस-आईपीएस अफसरों का टोटा लेकिन यह कोई वजह तो नहीं है कि प्रदेश में फर्जी अफसरों का बोलबाला और लूट हो जाए। बीते कुछ ही दिनों में भोपाल और इंदौर में फर्जी अफसर बनकर रौब गांठने और ठगी करने के 3 अलग-अलग मामले सामने आए हैं. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए फर्जी IAS तृप्ति सिंह, नकली कलेक्टर हिमांशु पांचाल और फर्जी आईपीएस ऋषि यादव को गिरफ्तार किया है।
फेक आईएएस अधिकारी बनने का पहला मामला भोपाल में सामने आया जब सोशल मीडिया पर वायरल तृप्ति सिंह को फर्जी आईएएस पाया गया। तृप्ति सिंह ने खुद को आईएएस बता कर लोगों से लाखों रूपए ठग लिए थे। यहां कि पति ने भी तृप्ति सिंह पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए। भोपाल में ही पुलिस ने एक ऐसे शातिर ठग को गिरफ्तार किया है जो खुद को 2016 बैच का आईपीएस अधिकारी बताता था। झांसी निवासी ऋषि कुमार यादव बेरोजगार युवाओं को सरकारी नौकरी लगवाने का झांसा देकर लाखों रुपये की ठगी करता था। वह खुद को कभी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का जॉइंट इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर तो कभी इंटेलिजेंस ऑफिसर बताता था।
साइबर क्राइम के बढ़ते मामलों के बीच आकर्षक रील्स से अफसरों सा जलवा दिखला रहे फर्जी आईएएस-आईपीएस भी एक चुनौती बने हुए हैं।