अहमदाबाद। गुजराती फिल्म संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत के चर्चित संगीतकार, अरेंजर और गायक गौरांग व्यास का 2 सितंबर की देर रात अहमदाबाद में निधन हो गया। उन्होंने 87 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन से कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। कलाकारों, गायकों और संगीत प्रेमियों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके योगदान को याद किया। गौरांग व्यास का अंतिम संस्कार उनके अहमदाबाद स्थित आवास से निकली अंतिम यात्रा के बाद किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गौरांग व्यास के निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि गुजराती संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाते हुए व्यास ने अपनी अलग पहचान बनाई। पीएम मोदी ने उनके निधन को गुजरात के लिए एक प्रतिभाशाली रचनाकार की क्षति बताते हुए कहा कि गुजराती संगीत में उनके अमूल्य योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिवार व उनके प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

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गौरांग व्यास का जन्म 24 नवंबर 1938 को मुंबई में हुआ था। वे प्रसिद्ध संगीतकार और पद्मश्री सम्मानित अविनाश व्यास के बेटे थे। पिता से मिली संगीत की विरासत को आगे बढ़ाने के बावजूद उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत की ओर था। महज पांच साल की उम्र में वे हारमोनियम पर वैष्णव जन तो बजा लेते थे।

उन्होंने मुंबई के पोदार हाई स्कूल से माध्यमिक शिक्षा हासिल की और अहमदाबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। शुरुआती दौर में उन्होंने मुंबई की खंडेलवाल इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया लेकिन जल्द ही नौकरी छोड़कर पूरी तरह संगीत को अपना लिया।

गुजराती सिनेमा में उनका सफर पुरूषोत्तम उपाध्याय के साथ फिल्म लीलुड़ी धरती से जुड़ा। इसके लिए दोनों को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार मिला। बाद में उन्होंने अपने पिता अविनाश व्यास के साथ ऊपर गगन विशाल के संगीत पर काम किया और जेसल तोरल में उनके सहायक रहे थे।

गौरांग व्यास ने 1976 में लाखा फुलाणी से स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर शुरुआत की थी। फिल्म के गीत अविनाश व्यास ने लिखे थे। इसके एक हास्य गीत के लिए उन्होंने हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय गायक किशोर कुमार की आवाज का इस्तेमाल किया था। इसी फिल्म से गायक प्रफुल्ल दवे को भी बड़ा मौका मिला। व्यास ने उनसे मनियरो ते हालु हालु थई रे वियो गीत गवाया जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

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प्रफुल्ल दवे ने गौरांग व्यास को याद करते हुए कहा कि उनके करियर को आकार देने में व्यास की बड़ी भूमिका थी। उनके मुताबिक मनियरो और प्रफुल्ल दवे दोनों पहले से मौजूद थे लेकिन 1974 में लाखा फुलाणी की रिकॉर्डिंग के बाद दोनों को व्यापक पहचान मिली। दवे ने व्यास को एक सुसंस्कृत, सरल और निर्विवाद व्यक्तित्व वाला इंसान बताते हुए कहा कि वे धैर्य रखते थे और कभी खुद को दूसरों पर थोपते नहीं थे। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर वे गर्व से कह सकते हैं कि गौरांगभाई ने उन्हें प्रफुल्ल दवे बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया।

गौरांग व्यास ने गुजराती सिनेमा की 100 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। उन्होंने गुजराती फिल्मों में आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर, प्रीति सागर और भूपेंद्र सिंह जैसे हिंदी के चर्चित गायकों की आवाज पहुंचाई। लता मंगेशकर ने भी उनकी धुन पर फिल्म पारकी थापन का लोकप्रिय विदाई गीत दीकरी तो पारकी थापन कहेवाय गाया था। केतन मेहता की 1981 में आई फिल्म भवनी भवई में उनका संगीत विशेष रूप से याद किया जाता है। प्रयोगधर्मी संगीत के लिए पहचान बनाने वाले व्यास को गुजराती फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ संगीत के करीब 11 पुरस्कार मिले।

सिनेमा के अलावा उन्होंने गुजराती सुगम संगीत को भी समृद्ध किया। उन्होंने नामी गुजराती गीतकारों और गजलकारों की रचनाओं के लिए 500 से ज्यादा संगीत संयोजन तैयार किए थे। रास और गरबा को नए संगीत संयोजनों के जरिए लोकप्रिय बनाने में भी उनकी अहम भूमिका रही थी। उनका काम नृत्य नाटिकाओं, टीवी धारावाहिकों, लोक संगीत और भक्ति संगीत तक फैला हुआ था।

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अहमदाबाद में 1961 में गुजराती सुगम संगीत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित संस्था श्रुति से भी वे लंबे समय तक जुड़े रहे और इसके मार्गदर्शक व्यक्तित्वों में शामिल रहे थे। उनके संगीत निर्देशन में HMV (His Master's Voice) ने श्रावणमाधुरी और सागरनु संगीत जैसे रिकॉर्ड तैयार किए थे। गुजरात स्टेट स्कूल टेक्स्टबुक बोर्ड की गीत रे गीत श्रृंखला में भी उनका संगीत शामिल रहा था।

गायक और संगीतकार श्यामल मुंशी ने गौरांग व्यास को याद करते हुए कहा कि उनके साथ उनका रिश्ता केवल संगीत तक सीमित नहीं था बल्कि बचपन से ही पारिवारिक आत्मीयता जैसा था। उन्होंने व्यास को गुजराती सुगम संगीत और फिल्म संगीत का बेहद सक्षम, बहुआयामी और प्रतिभाशाली संगीतकार बताया। मुंशी ने बताया कि व्यास अपनी नई रचना सबसे पहले उन्हें हारमोनियम पर सुनाया करते थे। उनके मुताबिक, जब तक लोग गुजराती संगीत सुनते रहेंगे तब तक गौरांग व्यास का नाम मिट नहीं सकता।

गायक संजय ओझा ने कहा कि गुजराती फिल्मों, सुगम संगीत, गीतों, भजनों, गरबा और गजल में गौरांग व्यास का योगदान बेहद व्यापक था। उन्होंने कहा कि उनके जैसा कलाकार दोबारा मिलना मुश्किल है। ओझा के अनुसार, जिस समय रिकॉर्डिंग के लिए मुंबई को केंद्र माना जाता था उस दौर में व्यास ने अहमदाबाद और गुजरात में ही एक मजबूत संगीत व्यवस्था खड़ी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

ओझा ने बताया कि 1985 में मुंबई में एक गुजराती फिल्म के लिए उन्हें पहली बार प्लेबैक गायक के तौर पर मौका भी गौरांग व्यास ने दिया था। इसके बाद दोनों का संबंध लगातार बना रहा। उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों, डॉक्यूमेंट्री और सुगम संगीत गीतों में साथ काम किया। व्यास ने ओझा के कई चर्चित गीतों को संगीत दिया। इनमें एक पाटन शहरनी नार पदमणी, अहमदाबादनो रिक्शावालो, अमाथुं जरक अमे पूछ्युं के केम छो, जीवन पुष्पना पाने पाने पांगरे रे मानसाई, हुं तो सुती और आता-पता अहमदाबाद शामिल हैं।

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कवि अंकित त्रिवेदी ने उनके निधन को गुजराती संगीत के एक स्वर्णिम दौर का अंत बताया। उन्होंने कहा कि सात सुरों के जिस पते पर हमेशा गौरांग व्यास जैसे व्यक्ति से मुलाकात होती थी वह पता अब खामोश हो गया है। त्रिवेदी के मुताबिक, व्यास ने गुजराती संगीत को उच्च स्तर तक पहुंचाया और उनकी रचनाएं दूसरी भाषाओं के गायकों और संगीतकारों के बीच भी सम्मान हासिल करती थी।