दिल्ली के जंतर-मंतर और मुंबई समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी है। इसी बीच कल सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त पद से हटाने और अंतरिम रूप से सस्पेंड करने और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। 

सीजेआई का यह टिप्पणी, इसलिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को दावा किया था कि एसआईआर प्रक्रिया के लिए मदताओं का नाम जोड़ने के लिए फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है।मामला इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और उसके आधार पर दाखिल याचिकाओं के बाद सामने आया, जिनमें दावा किया गया कि एसआईआर से जुड़े करीब 14 महत्वपूर्ण फैसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज की थी, जबकि फैसले भारत के निर्वाचन आयोग के नाम से आगे बढ़े थे। 

याचिकाकर्ता का कहना है कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग के फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले नहीं ले सकते हैं। दरअसल, फार्म-6 में बदलाव के जरिए जोड़े गए नए घोषणा-पत्र को लेकर राजनीतिक दलों का विरोध तब और बढ़ गया जब यह बात सामने आई कि निर्वाचन आयोग के अन्य निर्वाचन आयुक्तों की आपत्ति के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश  कुमार ने अकेले यह निर्णय लिया है। अन्य निर्वाचन आयुक्तों ने यह कहते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी कि केंद्र सरकार द्वारा मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बगैर फार्म-6 में बदलाव नहीं किए जा सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना ने ज्ञानेश कुमार को फिलहाल एक्स पार्टी सस्पेंड करने से इनकार किया है, लेकिन मामला खारिज नहीं किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल चुनाव आयोग और अदालत के बीच चल रही कानूनी प्रक्रिया तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। इसका सीधा संबंध देश की राजनीति, चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता और सत्तापक्ष तथा विपक्ष के बीच बढ़ते अविश्वास से भी है। यदि चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, विशेष गहन पुनरीक्षण  (एसआईआर) और मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल लंबे समय तक बने रहते हैं, तो यह विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका सामान्य प्रशासनिक संस्था से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग के फैसलों पर राजनीतिक दलों और मतदाताओं का विश्वास चुनाव की निष्पक्षता की बुनियादी शर्त है। इसलिए जब आयोग के भीतर ही किसी निर्णय को लेकर मतभेद या असहमति की बात सामने आती है और यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचता है, तो उसका राजनीतिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में किसी बड़े नीतिगत या चुनावी फैसले को मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले आगे बढ़ा सकते हैं? 

यदि इस प्रश्न पर न्यायिक परीक्षण होता है और भविष्य में न्यायालय कोई स्पष्ट व्यवस्था देता है, तो इसका असर केवल मौजूदा विवाद पर नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की भविष्य की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है। इससे यह तय करने में मदद मिल सकती है कि आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण है और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की संवैधानिक भूमिका का संतुलन किस प्रकार कायम किया जाना चाहिए। विपक्ष पिछले कुछ समय से चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची, ईवीएम, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर सवाल उठाता रहा है। एसआईआर का मुद्दा इस व्यापक राजनीतिक अभियान को एक नया आधार दे सकता है।

विशेष रूप से मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया का सवाल सीधे नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा है। यदि विपक्ष यह धारणा बनाने में सफल होता है कि किसी भी प्रक्रिया के कारण वास्तविक मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से बाहर हो सकता है, तो यह मुद्दा चुनावी राजनीति में काफी प्रभावशाली हो सकता है। हालांकि विपक्ष के सामने चुनौती भी कम नहीं है। केवल आरोप लगाने से राजनीतिक विश्वसनीयता हासिल नहीं होगी। उसे यह साबित करना होगा कि किन क्षेत्रों में कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए, प्रक्रिया में कहां गड़बड़ी हुई और उसके ठोस प्रमाण क्या हैं। 

यदि विपक्ष आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ यह लड़ाई लड़ता है, तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।यह घटनाक्रम विपक्षी एकता के लिए भी एक साझा मुद्दा पैदा कर सकता है। अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी दल भी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के सवाल पर एक मंच पर आ सकते हैं। विपक्ष के सामने तीन प्रमुख अवसर हैं,पहला, चुनाव आयोग की निष्पक्षता के सवाल को व्यापक लोकतांत्रिक मुद्दे में बदलना, दूसरा एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े वास्तविक मामलों को दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ जनता के सामने रखना, और तीसरा अलग-अलग विपक्षी दलों को एक साझा संस्थागत मुद्दे पर एकजुट करना। 

यदि विपक्ष इन तीनों मोर्चों पर सफल रहता है, तो यह विवाद आगामी चुनावों में उसके लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी बन सकता है। खासकर उन राज्यों में जहां मतदाता सूची में बदलाव, नए मतदाताओं का पंजीकरण और पुराने मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर पहले से राजनीतिक संवेदनशीलता है। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि बेरोजगारी, महंगाई, जातीय जनगणना, संघीय ढांचे और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर विपक्ष की रणनीति कई बार राज्यों के राजनीतिक समीकरणों के कारण बिखर जाती है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची का प्रश्न ऐसा मुद्दा है जो लगभग हर विपक्षी दल के लिए समान राजनीतिक चिंता पैदा करता है। लेकिन विपक्ष की एकजुटता तभी टिकेगी जब वह इसे किसी एक व्यक्ति को हटाने की मांग तक सीमित न रखकर चुनावी संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता का व्यापक प्रश्न बनाए। 

यदि अभियान केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ व्यक्तिगत राजनीतिक संघर्ष के रूप में दिखाई देता है, तो उसका प्रभाव सीमित हो सकता है। इसके विपरीत, यदि विपक्ष नियुक्ति प्रक्रिया, आयोग की जवाबदेही, निर्णय लेने की सामूहिक व्यवस्था, मतदाता सूची की पारदर्शिता और न्यायिक निगरानी जैसे संस्थागत सुधारों को सामने रखता है, तो यह बहस कहीं अधिक गंभीर और प्रभावशाली हो सकती है। संभवतः इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रभाव यही हो सकता है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस वास्तव में लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर बहस है। मतदाता सूची में एक योग्य नागरिक का नाम होना केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड का विषय नहीं है। यह उसके संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा हुआ है। 

इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया जितनी व्यापक होगी, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होनी चाहिए।इस विवाद की असली परीक्षा यही होगी कि क्या देश की चुनावी संस्थाएं और राजनीतिक दलों के बीच विश्वास का केंद्र बनी रह सकती है। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल लगातार बढ़ते हैं, तो इसका नुकसान किसी एक राजनीतिक दल को नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को होगा। वहीं, यदि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से नियमों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता आती है तथा आयोग अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाएं और मजबूत भी हो सकती है।  इसलिए मौजूदा विवाद को केवल “ज्ञानेश कुमार बनाम विपक्ष” के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है कि क्या भारत की चुनावी व्यवस्था ऐसी बनी रहेगी जिस पर चुनाव हारने वाला भी भरोसा करे और चुनाव जीतने वाला भी? यही सवाल आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)