राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट।
अंतकाल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट।।
कबीर

दुनिया बहुत छोटी और गोल है। अयोध्या राम मंदिर की ताजा घटना ने यह सिद्ध भी कर दिया है। जिस राम मंदिर के संघर्ष को पाँच शताब्दी के संघर्ष में बदल दिया गया था, उसकी प्रतिष्ठा को धूल धुरसित करने में इन कथित ट्रस्टियों और इससे जुड़े विभिन्न संगठनों को पाँच बरस भी नहीं लगे। राम नाम की लूट को राम “दान” की लूट में परिवर्तित हो जाने को कुछ इस तरह से प्रचारित किया जा रहा है कि जैसे कि जो कुछ हुआ वह अप्रत्याशित था। वस्तुतः जो अयोध्या में घटा उसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं है। जो भी कार्य प्रतिशोध के भाव से किया जाता है, घोटाला या ध्वंस उसकी स्वाभाविक परिणिति है। 

रामचरित मानस के उत्तरकांड की चौपाई है,
“धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥"

अर्थात "मैं धन के मद से मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्र बुद्धिवाला था। मेरे हृदय में भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्री रघुनाथ जी की राजधानी में रहता था तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी।" 

तुलसीदास के जन्म के 500 बरस बाद भी जैसे अयोध्या की परिस्थितियों में कोई सुधार नहीं आया। राम मंदिर बनने के बाद तो समाज के चरित्र में थोड़ा बहुत परिवर्तन आना चाहिए था, परन्तु ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। 

इसी क्रम में तुलसीदास आगे लिखते हैं,
"सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
अर्थात जो (किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दम्भ करता है वही बड़ा सदाचारी है। जो झूठ बोलता है और दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान है।" तो तुलसीदास जिन्हें बुद्धिमान, सदाचारी और गुणवान बताकर व्यंग्यात्मक तरीके से समझा रहे थे, अयोध्या राम मंदिर के कर्ता धर्ताओं ने उसे मूर्त रूप दे दिया। 

तमाम सर्वगुण संपन्न सज्जनों का समूह वहां निवास कर वह सब कर रहा था, जिसे सामान्य तौर पर अपराध नहीं पाप माना जाता है। और अयोध्या में निवासरत इस समुदाय को वरदहस्त प्रदान करने वाले उत्तरप्रदेश और दिल्ली में ही नहीं बल्कि पूरे देश में मठाधीशों की तरह स्थापित हो गए हैं। कई बार यह सोचने में आता है कि क्या राम मंदिर के निर्माण में कतिपय लोग इसी लालच से इकट्ठा हुए थे कि आज नहीं तो कल वसूली तो हो ही जाएगी?

यहीं पर महात्मा गाँधी के राम और रामराज्य तथा राम मंदिर निर्माण करने वालों के राम और राम मंदिर का अंतर समझ में आता है। गांधी के लिए राम महज एक धार्मिक प्रतीक भर नहीं थे बल्कि वे उनके जीवन का आधार थे। उनके लिए राम का अर्थ "सत्य" और "न्याय" था। उनका राम राज्य समानता के सिद्धांत पर आधारित था। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके सहमना संगठन, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल और भारतीय जनता पार्टी के लिए राम और रामराज्य के क्या मायने हैं, यह राम मंदिर दान घोटाले या डकैती से समझा जा सकता है। 

गांधी कहते हैं "मैं समझा दूँ कि धर्म से मेरा मतलब क्या है। मेरा मतलब हिन्दू धर्म से नहीं है, जिसे मैं बेशक और सब धर्मों से अधिक पसंद करता हूँ; मेरा मतलब उस मूल धर्म से है, जो हिन्दू धर्म को लाँघ गया है, जो मनुष्य के स्वभाव तक में परिवर्तन कर देता है। जो भीतरी सत्य के साथ हमारा अटूट संबंध जोड़ता है, जो हमें निरंतर शुद्ध और अधिक पवित्र रखता है।" 

क्या अयोध्या स्थित राम मंदिर हमें इस तरह की कोई प्रेरणा अब दे पाएगा?
आर.एस.एस. को अपने जीवनकाल का दूसरा सबसे बड़ा तिरस्कार झेलना पड़ रहा है। राम मंदिर निर्माण आजादी के बाद से संभवतः उनका सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा था। सात दशक के कथित संघर्ष के बाद वह येन केन प्रकारेण सफल भी हो गया। मगर हाथ क्या आया? बेईमानों और लुटेरों की नई फ़ौज? 

गौर करिए 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री ने कहा था कि “यह महज कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह एक नए युग की शुरुआत है।" तो नया युग क्या झूठ, घोटाले, चोरी, बेईमानी और हेराफेरी के आधार पर खड़ा होगा? 

इसीलिए गाँधी ने कहा था, "लोग कहते हैं, “साधन आखिर साधन ही हैं।" मैं कहूँगा “साधन ही आखिर सब कुछ है।“ जैसे साधन होंगे, वैसा ही साध्य होगा। साधन और साध्य के बीच दोनों को अलग करने वाली कोई दीवाल नहीं है।" जब राम मंदिर के लिए योगदान की बात सामने आई तो यह नहीं देखा गया कि जो साधन (दान) आ रहे हैं, उनका स्रोत क्या है। इसलिये खर्च में भी शुद्धता का ध्यान रखा ही नहीं गया। 45 मिनट में 2 करोड़ रु. की जमीन 20 करोड़ रु. की हो जाना कोई साधारण घटना नहीं थी। परंतु उसे हवा में उड़ा दिया गया। प्रबंधक की सुरक्षा में 400 निजी गार्ड की नियुक्ति की बात अगर सच है तो यह इससे सिद्ध हो जाएगा कि वस्तुतः साध्य "राम मंदिर" नहीं कुछ और ही था। 

हम ऐसी निगरानी वाले युग में रह रहे हैं, जिसमें हमारा दिल्ली की ओर देख लेना भर ही किसी के भी खिलाफ सबूत बन सकता है, ऐसे में हजारों सीसीटीवी कैमरों से चोरी का न पकड़ पाना एक नये रहस्य को जन्म दे रहा है। कल्पना कीजिए कि सुरक्षा और चोरी रोकने के लिए लगाए गए कैमरों का प्रयोग कहीं चोरी का रिकॉर्ड रखने के लिए तो नहीं किया जा रहा था? यह इसलिये कि इसके बाद लूट का वितरण पूरी "ईमानदारी" से किया जा सके?

एक और विरोधाभास जो इस समय पूरी दुनिया में व्याप्त है, वह है अपराधियों का वर्गीकरण। यानी एक बड़ा चोर और दूसरा छोटा चोर। राम मंदिर चढ़ावा घोटाले में तो कम से कम ऐसे किसी विश्लेषण की आवश्यकता नहीं है। एक रु. की चोरी और एक हजार करोड़ की चोरी की तुलना इस संदर्भ में मायने नहीं रखती क्योंकि दान में आया प्रत्येक अंश बराबरी की हैसियत रखता है। गरीब ने अपनी हैसियत से और अरबपति ने अपनी आर्थिक हैसियत के अनुरूप दान किया है। 

कबीर दास भजन में आगे कहते हैं,
"राम नाम सुखदाई, भजन करो भाई।
ये तन है जंगल की लकड़ी, आग लगे जल जाई।।
भजन करो भाई, ये जीवन दो दिन का।"

मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था संभालने वाले अधिकांश या तो संत समाज से है य यह दावा करते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर के निहितार्थ समर्पित कर दिया है। भाजपा कार्यकर्ता, केन्द्रीय मंत्री, कई मुख्यमंत्री तो इनकी गारंटी तक देने को तैयार हैं कि ये लोग कुछ गलत नहीं कर सकते। जाहिर है यदि नहीं कर सकते थे तो क्या आँख भी बंद थी? प्रश्न उठता है कि राम मंदिर के चढ़ावा में जो कुछ भी हुआ, क्या वह महज चोरी या डकैती ही है या यह कुछ इससे आगे की स्थिति है? 

गंभीरता से विचार करने पर यह बात उभरती है कि वहाँ जो कुछ भी हुआ वह एक योजनाबद्ध प्रक्रिया का हिस्सा है। पाँच वर्षों से लगातार आरोप लगाए जा रहे थे, लेकिन कभी भी इन्हें स्वीकार किया गया। इसी के समानांतर यह रणनीति तैयार की गई कि जो भी इन घोटाले या चोरी की बात करे उसे राम द्रोही और हिन्दू द्रोही ठहरा कर उनके खिलाफ जनभावना तैयार की जाए। इसका प्रमाण हमें कुछ लोगों के हालिया बयानों से मिलता है। घोटाले की बात करने वालों पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे मंदिर निर्माण की मांग में शामिल नहीं थे, यह एक धर्म का मामला है, उसी धर्म के लोगों को इससे निपटना है। 

वैसे भ्रष्टाचार कभी भी व्यक्तिगत मामला नहीं होता भले ही वह किसी निजी उद्धम में ही क्यों न किया गया हो, उससे सिर्फ राज्य यानी पुलिस के माध्यम से ही निपटा जा सकता है। ऐसा प्रत्येक मामला राज्य विरुद्ध संबंधित व्यक्ति/कंपनी आदि होता है। ऐसे में सिर्फ कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाकर कैसे यह मान लिया जाए कि मामला सुलझ गया है।

यदि ट्रस्ट के सर्वोच्च पदाधिकारियों को इस अपराध की जानकारी नहीं थी, तो इससे यह सिद्ध हो जाता है कि वे लोग इतने महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की देखरेख के लिए अनुपयुक्त और अयोग्य थे। तो फिर केंद्र और राज्य सरकार तथा उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इसका संज्ञान क्यों नहीं लिया? अगर सीधी बात करें तो यह घोटाला नहीं एक बड़ा षड्यंत्र है और इसको बेहद सावधानी से क्रियान्वित किया गया है। इसे लेकर उठती आवाजों को बेहद कुटिलता और राजनीतिक दबाव से दबाया गया है। अगर ऐसा नहीं है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और केंद्र सरकार राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन में विपक्षी राजनीतिक दलों से सलाह ले और जो भी नए ट्रस्टी बनाए जाने हैं, उनसे पहले सार्वजनिक स्वीकार्यता सिद्ध करने की पेशकश की जाए। 

कबीर आगे कहते हैं:
"ये तन है कागज की पुड़िया, हवा लगे उड़ जाई।
भजन करो भाई, ये जीवन दो दिन का।।"
परंतु षड्यंत्र में शामिल समूह तो स्वयं को शाश्वत समझ रहा था। वे भूल गए धर्म "सनातन" हो सकता है, वे नहीं, वे तो नश्वर ही हैं। एक के बाद एक शिकायतें आ रही हैं कि उन्हें दिए गए दान की रसीद नहीं मिली। एक जवाब में कहा गया कि चूंकि चाँदी की ईंट दी गई थी और उनका परीक्षण नहीं हुआ था, इसलिये रसीद नहीं दी गई। तो क्या चाँदी परीक्षण के लिए सीधे देवलोक में भेजी गई हैं? वैसे अयोध्या में राम के सशरीर देवलोक जाने की गाथा है, किसी वस्तु भले ही वह सोना ही क्यों न हो, ऐसी गाथा नहीं मिलती।

हमें विचार करना चाहिए कि आखिर मंदिर क्यों स्थापित किए जाते हैं? गांधीजी कहते हैं, "मूर्ति पूजा का आविष्कार करके उसने (हिंदू ने) एक ईश्वर को अनेक नहीं कर दिया है, बल्कि इस सच्चाई का पता लगाकर दुनिया के सामने रखा है कि मनुष्य परमात्मा को उसके ईश्वरीय स्वरूपों में भी पूज सकता है और पूजता चला जाएगा। ईसाई और मुसलमान अपने को मूर्तिपूजक भले ही न मानें, पर जो उनके आदर्शों को पूजते हैं, वे भी प्रतिमा-पूजक ही हैं। हिंदू इससे आगे जाता है और कहता है कि हर व्यक्ति को अपने मनपसंदरूप में ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।" 

इसीलिये भारतीय इस मायने में अनूठे है कि वह अपने देवता की स्वयं स्थापना कर सकते हैं। राम उनके लिए शिशु, बाल, किशोर, वयस्क, शांतिदूत, मर्यादा पुरुषोत्तम, वचन निभाने वाले, जबरदस्‍त योद्धा, प्रेमल भाई, सहृदय पति, मित्र, प्रजापालक जैसे रूपों में अलग-अलग या इन सबका समावेश एक में होकर पूजनीय हैं। अपने जीवन के प्रत्येक निर्णय में वह उनसे प्रेरणा ले सकता है और लेता भी है। 

कबीर समझाते हैं:
ये तन है माटी का ढेला, बूंद पड़े गल जाई।
ये तन है फूलों का बगीचा, धूप पड़े मुरझाई।।
भजन करो भाई।

राम मंदिर का वर्तमान परिदृश्य इसलिये डरावना लगता है क्योंकि इसने सामान्य नागरिक की आस्था और विश्वास को चकनाचूर किया है। ट्रस्ट शायद यह इस भावना की अवहेलना कर रहा था। किसी भी तीर्थस्थान से आत्मीयता और आध्यात्मिकता का विलुप्त हो जाना बताता है कि वहाँ जाने का प्रयोजन अब औचित्य नहीं रखता। आवश्कता आस्था और विश्वास की पुर्नस्थापना की है।

सरोजिनी नायडू लिखती हैं, "आखिर वह कौन सी भावना है जो हमारी चिरकालिक नदियों के किनारे सदियों से खड़े मंदिरों में बहती आती है, जो भयंकर कष्ट, त्याग, तप और दुःख सहकर भी मनुष्य को देवत्व की ओर प्रेरित करती है? फिलिस्तीन के धर्मयुद्ध में वह धर्मपरायणता थी जिसने लड़ाकों को ऊर्जा दी। भारत में भी यह बताया जाना जरूरी है कि इस सभ्यता को बनाने में आस्था की कितनी बड़ी भूमिका है। धर्म की सबसे बड़ी भूमिका यह रही है कि उसने हिन्दू सभ्यता को ऐसी आध्यात्मिक ताकत बख्शी है कि भारत तमाम साम्राज्यों के बीच भी अक्षुण्य रहता आया है।“ 

अयोध्या में जो हुआ वह सिर्फ आर्थिक घोटाला नहीं है, यह भारत के प्रत्येक नागरिक के साथ हुआ विश्वासघात है। यह भी सच है कि आम जनता की याददाश्त स्थायी नहीं होती। परंतु यह भी तय है कि कभी भी कुछ भी विस्मृत नहीं होता और वह समय आने पर पुनः प्रकट भी हो जाता है। यदि प्रधानमंत्री ने राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी, तो यह उनका दायित्व बनता है कि वे स्थिति स्पष्ट करें और प्रधानमंत्री के रूप में जो शपथ उन्होंने ली है, उसका एक बार पुनर्पाठ अवश्य करें, तो शायद वे कोई उचित निर्णय ले पाएंगे। हिन्दू धर्म के कथित ठेकेदार तो राम मंदिर के ठेकेदारों से ही नहीं निपट पाए तो उनसे क्या आशा रखी जा सकती है।

कबीर याद दिलाते हैं:
ये तन है कच्ची हवेली, पल में टूट जाई।
ये तन है सपनों की माया, आँख खुले कुछ नाहीं।।
भजन करो भाई, ये जीवन दो दिन का।
राम मंदिर ने जो सपना दिखाया था, वह टूटता नजर आ रहा है। अगर हमारी आँखें अभी भी खुले तो शायद हम कुछ नैतिक मूल्य बचा पाएंगे। वरना तो कहना पड़ेगा,
"राम दान की लूट है, (जितना) लूट सके तो लूट।"