“मैंने नीट परीक्षा दी थी…., दोबारा परीक्षा से डर लग रहा है। मेरे पापा ने मुझ पर बहुत पैसा खर्च किया है, मैं अब उनका सामना कैसे करूँगी, नहीं जानती।
अनुकीर्तना, (कोयंबटूर)
नीट पुर्नपरीक्षा से व्यथित होकर आत्महत्या करने वाली छात्रा
उम्र – 19 वर्ष

नीट की परीक्षा रद्द होने के बाद, इंदौर (म.प्र.), अहमदाबाद (गुजरात), सीकर (राजस्थान), देहरादून (उत्तराखंड), दिल्ली, महाराष्ट्र, लखनऊ (उत्तरप्रदेश), कर्नाटक, तमिलनाडु में कम से कम 15 छात्रों ने आत्महत्या की है। राहुल गांधी ने कोटा में “छात्रों की गूंज” के माध्यम से जो संदेश देने का प्रयास किया है, वह भारत की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। किसी भी विवेचना या निर्णय पर पहुँचने से पहले हमें यह स्वीकार करना चाहिये कि “कोचिंग” कभी भी शिक्षा का मूलभूत अंग नहीं हो सकती। “ट्यूशन” या “कोचिंग” की व्यापकता कमोबेश शिक्षा प्रणाली की असफलता की क्रूर कहानी है। 

वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्रीनर्सरी से यह घाव लगना शुरू हो जाता है और प्रत्येक चरण में इसकी मौजूदगी अंततः इसे “नासूर” में बदल देती है। राहुल गांधी ने कोटा में अपने उद्बोधन में कहा कि वे शिक्षा के मामले में राजनीति को नहीं लाना चाहते। परंतु बिना राजनीतिक समझ बढ़ाए इस समस्या का निपटारा हो पाना भी असंभव है। लोकतंत्र में हर समस्या का हल राजनीतिक विमर्श के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। बहरहाल, मुद्दा जितना गंभीर हम समझ रहे हैं, उससे कई गुना गंभीर है। यदि नीट और अन्य परीक्षाओं में हुई धांधलियों के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा माँगा जाना यह तय कर रहा है कि इस बीमारी का हल “राजनीतिक स्तर” पर ही निकल सकता है।

राहुल गांधी के अनुसार भारत सरकार के शिक्षा का बजट करीब 1,40,000 करोड़ रु. है। वहीं नीट, एसएससी, आर आर बी, जेईई और यूपीएससी की परीक्षाओं में बैठने वाले विद्यार्थियों पर उनके परिवार करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। अर्थात देश के शिक्षा बजट से करीब तीन गुना भारतीय परिवार सिर्फ “कोचिंग” और परीक्षा शुल्क पर खर्च कर रहे हैं। शिक्षा के वर्तमान स्वरूप पर बेहद संजीदगी से विचार करना जरूरी है क्योंकि शिक्षा अब “शुल्क” आधारित नहीं “लूट” आधारित हो गई है। 

महाराष्ट्र के पुणे में स्थित एक निजी विद्यालय में नर्सरी की फीस 4.24 लाख रु, LKG और UKG की 7.85 लाख रु. और कक्षा 1 से 5 तक की 10.25 लाख रु. प्रतिवर्ष है। वहीं इसके पश्चात महाविद्यालय पूर्व (प्री-यूनिवर्सिटी) अर्थात कक्षा 6 से 12वीं तक की फीस 27.30 लाख (सत्ताइस लाख तीस हजार रु.) प्रतिवर्ष है। तो यह भारतीय शिक्षा का बदलता स्वरूप है। वहीं भारत में पिछले वर्ष करीब एक लाख सरकारी विद्यालयों को बंद कर दिया गया। अधिकांश सरकारी विद्यालयों में बिजली, पंखे और शौचालय नहीं हैं। इसके अलावा ज्यादातर विद्यालयों में शिक्षकों की जबरदस्त कमी है। परंतु केंद्र एवं राज्य सरकारों के पास देवलोक बनाने के लिए करोड़ों रु. हैं, लेकिन विद्यालयों में शौचालय के लिए धन की कमी लगातार बनी रहती है।

शिक्षा को एक और संदर्भ से समझते हैं। शिक्षा का बाज़ार इस वक्त सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है। कैसे? इस उदाहरण से समझते हैं। हमारे एक मित्र हैं, सामाजिक कार्य करते हैं और उनके परिवार की मासिक आय करीब 30 हजार रु. है। पति-पत्नी दोनों काम करते हैं। उन्होंने 10वीं के बाद अपने बेटे को नीट “कोचिंग” के लिए “कोटा” भेज दिया। उनका कहना है कि दो वर्षों में वहाँ उनका खर्च करीब 6.25 लाख रु. हुआ। खर्च असहनीय हो रहा था अतएव उन्होंने बेटे को कोटा की बजाय नासिक में रखा। वहाँ एक वर्ष का खर्च करीब 1.60 लाख रु. आया। यानी वे अब तक करीब 8.50 लाख रु. खर्च कर चुके हैं। नीट परीक्षा दोबारा देने की मजबूरी में उन्हें करीब 30 हजार रु. अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहे हैं। यानी कुल खर्च 7.5 लाख रु.। इसकी पूर्ति के लिए उन्हें अपने गहने गिरवी रखना पड़े और उनका कहना है कि हमने अपने खर्चों में इतनी कमी करना पड़ी है कि लगता है जैसे हम “वनवास” में रह रहे हैं।

गांधी कहते हैं, शिक्षा स्वावलंबी होनी चाहिए। जबकि वर्तमान शिक्षा तो हमें कर्ज में डाल रही है। उन्होंने 22 अक्टूबर 1937 को यानी करीब 90 वर्ष पहले कहा था, “आज कॉलेज की शिक्षा लगातार शहरी है। यह तो मैं नहीं कहूँगा कि प्राथमिक शिक्षा की तरह यह भी बिल्कुल असफल रही है, फिर भी इसका नतीजा हमारे सामने है, यह काफी निराशाजनक है। अगर ऐसा न होता, तो आज कोई ग्रेजुएट बेकार क्यों रहता?” नौ दशकों में स्थिति बद से बदतर हुई है।
बात छात्रों की आत्महत्या से शुरू हुई थी। जरा कुछ आँकड़ों पर गौर करते हैं। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार भारत में सन 2025 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। इसमें से 7,669 लड़के और 6,819 लड़कियाँ थीं। चार प्रदेशों— महाराष्ट्र (1909), उत्तर प्रदेश (1585), मध्य प्रदेश (1447) और तमिलनाडु (1287), इन चार प्रदेशों में कुल आत्महत्याओं के 45 प्रतिशत मामले सामने आए। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि देश में आत्महत्याओं की वार्षिक वृद्धि दर करीब 2 प्रतिशत है वहीं छात्रों में यह वृद्धि दर 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष यानी दुगनी है। 

गौरतलब है कि भारत में इस वर्ष कुल 2,13,789 आत्महत्याएँ हुई थीं। भारत में किसान आत्महत्याओं को लेकर काफी चर्चा बनी रहती है। आँकड़े बताते हैं कि सन 2024 में कुल 10546 किसानों ने आत्महत्या की थी। वहीं छात्रों की आत्महत्या की संख्या 14488 यानी करीब 40 प्रतिशत ज्यादा। इसके बावजूद विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को लेकर बहुत रोष की तो बात छोड़ देते हैं, यह गंभीर सार्वजनिक विमर्श भी नहीं बन पा रहा है। सवाल सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं के कारण पैदा हुई परिस्थितियों से आत्महत्या का नहीं है। माध्यमिक से लेकर आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे संस्थानों में छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। 

देश में हो रही कुल आत्महत्याओं में से 7.6 से 10 प्रतिशत तक आत्महत्याएँ छात्रों द्वारा की जा रही हैं। क्या यह कोई सामान्य घटना या परिस्थिति है?
जिस बात पर हमें आज सबसे ज्यादा गौर करने की आवश्यकता है, वह है “शिक्षा का स्वरूप हिंसक” हो जाना। असमानता मनुष्य के प्रति संभवतः सबसे बड़ी हिंसा है। इसी मानक पर हमें भारत में शिक्षा की वर्तमान स्थिति को आँकना होगा। 

एक विद्यालय अपने छात्र से करीब 2.5 लाख रु. प्रतिमाह शुल्क ले रहा है और दूसरी ओर ऐसे सरकारी विद्यालय हैं जिनमें न तो शिक्षक हैं और न शौचालय। एक अन्य परिस्थिति भी है, जो शिक्षा के अधिकार कानून के बाद उभरी है। इसके अंतर्गत प्रवेश लेने वाले विद्यार्थी अनेक विद्यालयों में भेदभाव का शिकार हैं। उनके साथ दोयम दर्जे का और तिरस्कारपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। साथ ही संविधान का अनुच्छेद 21-क (जीवन का अधिकार) में छह से चौदह वर्ष तक आयु वर्ग के बच्चों के लिए ही निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। इससे सवाल उठता है कि 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों के बारे में कोई विचार क्यों नहीं किया गया और 14 वर्ष से बड़े बच्चे तो असमान और महंगी शिक्षा के दौर में शिक्षा प्रणाली से बाहर हो जाएँगे। 

बच्चे के 14 वर्ष के होते ही क्या उनके पालकों की लॉटरी खुल जाएगी और वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दे पाएँगे? इसी से जुड़ी एक और परेशानी भी है। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए निजी (पब्लिक) विद्यालयों ने भी भारत के परिवारों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया है। जिस तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में निष्कर्ष निकला है कि उनकी मौजूदगी के बावजूद भी अधिकांश लोग अपनी जेब से इलाज करा रहे हैं। यही स्थिति अब शिक्षा में भी बन गई है। सरकारी विद्यालयों की मौजूदगी के बावजूद लोग कर्ज लेकर या अपने आवश्यक खर्चों में कमी करके बच्चों को पढ़ा रहे हैं। यह स्थिति व्यक्ति के स्वास्थ्य और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था दोनों के लिये घातक है।

विनोबा अपनी पुस्तक शिक्षण विचार में लिखते हैं, “उपनिषद में एक राजा अपने राज्य का वर्णन करते हुए कह रहा है, “न अविद्वान” मेरे राज्य में विद्वान न हो ऐसा कोई नहीं। सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, सब विद्वान हैं।” परंतु हमारी प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा प्रणाली ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर दिया कि जिसमें सिर्फ उन्हें ही मेधावी और शिक्षित माना जाता है, जो उच्च शिक्षा में प्रचलित प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो जाते हैं। इतना ही नहीं उनमें भी वर्गीकरण है, यदि कोई ‘ख’ संस्थान में प्रवेश पाता है तो वह सर्वोत्तम है और यदि उसका दाखिला ‘घ’ में होता है तो उसकी प्रतिभा सर्वोत्तम नहीं है। 

यदि सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में भी इतना भेद बना रहेगा तो, शिक्षा को शिक्षा के रूप में कैसे “ग्रहण” किया जा सकता है। दरअसल शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्येय है, विद्यार्थी में आत्मविश्वास पैदा करना। परंतु हमारी शिक्षा प्रणाली तो जैसे विद्यार्थियों में हीनभावना पैदा कर रही है। 

ऐनी बेसेंट लिखती हैं, “300 साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग बंगाल के छोटे-छोटे गाँवों में गए थे। उन्होंने सर्वेक्षण में पाया कि बंगाल में प्रति चार सौ व्यक्तियों के पीछे एक पाठशाला है।" इसका अर्थ यह हुआ कि तब तकरीबन प्रत्येक गाँव में एक विद्यालय था और अधिकांश जनता साक्षर थी, सिर्फ ब्राह्मण या वैश्य ही नहीं। अंग्रेजों के करीब दो शताब्दियों के शासन में साक्षरता दर मात्र 12 प्रतिशत रह गई। अर्थात करीब 88 प्रतिशत लोग निरक्षर हो गए। शिक्षा में तब नए तरह से आरक्षण लागू हुआ। एक हुई सामान्य विद्या और दूसरी उच्च शिक्षा यानी अंग्रेज़ी विद्या। 

विनोबा लिखते हैं, “जो अंग्रेज़ी शिक्षा में पढ़ते थे वे विद्वान माने जाते थे और बाकी के अक्षरशत्रु।” हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी सामान्य जनता को “अक्षरशत्रु” ही मान रही है। वहीं तमाम विशेषज्ञ बता रहे हैं कि भारत में इतने ज्यादा युवा “उच्च शिक्षित” (ग्रेजुएट) हो रहे हैं, जिनको रोजगार देने की क्षमता भारतीय अर्थव्यवस्था में नहीं है। आज भारत के तीन स्नातकों में से एक बेरोज़गार है। यानी शिक्षित बेरोज़गारी दर करीब 33 प्रतिशत है। सबसे दुखद बात यह है कि “कोचिंग” को “शिक्षा” माना जाने लगा है और तकनीकी शिक्षा ही विज्ञान की शिक्षा मानी जाने लगी।

अतएव सिर्फ शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को बदलने से बात नहीं बदलेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था को नये सिरे से योजनाबद्ध करना होगा। नीति आयोग जैसे संस्थान ऐसे किसी परिवर्तन की कल्पना कर पाने के योग्य भी नहीं हैं। उपनिषद में एक और कहानी आती है। दस साल का एक लड़का गुरु के पास ज्ञान पाने के लिये गया। गुरु ने कहा, “ये 400 गायें चराने का काम करो और हज़ार गायें बन जाने के बाद मेरे पास ज्ञान लेने आ जाना।” दो साल बाद गुरु ने शिष्य को देखा और कहा, तेरे चेहरे पर ज्ञान की चमक दिख रही है। तो क्या किसी ने तुझे कुछ ज्ञान दिया? शिष्य ने कहा, “अन्ये मनुष्यभ्यः” मुझे मनुष्य ने नहीं, दूसरों ने ज्ञान दिया। बैल ने कुछ ज्ञान दिया, हंस ने दिया, अग्नि और मग्दु नाम के पक्षी ने दिया। उन चारों ने क्या ज्ञान दिया वह उपनिषद में मिल जाता है। इसके बावजूद स्वअर्जित करना ही विज्ञान या नवीनता है। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि चर्चा सिर्फ वैकल्पिक शिक्षाभर की नहीं, बल्कि वैकल्पिक रोजगार पर भी हो।

राहुल गांधी ने इस सभा माध्यम से जो सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया वह यह कि उन्होंने शिक्षा के प्रतिस्पर्धात्मक स्वरूप को खारिज किया है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा के लिए, जिस तरह का खुला वातावरण होना चाहिए, वह भारत में दुर्लभ होता जा रहा है। शिक्षा का उद्देश्य रोजगार उपलब्धता से जोड़ने की वजह से जीवन में उसकी उपयोगिता बेहद सीमित हो गई है। इस पद्धति ने विद्यार्थी को तांगे में जुते घोड़े में परिवर्तित कर दिया है। आज भारत के युवा और विद्यार्थी बेहद पीड़ादायक स्थिति में हैं, लेकिन उन्हें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सपने दिखाकर मूर्ख बनाने का कार्य बदस्तूर जारी है। 

जॉन एलिया कहते हैं,
“हू (वह, खुदा) का आलम (सूनापन) है,
यहाँ नालागरों (आर्तनाद करने वाले) के होते,
शहर ख़ामोश है,
शोरीदासरों (दीवानों) के होते।।"
अब यह लाज़िमी हो गया है कि आर्तनाद करने वालों की आवाज़ दीवानगी के साथ सुनी जाए।