कई ग्राम सभाओं ने तेंदूपत्ता संग्रह, भंडारण और बिक्री का निर्णय स्वयं लिया है। बिचौलियों की भूमिका घटने से मजदूरी का लाभ सीधे आदिवासी परिवारों तक पहुंच रहा है। यह आर्थिक आत्मनिर्भरता की रचनात्मक मिसाल है। आदिवासी परिवारों के आजीविका का मुख्य आधार जंगल, कृषि और लघु वनोपज है। लंबे समय तक तेंदूपत्ता, महुआ जैसे वनोपज पर ठेकेदारों का कब्जा रहा है।
इसी तारतम्य में गांव गणराज्य महा ग्रामसभा बैहर बालाघाट द्वारा विगत कुछ वर्षों से तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन का कार्य किया जा रहा है। पिछले वर्ष की भांति इस बार भी जनपद पंचायत बैहर बालाघाट के 12 पंचायत के 23 ग्रामसभाओं ने तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन का प्रस्ताव पारित कर वन परिक्षेत्र कार्यालय में जमा किया गया है। इस संबंध में विगत 16 दिसंबर को जनपद पंचायत बैहर के कार्यपालन अधिकारी ने मुख्य जिला कार्यपालन अधिकारी को सूचित किया है कि पेसा नियम 2022 की कंडिका 26(4) के प्रावधानों के अन्तर्गत 2026 में तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन का प्रस्ताव गांव से आया है।
पेसा नियम की धारा 26(4) में प्रावधान है कि तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन कार्य मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के माध्यम से कराया जाएगा।बालाघाट के जिला पंचायत सदस्य मंशाराम मंडावी ने बताया कि बिरसा एवं परसवाड़ा जिला बालाघाट मप्र अंतर्गत अधिसूचित ग्राम सभाओं में इस वर्ष का तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य प्रगति पर है। दूसरी ओर हरेन्द्र मसराम सभापति वन स्थाई समिति जनपद पंचायत मंडला ने बताया कि 15 दिसंबर 2025 को मंडला की पश्चिम एवं पूर्व सामान्य वन मंडल क्षेत्र की ग्राम सभाओं ने तेंदूपत्ता संग्रहण एवं वितरण को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था।
इन प्रस्तावों को जनपद पंचायत मण्डला द्वारा भी अनुमोदित कर संबंधित विभाग को भेजा गया था। कुल 32 प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए, जिनमें से केवल 12 को स्वीकृति दी गई, जबकि 20 प्रस्तावों को निरस्त कर दिया गया। जिन 20 प्रस्तावों को खारिज किया गया, उनके कारणों की जानकारी ग्राम सभाओं या पेसा समितियों को नहीं दी गई है। इस पूरे मामले को लेकर कलेक्टर मण्डला को शिकायत प्रस्तुत की गई और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। जबकि आदिवासी कल्याण मंत्रालय दिल्ली की साधना राउत संयुक्त सचिव ने 12 जुलाई 2012 में सभी राज्यों के मुख्य सचिव के लिए वन अधिकार कानून क्रियान्वयन के लिए निर्देश जारी किया था। जिसमें तेंदूपत्ता संग्रहण और विपणन के बारे कहा गया है कि कई राज्यों में लघु वन उपजों, विशेष तौर पर कीमती उपजों जैसे तेंदूपत्ता के व्यपार में वन निगमों का एकाधिकार इस अधिनियम की प्रवृत्ति के विरुद्ध है और इसे दूर किया जाए।
राज्य सरकारें न केवल, वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति व अन्य वन निवासियों को लघु वन उपजों पर निर्बाध अधिकारों को प्रदान करने में सहयोगकर्ता की भूमिका निभाएं, वरन् लघु वन उपजों के पारिभाषिक मूल्य दिलाने में भी सहयोग करें।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तामिया जनपद पंचायत अंतर्गत पांच ग्राम पंचायतों की सात
ग्राम सभाओं ने सामूहिक रूप से तेंदू पत्ता संग्रहण और विपणन का निर्णय लिया। यह निर्णय पेसा कानून के अधिकारों के उपयोग का एक सशक्त उदाहरण बन गया। हरित और समृद्ध वनों वाला छिंदवाड़ा जिला मध्य प्रदेश का एक प्रमुख आदिवासी क्षेत्र है। इसी जिले के तामिया विकासखंड की ग्राम पंचायत प्रतापगढ़ और चरगांव की ग्राम सभाओं ने वर्ष 2022 में पेसा कानून के तहत सामुदायिक तेंदू पत्ता संग्रहण और विपणन करने का मन बनाया।
ग्राम सभा ने पेसा नियम 2022 के नियम 25 और 26 के अनुसार 15 दिसंबर से पहले प्रस्ताव पारित करने की योजना बनाई। लेकिन जैसे ही इसकी जानकारी वन विभाग के स्थानीय बीट गार्ड को हुई, उन्होंने कुछ ग्रामीणों को यह कहकर भ्रमित कर दिया कि ग्राम सभा से यह काम नहीं हो सकेगा, और यदि किया गया तो बोनस नहीं मिलेगा और ठेकेदार भी
नुकसान पहुंचा सकता है। जब गांव की बातचीत में तेंदू पत्ता संग्रहण की बात खुली तो उन्हें विस्तार से बताया कि यह कार्य ग्राम सभा के अधिकार में है,और विपणन का बोनस भी ग्राम सभा की सामूहिक सहमति से ही सभी को मिलेगा। इसके बाद अगले दिन ग्राम सभा का आयोजन तय किया गया। यह जानकारी मिलते ही बीट गार्ड ने फिर से ग्रामीणों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन अब लोग जागरूक हो चुके थे।
गांव की हुई ग्राम सभा में सचिव ने प्रस्ताव पढ़कर सुनाया। ग्रामीणों ने प्रसन्नता व्यक्त की, पर बोनस के वितरण को लेकर चिंता जताई। ग्राम प्रधान ने स्पष्ट किया कि मजदूरी की राशि काटकर बची धनराशि ग्राम सभा के निधि खाते में जाएगी, और उसमें से ही सभी के अनुसार बोनस वितरित किया जाएगा। शेष राशि ग्राम सभा की निधि में सुरक्षित रहेगी, जिसका उपयोग सभी ग्रामवासी मिलकर तय करेंगे। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। वन विभाग को आवेदन और प्रस्ताव भेजा गया, जो 15–20 दिन में अनुमोदित होकर ग्राम सभा को प्राप्त हुआ।
इस पहल से ग्रामीणों को न केवल रोजगार मिला, बल्कि सामूहिक निर्णय, पारदर्शिता और आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित हुई। आसपास के गांवों में भी यह मॉडल प्रेरणा बन चुका है। ग्राम सभा की एकजुटता और पेसा कानून की ताकत से ग्रामीणों की ज़िंदगी में आर्थिक स्थिरता और समृद्धि के नए द्वार खुले हैं। 122 से अधिक ग्रामीणों को 1,20,000 रुपए की मजदूरी प्राप्त हुई। विक्रय के बाद 1,52,300 रुपए की शेष राशि ग्राम सभा निधि में सुरक्षित रही। ग्राम सभा ने निर्णय लेकर 50 प्रतिशत राशि बोनस के रूप में संग्रहकर्ताओं को
प्राप्त हुआ है। इस पहल से ग्रामीणों को न केवल रोजगार मिला, बल्कि सामूहिक निर्णय, पारदर्शिता और आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित हुई है।
आसपास के गांवों में भी यह मॉडल प्रेरणा बन चुका है। ग्राम सभा की एकजुटता और पेसा कानून की ताकत से ग्रामीणों की ज़िंदगी में आर्थिक स्थिरता और समृद्धि के नए द्वार खुले हैं। अर्थात जब ग्राम सभाएं अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर संगठित रूप से निर्णय लेती हैं, तो वे न केवल अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित कर सकती हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त बन सकती हैं।
तेंदूपत्ता संग्रहण एवं विपणन में ग्राम सभाओं की भागीदारी ने बिचौलियों की भूमिका को सीमित किया है, जिससे वास्तविक लाभ सीधे आदिवासी परिवारों तक पहुंच रहा है। यह पहल केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्वशासन, पारदर्शिता और सामुदायिक एकजुटता का सशक्त उदाहरण है। पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से आदिवासी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता, सामाजिक सशक्तिकरण और सतत विकास के नए आयाम स्थापित हो रहे हैं, जो भविष्य के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करता है।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)