13 सितंबर का दिन आदिवासी समुदायों के अधिकारों के संघर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘संयुक्त राष्ट्र आदिवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा’ को भारी बहुमत से स्वीकार किया था। घोषणा के पक्ष में 143 देशों ने मतदान किया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह घोषणा दुनिया के आदिवासी लोगों के अस्तित्व, गरिमा, कल्याण, संस्कृति, भूमि और सामूहिक अधिकारों के लिए न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय मानकों का व्यापक ढांचा है। यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है कि आदिवासी समुदायों का सवाल केवल गरीबी या पिछड़ेपन का सवाल नहीं है, बल्कि पहचान, संस्कृति, स्वशासन, भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिकारपूर्ण भागीदारी का सवाल है।
भारत में भी आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान ने सामान्य नागरिक अधिकारों से आगे बढ़कर विशेष संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था की है। भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, स्वशासन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर उनके परंपरागत अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधान किए हैं। संविधान का अनुच्छेद 244 पांचवीं एवं छठी अनुसूची के प्रशासन की आधारशिला है। पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले राज्यों में राज्यपाल को विशेष संवैधानिक दायित्व सौंपे गए हैं, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुसूचित क्षेत्रों में लागू होने वाले कानून आदिवासी समाज की परंपराओं, संस्कृति, आजीविका तथा सामुदायिक अधिकारों के प्रतिकूल न हों।
पांचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के अनुसार राज्यपाल किसी भी संसदीय या राज्य कानून को अनुसूचित क्षेत्रों में पूर्णतः लागू न करने, संशोधित रूप में लागू करने अथवा आवश्यक अपवादों एवं परिवर्तनों के साथ लागू करने का अधिकार रखते हैं। वहीं पैरा 5(2) राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में शांति और सुशासन के लिए विनियम बनाने की शक्ति प्रदान करता है। इन विनियमों के माध्यम से भूमि हस्तांतरण पर रोक, आदिवासियों की भूमि की सुरक्षा तथा साहूकारी जैसी शोषणकारी व्यवस्थाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केंद्र सरकार राज्यों को विशेष अनुदान प्रदान करती है। अनुच्छेद 338A के तहत गठित राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों के संरक्षण, निगरानी तथा सरकार को अनुशंसा देने का अधिकार प्राप्त है।संविधान के 73वें संशोधन के बाद अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम स्वशासन को सशक्त बनाने हेतु पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) लागू किया गया।
इस कानून के अनुसार ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, लघु वनोपज, जल स्रोतों, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, खनन, स्थानीय योजनाओं तथा सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े विषयों पर निर्णायक भूमिका प्रदान की गई है। ग्राम सभा को आदिवासी स्वशासन की मूल इकाई माना गया है।इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के माध्यम से व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता दी गई। इस कानून में सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन एवं उपयोग का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है तथा यह स्वीकार किया गया है कि वनों के संरक्षण में आदिवासी समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका रही है।
इसके अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन से संबंधित वर्तमान कानूनों में भी अनुसूचित क्षेत्रों के लिए ग्राम सभा की सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन तथा प्रभावित परिवारों के अधिकारों के संरक्षण संबंधी विशेष प्रावधान किए गए हैं। आदिवासी उप-योजना (ट्राइबल सब प्लान- टीएसपी) भारत में अनुसूचित जनजातियों के त्वरित और सर्वांगीण विकास के लिए बनाई गई एक विशेष रणनीति और वित्तीय व्यवस्था है। इसके तहत कुल योजना बजट का एक निश्चित हिस्सा (आमतौर पर उनकी जनसंख्या के अनुपात में) आदिवासी क्षेत्रों और समुदायों के विकास के लिए आरक्षित रखा जाता है।
यह योजना उन ब्लॉकों या तहसीलों में लागू की जाती है जहां आदिवासी आबादी 50 प्रतिशत या उससे अधिक होती है। इसका मुख्य उद्देश्य है शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पेयजल, कौशल विकास और आजीविका के अवसरों को बढ़ाना तथा आदिवासियों का शोषण रोकना है। भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 10.45 करोड़, यानी देश की कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत थी। ग्रामीण भारत में उनका हिस्सा 11.3 प्रतिशत था। यह संख्या बताती है कि आदिवासी समाज भारत की सामाजिक संरचना का कोई छोटा हिस्सा नहीं है।
इसके बावजूद विकास की मुख्यधारा में उनकी स्थिति अभी भी असमान है। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर 59 प्रतिशत थी, जबकि देश की कुल साक्षरता दर 73 प्रतिशत थी। आदिवासी महिलाओं की साक्षरता दर केवल 49.4 प्रतिशत थी। आर्थिक पिछड़ेपन का स्वरूप भी गंभीर है। नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2019-21 में मध्य प्रदेश की कुल आबादी का 20.63 प्रतिशत बहुआयामी गरीबी से प्रभावित था।
आदिवासी बहुल क्षेत्रों में गरीबी का संबंध केवल आय से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, पेयजल, स्वच्छता और बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता से भी है। इसलिए आदिवासी विकास का अर्थ केवल सड़क, बिजली और भवनों का निर्माण नहीं हो सकता। विकास तभी न्यायपूर्ण होगा, जब वह आदिवासी समाज की भूमि, संस्कृति, आजीविका और सामुदायिक निर्णय प्रक्रिया को सुरक्षित रखते हुए किया जाए। आदिवासी समाज की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से जंगल, जमीन, जलस्रोत और सामुदायिक प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी रही है।
खेती, पशुपालन, मछली पालन, लघु वनोपज, हस्तशिल्प और जंगल आधारित आजीविका उनके आर्थिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसीलिए जब खनन, बड़े बांध, औद्योगिक परियोजनाएं, वन भूमि का हस्तांतरण अथवा अन्य विकास परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों में आती हैं, तो उसका प्रभाव केवल जमीन के एक टुकड़े पर नहीं पड़ता। उससे आजीविका, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन प्रभावित होता है। यही कारण है कि पेसा और वन अधिकार कानून में ग्राम सभा की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है।
ग्राम सभा केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि आदिवासी स्वशासन की संवैधानिक भावना का स्थानीय रूप है। आदिवासी समाज की संस्कृति उसके जंगल, पहाड़, नदी, देवस्थल, बोली, लोकगीत, नृत्य, बीज, कृषि पद्धतियों और सामुदायिक परंपराओं से निर्मित होती है। इसलिए किसी समुदाय को उसकी भूमि से विस्थापित करना केवल आर्थिक विस्थापन नहीं होता, बल्कि कई बार सांस्कृतिक विस्थापन भी बन जाता है। संयुक्त राष्ट्र की घोषणा इसी व्यापक दृष्टिकोण को स्वीकार करती है। वह आदिवासी लोगों की पहचान, संस्कृति, परंपराओं और अपने विकास की दिशा तय करने के अधिकार को महत्व देती है तथा उन निर्णयों में उनकी प्रभावी भागीदारी पर जोर देती है जो उनके जीवन और संसाधनों को प्रभावित करते हैं।
भारत के संविधान, पेसा, वन अधिकार कानून और संयुक्त राष्ट्र की आदिवासी अधिकार घोषणा के बीच एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है कि आदिवासी समाज को विकास का निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, बल्कि अपने भविष्य का निर्णयकर्ता माना जाना चाहिए। भारत में अनुसूचित जनजाति समुदायों द्वारा लगातार दिए जा रहे सामाजिक और पर्यावरणीय योगदान, तथा राष्ट्रीय विकास में उनकी भूमिका, जिसमें भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में उनका योगदान भी शामिल है। इसे देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन कानून तथा पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को दिए गए अधिकारों और शक्तियों को और मजबूत करना चाहिए।
13 सितंबर 2007 की संयुक्त राष्ट्र घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह स्थापित किया कि आदिवासी लोगों के अधिकार केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं हैं। उनकी गरिमा, संस्कृति, सामूहिक पहचान, भूमि और संसाधनों से जुड़े अधिकार भी मानवाधिकारों का हिस्सा हैं। भारत में यह भावना संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची, पेसा तथा वन अधिकार कानून में अलग-अलग रूपों में पहले से मौजूद रही है। भारत में आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था कागज पर काफी व्यापक है। पांचवीं अनुसूची, पेसा, वन अधिकार अधिनियम और भूमि अधिग्रहण कानून ग्रामसभा, सामुदायिक संसाधनों और आदिवासी स्वशासन को महत्वपूर्ण कानूनी आधार देते हैं।
चुनौती इन अधिकारों के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। यही वह बिंदु है जहां आदिवासी अधिकारों का संवैधानिक वादा और जमीन पर विकास की वास्तविक प्रक्रिया अक्सर टकराती दिखाई देती है। चुनौती अब इन प्रावधानों को कागज से जमीन तक प्रभावी ढंग से लागू करने की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की परिभाषा बदली जाए। ग्राम सभा की स्वायत्तता, सामुदायिक वन अधिकार, भूमि की सुरक्षा, स्थानीय आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक पहचान को विकास के केंद्र में रखा जाए।
आदिवासी अधिकारों की रक्षा केवल आदिवासी समाज के हित का प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने, प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने का भी प्रश्न है। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए उनके अधिकारों की रक्षा पर्यावरण संरक्षण की भी अनिवार्य शर्त है।इसलिए 13 सितंबर केवल संयुक्त राष्ट्र की एक घोषणा की वर्षगांठ नहीं है। यह भारत के लिए अपने ही संवैधानिक वादे को याद करने का अवसर है। आदिवासी समाज के लिए संरक्षण नहीं, अधिकार; विकास नहीं, न्यायपूर्ण विकास; प्रतिनिधित्व नहीं, निर्णय में वास्तविक भागीदारी; और कल्याण नहीं, स्वाभिमान के साथ स्वशासन। अंततः आदिवासी अधिकारों का वास्तविक अर्थ यही है कि जिस जमीन, जंगल, नदी और संस्कृति ने पीढ़ियों से किसी समुदाय को जीवन दिया है, उसके भविष्य का फैसला भी उस समुदाय की आवाज को केंद्र में रखकर ही हो।
(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)