मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक और मामले में शिवराज सिंह चौहान की बराबरी कर ली है। उनको हटाने को लेकर भी उतनी ही खबरें, कयास, अफवाहें फैल रही हैं जितनी शिवराज सिंह चौहान के समय फैला करती थीं। मंत्रालय से लेकर पार्टी के गलियारों में नेतृत्व परिवर्तन और संभावना को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि मोहन यादव की कार्यशैली कार्यकर्ताओं और जनता को पसंद नहीं रही है। सरकार के कोर वोटर किसान, युवा, व्‍यापारी, आदिवासी भी सरकार से नाराज दिखाई दे रहे हैं।  किसान आंदोलन और दतिया उपचुनाव में मिली हार को इसी असंतोष से जोड़ कर देखा जा रहा है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों के असंतोष को भी नेतृत्व परिवर्तन की संभावना माना जा रहा है। 

बीते कई सालों से प्रदेश बीजेपी में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री का त्रिकोण ही पार्टी की राजनीति को संचालित और निर्धारित करता रहा है। डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा को हटा दिया गया। उनकी जगह अब तक नई नियुक्ति नहीं हुई है। जबकि वीडी शर्मा को हटा कर सादगी की छवि वाले हेमंत खंडेलवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। अब खबरें आम हैं कि संगठन महामंत्री तो है नहीं, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री में भी तालमेल बैठ नहीं रहा है। इस बात कि सच्चाई की पड़ताल अलग मुद्दा है लेकिन बीते कुछ समय की गतिविधियों के साथ समाचार पत्रों और राजनीतिक विश्लेषणों में यह मतभेद रेखांकित किया जा रहा है। जब से यह खबर चली कि सीएम डॉ. मोहन यादव और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का तालमेल गड़बड़ा रहा है, यह कयास लगाया जा रहा है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन होगा। तब से राजनीतिक गलियारों में यही सवाल पूछा जा रहा है, सीएम को लेकर क्या खबर है?

ये ब्रांडिंग का मामला है, समझ गए हेमंत खण्डेलवाल

लो प्रोफाइल और चमक दमक से दूर रहने वाले बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल ब्रांडिंग का महत्व समझ गए हैं। बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स से मुलाकात का यही अर्थ निकाला गया। सोमवार को हुई बैठक में व्यक्तिगत रुप से रुचि लेते हुए खण्डेलवाल ने सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स से कई सुझाव लिए तो वहीं पर उन्होंने खुद भी कुछ सुझाव दिए हैं। सभी जानते है कि शिवराज सिंह चौहान या डॉ. मोहन यादव के सीएम कार्यकाल में ब्रांडिंग के लिए सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स का उपयोग बहुत प्रभावी ढंग से हो चुका है। सांसद वीडी शर्मा के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी ब्रांडिंग पर पूरा ध्यान दिया गया था। 

वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल इस मामले में संकोच में ही रहे। उनके बेटे की सादगी से की गई शादी भी चर्चा में नहीं आई जबकि उसी दौरान मंत्रियों के परिवार में शादी की भव्यता ने सबका ध्यान खींचा था। लगता है कि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने ब्रांडिंग के महत्व पर अब सोचा है। माना जा रहा है कि सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के साथ हुई इस मीटिंग का परिणाम पार्टी के कोर इश्यू को हो हाईलाइट करेगा ही साथ ही प्रदेश अध्यक्ष की इमेज मेकिंग भी संभव हो जाएगी। 

बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा के कहने का मतलब क्या है?

रीवा के अस्पताल में गर्भवती महिला की मौत के बाद लचर स्वास्थ्य सुविधाओं  को लेकर नाराजगी कायम है। इस मामले पर कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला की जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के निवास में प्रवेश कर प्रदर्शन किया। इस पर आधा दर्जन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है।  स्वास्थ्य सेवाओं की हालत और रीवा में स्वास्थ्य मंत्री के आवास पर प्रदर्शन पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही है लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचा बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा ने प्रतिक्रिया ने।

सार्वजनिक रूप से सांसद जनार्दन मिश्रा ने कहा कि राजनीतिक रूप से विरोध होना अलग बात है लेकिन स्वास्थ मंत्री राजेंद्र शुक्ला के निवास पर हुए प्रदर्शन को वे विरोध करते हैं। प्रदर्शनकारियों और कांग्रेस को चुनौती देते हुए सांसद जनार्दन मिश्रा न कहा कि कि अगर मां का दूध पिया है तो पहले बताकर आना, जब गीदड़ की मौत आती है तो वो राजेंद्र शुक्ला की घर की ओर भागता है।

इस पर लोगों ने तीखी और कटाक्ष वाली टिप्पणियां की। किसी ने लिखा कि अगर बहादुरी है तो पहले कक्का को बताओ फिर हमला कर के दिखाओ। अब दुबारा अगर ऐसा हुआ तो कक्का जी मजा चखाएंगे। किसी ने कहा, जनता चुनाव में दिखाएगी। किसी ने राजेंद्र शुक्ला के सहयोगी व्यक्तित्व की प्रशंसा को किसी ने लचर स्वास्थ्य व्यवस्था पर रोष जताया। इसके साथ ही यह भी सवाल उठा कि ऐसा बयान दे कर बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा वास्तव में स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के पक्ष में बोल रहे थे या विरोधियों को भड़का रहे थे?

डॉ. नरोत्तम मिश्रा के हाथों में गुलदस्ते हैं…

मुहावरा तो है कि दोनों हाथों में लड्डू होना। पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के संदर्भ में यह मुहावरा कुछ यूँ होगा कि दोनों हाथों में गुलदस्ता होना। यह रोचक है कि दतिया उपचुनाव में बीजेपी की हार के बाद नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता फिर से बढ़ गई है। बीजेपी कार्यसमिति में भी वह नजर आए थे। इसके बाद भोपाल में रहने के दौरान एक सितंबर को नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय जामवाल उनसे मिलने पहुंच थे। अगले दिन मंत्री विजय शाह उनसे मिलने पहुंचे। इन मुलाकातों को औपचारिक मुलाकातें बताया गया लेकिन इनके राजनीतिक अर्थ तो निकलने ही थे। 

जन्माष्टमी पर भोपाल में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें मीडिया को खास तौर से आमंत्रित किया गया था लेकिन इस कार्यक्रम को छोड़ कर उन्हें दिल्ली जाना पड़ा। दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की तस्वीरें आईं। डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने एक्स पर एक तस्वीर पोस्ट कर लिखा कि दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात हुई है। उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया है।

इस मुलाकात ने भी राजनीतिक कयास को जन्म दिया। एक पक्ष यह भी है कि गुजरे ढाई सालों से यही हो रहा है कि नरोत्तम मिश्रा के हाथों में पद हो या न हो, गुलदस्ता जरूर होता है।