गुरुवार 10 जून 2021 को विदेशों में सूर्य ग्रहण हैं। भारत में इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस बार 148 वर्षों के बाद सूर्यग्रहण, वट सावित्री व्रत और शनि जयंती एक साथ पड़ रही है। गुरुवार 10 जून को पड़ने वाला सूर्य ग्रहण इस साल का पहला सूर्य ग्रहण है। वहीं दूसरा सूर्य ग्रहण इसी साल के आखिर में होगा।

यह सूर्य ग्रहण वलयाकार ग्रहण है। इससे पहले 26 मई को चंद्र ग्रहण हुआ था। 15 दिनों में यह दूसरा ग्रहण है। इस साल 4 ग्रहण होंगे जिनमें दो सूर्य ग्रहण और 2 चंद्र ग्रहण होंगे। पहला चंद्र ग्रहण 26 मई को था, जबकि दूसरा चंद्र ग्रहण 19 नवंबर को होगा। गुरुवार 10 जून को पहला सूर्य ग्रहण है, और अगला सूर्य ग्रहण 4 दिसंबर को होगा। यह सूर्य ग्रहण दोपहर 1 बजकर 42 मिनट से शुरू होगा और शाम 6 बजकर 41 मिनट पर खत्म समाप्त होगा।

सूर्य ग्रहण का नजारा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, यूरोप और एशिया में आंशिक रूप से देखा जा सकेगा। साथ ही उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड और रुस में भी देखने को मिलेगा। इस ग्रहण के दौरान सूर्य एक आग की अंगूठी या कंगन की तरह चमकता हुआ दिखाई देगा। कंगन जैसा सूर्य चंद पलों के लिए ही दिखाई देगा। 

ग्रहण के दौरान सूर्य वलयाकार नजर आएगा। जिसे 'रिंग ऑफ़ फ़ायर' भी कहते हैं। दरअसल वलयाकार सूर्य ग्रहण ते दौरान सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में आते हैं। इस खगोलीय घटना के दौरान चंद्रमा, सूरज और पृथ्वी के बीच आ जाता है। जिसके बाद कुछ जगहों पर थोड़ी देर के लिए अंधेरा छा जाता है।

जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आता है तब चांद की छाया से सूर्य कुछ समय के लिए छिप जाता है। इस खगोलीय घटना को सूर्य ग्रहण कहते हैं। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा करती है, और चंद्रमा पृथ्वी के चारों और घूमता है। ऐसे में कई बार चांद, सूरज और धरती के बीच आ जाता है। जिससे सूरज की रोशनी कुछ समय के लिए रुक जाती है, जिससे धरती आंशिक या पूर्ण सूर्य ग्रहण का नजारा दिखाई देता है।

रिंग ऑफ फायर के दौरान चंद्रमा सूर्य के पूरे भाग को अपनी छाया में नहीं ढक पाता तब ऐसे में सूरज का कुछ हिस्सा चंद्रमा के पीछे से चमकता है, तब वह आग में तपती रिंग जैसा दिखता है, जिसे रिंग ऑफ फायर कहा जाता है।

नासा का कहना है कि रिंग ऑफ फायर हर 18वें महीने में दुनिया के किसी हिस्से में होने वाले सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ पलों के दौरान नजर आता ही है।

ग्रहण का इतिहास बहुत पुराना है। चीनी और बेबीलोनियाई लोग 2500 ईसा पूर्व में सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी करने में सक्षम थे। नासा का कहना है कि ग्रहण की छाया भूमध्य रेखा पर 1,100 मील प्रति घंटे और ध्रुवों के पास 5,000 मील प्रति घंटे तक की यात्रा करती है। 21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण सूर्य ग्रहण, 21 जुलाई, 2009 को हुआ था, तब 6 मिनट और 39 सेकंड तक अंधेरे की स्थिति बनी थी।