मध्यप्रदेश बीजेपी में इन दिनों निगम-मंडलों सहित संगठन में नियुक्तियों के जरिए नेताओं को काम देने और राजनीतिक संतुलन साधने का दौर जारी है। इसीबीच केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्र में दो नेताओं के इस्तीफे पार्टी में उभर रहे असंतोष और नाराजगी का संदेश दे रहे हैं। ग्वालियर से बीजेपी नेता, पूर्व पार्षद देवेंद्र पाठक का पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि सोमवार को गुना में बीजेपी पिछड़ा वर्ग मोर्चा के जिला महामंत्री चंद्रपाल किरार (बंटी) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
ग्वालियर में इस्तीफे के बाद देवेंद्र पाठक ने मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि उन्होंने क्षेत्र की जनता और गरीबों के मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठाई, लेकिन जिला नेतृत्व ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। पार्टी से इस्तीफे के बावजूद देवेंद्र पाठक ने सिंधिया के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। उन्होंने कहा कि पार्टी छोड़ सकता हूं, लेकिन सिंधिया जी का साथ नहीं छोड़ूंगा।
सिंधिया समर्थकों व विरोधियों का टकराव इस्तीफे की राजनीति तक पहुंचा और समर्थक ने इस्तीफा दिया तो सिंधिया के संसदीय क्षेत्र गुना में पिछड़ा वर्ग मोर्चा महामंत्री ने पद से त्यागपत्र दे दिया। यह इस्तीफा केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष केपी यादव के समर्थकों में सोशल मीडिया पर हुई जुबानी जंग का परिणाम है। बीजेपी जिला संगठन ने पिछड़ा वर्ग मोर्चा के जिला महामंत्री चंद्रपाल किरार (बंटी) को भी नोटिस दिया था। नोटिस का जवाब देने के बदले चंद्रपाल किरार ने अपना इस्तीफा भेज दिया। उन्होंने पार्टी पर पिछले तीन वर्षों से लगातार उपेक्षा करने और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। लगातार मूल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है। न तो उन्हें जिले की बैठकों में बुलाया जाता और न ही पार्टी के अन्य कार्यक्रमों की सूचना दी जाती है।
देवेंद्र पाठक जैसे सिंधिया समर्थक नेताओं की नाराजगी का एक अर्थ यह भी है कि सिंधिया समर्थकों को बीजेपी में शुरुआत में खूब तवज्जो मिली लेकिन अब धीरे-धीरे उनका वजूद खत्म हो रहा है। शुरुआती दौर में कई नेताओं को जिम्मेदारियां और पद मिले भी, लेकिन समय बीतने के साथ बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता और नेता सामने आने लगे, जो खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल अंचल में यह भावना ज्यादा दिखाई दे रही है, जहां सिंधिया समर्थकों की मजबूत पकड़ मानी जाती है।
बीते दिनों हुई करीब 60 राजनीतिक नियुक्तियों में सिंधिया समर्थकों की संख्या केवल दो है। जबकि केपी यादव, रामनिवास रावत जैसे सिंधिया विरोधी माने जाने वाले चेहरों को भी अहम जिम्मेदारी दी गई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए नेता पद का इंतजार ही कर रहे हैं। खबरें हैं कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पांच समर्थकों को निगम मंडल में नियुक्ति की अनुशंसा की हैद्ध इन नेताओं में पूर्व मंत्री इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, ओपीएस भदौरिया, गिरिराज दंडोतिया और पूर्व विधायक मुन्नालाल गोयल शामिल हैं। अब तक सूची में ये नाम शामिल नहीं है। माना जा रहा है कि इन नामों को शामिल करने के दबाव के चलते ही अभी भी कुछ नियुक्तियां रूकी हुई हैं। इसीलिए ग्वालियर में सिंधिया समर्थक नेता देवेंद्र पाठक का इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति की नाराजगी नहीं, बल्कि पूरे सिंधिया समर्थक कुनबे की बेचैनी का प्रतीक है।
फीके पड़ गए सज्जन के पक्ष में तर्क
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत के आह्वान का पालन न करने पर बीजेपी ने भिंड किसान मोर्चा के अध्यक्ष सज्जन सिंह यादव को हटा कर कड़ा संदेश दिया है। यह संदेश सही तरह से पहुंचता यदि सभी नेताओं पर समान कार्रवाई होती। ऐसा हुआ नहीं। कई नेताओं ने सैकड़ों वाहनों के साथ सड़क पर शक्ति प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील की अवहेलना की मगर बीजेपी ने केवल भिंड किसान मोर्चा के अध्यक्ष सज्जन सिंह यादव पर ही कार्रवाई की। पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष सौभाग्य सिंह ठाकुर को नोटिस जारी कर उनके अधिकार फिलहाल रोक दिए गए हैं। लेकिन विधायक प्रीतम सिंह लोधी सहित अन्य नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सज्जन सिंह यादव के समर्थक नेता मायूस हैं कि भिंड के किसान मोर्चे का जिलाध्यक्ष का पद सबसे छोटा था, इसलिए उन्हें पद से हटाने में देर नहीं की गई। जबकि बीजेनी ने बड़े नेताओं को तलब करने अथवा नोटिस देने की खानापूर्ति की गई। इस पर नाराजगी जताते हुए सज्जन सिंह यादव के समर्थकों ने सज्जन सिंह यादव को दोबारा पद देने की मांग के साथ सोशल मीडिया पर मुहिम चलाई। उन्होंने मासूम सा तर्क दिया कि वाहनों की भीड़ तो समर्थक लाए थे नवनियुक्त अध्यक्ष सज्जन सिंह यादव ने गाड़ियां लाने को नहीं कहा था।
समय के साथ सज्जन सिंह यादव के पक्ष में चलाई गई यह मुहिम धीरे-धीरे ठंडी पड़ती जा रही है। उन्हें किसी बड़े नेता का साथ भी नहीं मिला है। उनकी पत्नी वंदना यादव भिंड की मौ नगर परिषद में अध्यक्ष है। ऐसे में राजनीतिक समीकरण और भविष्य को ध्यान में रखते हुए फिलहाल सज्जन सिंह यादव चुप हैं। उनके प्रयास है कि अभी तो पद चला गया है लेकिन निकट भविष्य में कोई जिम्मेदारी मिल जाए ताकि सम्मानजनक वापसी हो सके।
निगम–मंडल अध्यक्ष सलाह, छोटे हो, समझ बना कर रखना
निगम मंडल पदाधिकारियों की घोषणा होते ही बीजेपी में हितों के टकराव का मामला शुरू हो गया है। अब तक विभाग के मंत्री ही संबंधित निगम-मंडलों का काम सम्भाल रहे थे। इस कारण मंत्रियों के पास स्टाफ भी ज्यादा था और गाड़ियां भी। अब मंत्रियों के पास से निगम-मंडल की गाड़ियां हट गई हैं। इतना ही नहीं निगम-मंडलों में नियुक्तियां होने से निर्णयों में राजनीतिक हित भी आड़े आएंगे।
बीजेपी संगठन और सरकार पहले ही मंत्रियों और अफसरों में टकराव से निपट रही है। ऐसे में निगम मंडल में नियुक्तियों से टकराव का त्रिकोण बन रहा है। यही वजह है कि इस त्रिकोण की सबसे छोटी इकाई निगम-मंडल पदाधिकारियों को सत्ता और संगठन दोनों ने हिदायत दे दी है। भोपाल में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान निगम, मंडल और बोर्ड के अध्यक्षों तथा उपाध्यक्षों को साफ-साफ कह दिया गया है कि विभागीय मंत्रियों और अधिकारियों के साथ टकराव की हुआ तो उसक दोषी वे माने जाएंगे। अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को उनके अधिकारों की सीमा और जिम्मेदारियों की जानकारी दे कर कहा गया कि वे सबसे छोटे हैं, मंत्रियों और अफसरों से टकराने की भूल न करें। वरना घाटा उन्हीं का होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के इन तेवरों का देख अधिकांश मंडल-निगम पदाधिकारियों को अपनी जमीन समझ आ गई है।
कांग्रेस की सुनी नहीं, बीजेपी एमएलए
इंदौर ने भयानक जल संकट के हाल हैं। दूषित पानी से मौत के मामले में सरकार बच कर निकल गई। अब पानी मिल नहीं रहा है। इस पर कांग्रेस के विरोध को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। जनता अब बीजेपी नेताओं को भी घेर रही है। जनता का आक्रोश देख कर अब बीजेपी विधायक भी नगर निगम की कार्यप्रणाली की आलोचना करने लगे हैं।
यही कारण है कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बीजेपी विधायक महेंद्र हार्डिया ने महापौर पुष्यमित्र भार्गव की मौजूदगी में नगर निगम की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए और अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगाया। नाराजगी के बाद वे कार्यक्रम बीच में छोड़कर वहां से चले गए।
बीजेपी विधायक महेंद्र हार्डिया की मजबूरी यह है कि मैदान में जनता उन्हें घेर रही है जबकि बीजेपी के महापौर और नगर निगम में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। जनता के घेराव बाद विधायक महेंद्र हार्डिया का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे कहते दिखाई दे रहे हैं कि पिछले 20 से 25 साल के अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने इतना गंभीर जल संकट पहले कभी नहीं देखा। कई जगह टंकियां पूरी तरह नहीं भर रही हैं और उनके द्वारा पहले लगाए गए ट्यूबवेल भी अब सूख चुके हैं।
अब जबकि बीजेपी विधायक भी खुल कर बोलने लगे हैं तो इसका मतलब साफ हैं कि इंदौर में जल संकट बेकाबू हो रहा है। ज्यादा दिन दूर नहीं जब राजनीतिक लिहाज तोड़ कर अन्य बीजेपी नेता भी मौन तोड़ेंगे।