भागीरथ का नाम हम गंगा को जमीन पर उतार लेने की मान्यता के कारण जानते हैं और अब इंदौर का भागीरथपुरा चर्चा में हैं जहां दूषित पानी से होने वाली मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। तंत्र की लापरवाही से हुई इस दु:खद त्रासदी की पड़ताल और इसके दोषियों को सजा की बात अलग लेकिन राजनीति तो राजनीति है। क्षेत्र पर कब्जे और वर्चस्व की राजनीति की तस्वीर ऐसी है कि हर कोई भागीरथपुरा की बहती गंगा में अपने हाथ धो लेना चाहता हैं।
इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय को भाई कहा जाता है। बरसों तक इंदौर की राजनीति ताई और भाई यानी सुमित्रा महाजन और कैलाश विजयवर्गीय के इर्दगिर्द घूमी है। अब जब कैलाश विजयवर्गीय के क्षेत्र भागीरथपुरा में रोज ही मौत हो रही है तो गंदे पानी का ठिकरा एक-दूसरे पर फोड़ने का सिलसिला जारी है। ऐसा कैसा सिस्टम है जो सिटीजन चार्टर बना कर सुनवाई की समय सीमा तय करता है और इंदौर जैसे बड़े शहर में पानी को लेकर जनता की पीड़ा किसी ने नहीं सुनी। बात बढ़ी और सवाल उठा कि पार्षद, महापौर, विधायक, मंत्री को शिकायत की जानी थी। जनता ने कहा कि हमने नेताओं से भी शिकायत की थी तो नेता ने लाचारी दिखाते हुए कह दिया कि अफसर हमारी भी नहीं सुनते हैं।
यूं तो इस का दोष हर जनप्रतिनिधि यानी सांसद, विधायक, महापौर, पार्षद और प्रभारी मंत्री तक के हिस्से आता है। लेकिन सीधे सीधे तीर चल रहे हैं कैलाश विजयवर्गीय की ओर चल रहे हैं। उनका इस्तीफा मांगा जा रहा है। यहां तक कि ताई भी कह रही है कि दोष तो नेताओं का है। वे अफसरों को लापरवाह कह कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती कह चुकी हैं कि काम संभल नहीं रहा तो कुर्सी छोड़ क्यों नहीं देते?
मामला केवल कैलाश विजयवर्गीय तक नहीं सिमटा है। हर नेता अपने रकीब को निपटा में लगा है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव लोकसभा टिकट के दावेदार हैं। उनका कार्यकाल दागदार हुआ तो वे भी निशाने पर आए। विरोधियों ने महापौर पुष्यमित्र भार्गव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसकी जवाबी कार्रवाई भी होनी ही थी तो सांसद शंकर लालवानी निशाने पर आ गए। उन्हें लापता बताते हुए सवाल हुए कि हर बात पर बढ़चढ़ कर बोलने वाले सांसद शंकर लालवानी इस मामले पर खामोश क्यों हैं? मंत्री तुलसीराम सिलावट सहित इंदौर के अन्य विधायकों को भी घेरे में लेते हुए सवाल हुए कि वे क्यों इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं? जो बोल रहे हैं उनसे ईमानदार बयान की उम्मीद की जा रही है और जो नेता चुप हैं उनसे उनकी चुप्पी पर सवाल पूछा जा रहा है। मतलब निशाने पर तो सब हैं, जो बोला वह भी और जो नहीं बोला वह भी। एक बयान पर जितना बवाल हुआ उतना घटना के कारणों पर नहीं।
चंबल क्षेत्र में बीजेपी की सागर कलह कॉपी पेस्ट
बुंदेलखंड के सागर क्षेत्र में कांग्रेस से आए मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और बीजेपी के नेता विधायक भूपेंद्र सिंह की कलह जगजाहिर हैं। प्रदेश अध्यक्ष ने दोनों के बीच सुलह करवाई लेकिन तनातनी खत्म नहीं हुई है। मूल बीजेपी और कांग्रेस से आयातीत बीजेपी नेताओं के बीच सागर का वर्चस्व का यह संघर्ष चंबल में भी कॉपी पेस्ट हो गया है। चंबल के हाईप्रोफाइल क्षेत्र विजयपुर में मंत्री दर्जा प्राप्त बीजेपी नेता सीताराम आदिवासी नजरअंदाज किए जाने के व्यथित हैं।
मध्य प्रदेश सहरिया विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त सीताराम आदिवासी ने कहा है कि श्योपुर में हुई बैठक में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। पिछली बैठकों में भी उनका कोई सम्मान नहीं हुआ। मुख्यमंत्री मोहन यादव भी रामनिवास रावत को ही तवज्जो देते हैं। मैं वर्तमान में मंत्री हूं, जबकि रामनिवास रावत किसी पद पर नहीं हैं।
सीताराम आदिवासी और रामनिवास रावत दोनों ही कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में आए हैं लेकिन सीताराम आदिवासी पहले आ गए थे। वे विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी से टिकट के दावेदार थे। बीजेपी ने कांग्रेस से आए नेता रामनिवास रावत को टिकट देना तय किया तो नाराजगी दूर करने के लिए सीताराम आदिवासी को सहरिया विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बना कर मंत्री का दर्जा दे दिया था। अब सीताराम आदिवासी को समझ आ रहा है कि वास्तव में मंत्री का दर्जा नाम भर है। असली ताकत तो चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस से आए नेता रामनिवास रावत के पास ही है। अब तक चुपचाप सहन कर रहे सीताराम आदिवासी ने अपने असंतोष को व्यक्त कर दिया है। यह दबाव की राजनीति का एक पहलू भी है। जैसे, बीजेपी संगठन ने सागर में समझौता करवाया है, विजयपुर में असंतोष बढ़ा तो सीताराम आदिवासी की भी रामनिवास रावत के साथ मुलाकात करते हुए तस्वीरें सामने आ जाएगी।
संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिली प्रेरणा
भोपाल आए संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि अगर आप भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) या विद्या भारती को देखकर संघ को समझने की कोशिश करेंगे, तो आप संघ को कभी नहीं समझ पाएंगे। भाजपा या विहिप के काम करने का तरीका अलग है, वे अपना काम स्वतंत्र रूप से करते हैं। उन्हें संस्कार संघ ने दिया है, लेकिन उनके कार्यों से संघ को परिभाषित नहीं किया जा सकता।
यह बात बयान के रूप में ठीक हो सकती है लेकिन सच यह भी है कि डॉ. मोहन भागवत के बयानों से बीजेपी नेता प्रेरणा लेते हैं। ऐसे ही भोपाल में दिए गए डॉ. मोहन भागवत के एक बयान को बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने अपनी प्रेरणा बना लिया है। भोपाल के हुजूर से विधायक रामेश्वर शर्मा कट्टर हिंदुवादी हैं और उन्होंने ही सबसे पहले डॉ. मोहन भागवत के बयान पर समर्थन व्यक्त किया है। विधायक रामेश्वर शर्मा ने बयान दिया है कि संघ प्रमुख की चिंता सही है। हर हिंदु को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पांच से पच्चीस बच्चे करने वालों से हिंदुस्तान को बचाना है और तीन बच्चे होना किसी भी तरह का अपराध नहीं है।
संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की भोपाल यात्रा संघ के शताब्दी कार्यक्रमों के अंतर्गत हुई लेकिन इस यात्रा से किसी और नेता को फायदा हुआ हो या न हुआ हो, विधायक रामेश्वर शर्मा ने मुद्दा पकड़ कर अपने नंबर बढ़ाने का जतन किया है। आखिर, अभी उन्हें ज्यादा नंबर चाहिए भी क्योंकि मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं गर्म हैं और वे मंत्री पद दावेदार हैं।
यूं वायरल हो रहे मुख्यमंत्री के बयान
सोशल मीडिया दुधारी तलवार है। मध्य प्रदेश में सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को सरकार की ब्रांडिंग के लिए हायर किया गया था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ऐसे कई इंटरव्यू वायरल भी हुए। लेकिन यह प्रयोग अक्सर उल्टा भी पड़ जाता है। ऐसा ही इस हुआ जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बयान नकारात्मक रूप से वायरन हो गए। बैतूल में उनकी जुबान फिसली। बात गन्ने की खेती की होनी थी और वे गुड़ की खेती कह बैठे। जाहिर है, इस पर प्रतिक्रिया होनी थी और ऐसा हुआ भी। सोशल मीडिया इस बयान और इस पर कमेंट से भर गया।
इसके बाद सीएम डॉ. मोहन यादव एकबार फिर नेगेटिव रूप से वायरल हुए। इंदौर में पानी से मौतों के बीच जावरा की सभा में हँसते हुए वीडियो को उनकी संवेदना से जोड़ कर कमेंट किए गए। सीएम डॉ. मोहन यादव के अंदाज और तात्कालिक टिप्पणियों पर प्रशंसा और आलोचना दोनों तरह के कमेंट जा रहे हैं। साफ है सोशल मीडिया ट्रोल्स आर्मी किसी को भी छोड़ती नहीं है।