पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजराइल युद्ध के बीच अब एक नया वैश्विक खतरा सामने आ गया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते सैन्य तनाव और रेड सी क्षेत्र में हमलों के चलते समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स पर संकट मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये अहम केबल्स क्षतिग्रस्त होती हैं तो इसका असर सिर्फ तेल-गैस सप्लाई तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया के इंटरनेट सिस्टम पर गंभीर असर पड़ सकता है।
दरअसल, दुनिया का करीब 95 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए संचालित होता है। ये हजारों किलोमीटर लंबी केबल्स वीडियो कॉल, ईमेल, बैंकिंग, क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी सेवाओं की रीढ़ हैं। फारस की खाड़ी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, बाब अल मंदेब और रेड सी ऐसे प्रमुख समुद्री मार्ग हैं जहां से ये केबल्स गुजरती हैं और यूरोप, एशिया व अफ्रीका को जोड़ती हैं।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेड सी में कम से कम 17 से ज्यादा और पूरे क्षेत्र में 20 से अधिक अहम सबसी केबल्स मौजूद हैं। वहीं, होर्मुज के रास्ते AAE-1, FALCON, Tata-TGN Gulf, SEA-ME-WE-4 और I-ME-WE जैसे महत्वपूर्ण नेटवर्क गुजरते हैं जो भारत समेत कई देशों के अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्शन के लिए बेहद जरूरी हैं।
मौजूदा हालात में खतरा इसलिए बढ़ गया है क्योंकि ईरान ने होर्मुज कैनाल में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं जिससे जहाजों की आवाजाही पर गंभीर असर पड़ा है। वहीं, यमन के हूती विद्रोही रेड सी और बाब अल मंदेब क्षेत्र में जहाजों पर हमले कर रहे हैं। इस कारण पूरा इलाका अत्यंत असुरक्षित हो गया है। ऐसे माहौल में यदि किसी केबल को नुकसान पहुंचता है तो उसकी मरम्मत करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मरम्मत करने वाले जहाज इस क्षेत्र में जाने से बच रहे हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि केबल्स को सबसे बड़ा खतरा सीधे हमलों से कम और युद्ध के दौरान जहाजों की गतिविधियों से ज्यादा होता है। जब जहाज हमलों से बचने के लिए तेजी से मूव करते हैं या एंकर गिराते हैं तो ये एंकर समुद्र तल पर घिसटते हुए केबल्स को काट सकते हैं। सामान्य हालात में ऐसी खराबी कुछ दिनों में ठीक हो जाती है लेकिन मौजूदा युद्ध जैसी स्थिति में यह समस्या हफ्तों या महीनों तक बनी रह सकती है।
यह पहली बार नहीं है जब युद्ध के चलते ऐसी समस्या खड़ी हुई है। इसका असर पहले भी देखने को मिल चुका है। साल 2024 में हूती हमलों के चलते रेड सी की कई केबल्स क्षतिग्रस्त हुई थी। जिसकी वजह से एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में इंटरनेट स्पीड धीमी पड़ गई थी और मरम्मत में महीनों लग गए थे।
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अगर होर्मुज और रेड सी दोनों मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं तो इसका असर वैश्विक स्तर पर देखने को मिलेगा। यूरोप और एशिया के बीच डेटा ट्रैफिक को लंबा रास्ता लेना पड़ेगा जिससे इंटरनेट की गति धीमी होगी और डिजिटल सेवाओं में देरी बढ़ेगी। बैंकिंग सिस्टम, स्टॉक मार्केट, अस्पताल सेवाएं और एआई आधारित प्लेटफॉर्म भी प्रभावित हो सकते हैं।
भारत पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। देश का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक का खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का करीब एक तिहाई पश्चिमी डेटा ट्रैफिक ऐसे ही नेटवर्क पर निर्भर है। ऐसे में केबल्स को नुकसान पहुंचने पर इंटरनेट स्पीड धीमी होने के साथ साथ क्लाउड, डिजिटल पेमेंट और अन्य ऑनलाइन सेवाओं में बाधा आ सकती है। इसके अलावा यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियों ने बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए हैं जो इन केबल्स के जरिए दुनिया से जुड़े हैं। अगर कनेक्टिविटी टूटती है तो ये सेंटर डेटा आइलैंड बन सकते हैं जिससे वैश्विक एआई और क्लाउड सेवाओं पर भी बड़ा असर पड़ेगा।
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