भारतीय मूल की न्यायविद नवनीतम नवी पिल्लै को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल परिवार में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ संघर्ष, मानवाधिकारों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए पैरवी की और युद्ध अपराधों, नरसंहार तथा मानवता के खिलाफ अपराधों के दोषियों को जवाबदेह ठहराने की दिशा में काम किया है।

नवी पिल्लै की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि भारतीय मूल की पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की न्यायपालिका से लेकर संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय अदालतों तक अपनी पहचान बनाई है। उनका करियर महिलाओं के अधिकारों और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष से भी जुड़ा रहा है।

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नवी पिल्लै का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उन्होंने ऐसे दौर में वकालत शुरू की थी जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति लागू थी। वकील के रूप में उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कैदियों के अधिकारों का बचाव किया था। साल 1967 में वह नटाल प्रांत में वकालत शुरू करने वाली पहली महिला बनी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में न्यायाधीश बनने वाली पहली अश्वेत महिला के रूप में इतिहास रचा। उनकी ये उपलब्धियां उस दौर में हासिल हुई जब नस्ल और लिंग के आधार पर भेदभाव बड़ी चुनौती था।

नवी पिल्लै का योगदान न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। साल 1985 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संगठन इक्वैलिटी नाउ की सह स्थापना की थी। यह संगठन महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की रक्षा करने तथा लैंगिक भेदभाव के खिलाफ काम करता है। अंतरराष्ट्रीय न्याय के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। साल 2003 में वह अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की न्यायाधीश बनी। उन्होंने रवांडा में नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में भी काम किया।

रवांडा नरसंहार से जुड़े एक ऐतिहासिक मामले में उनकी भूमिका अहम रही थी। इस मुकदमे में अदालत ने माना कि बलात्कार और यौन हिंसा को भी परिस्थितियों के आधार पर नरसंहार के अपराध के रूप में देखा जा सकता है। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय कानून में यौन हिंसा से जुड़े अपराधों को समझने और उन पर कार्रवाई करने के लिए महत्वपूर्ण मिसाल पेश की।

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साल 2008 से 2014 तक नवी पिल्लै संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रही थी। इस दौरान उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को उठाया था। उन्होंने गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदारी तय करने, पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करने और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत बनाने पर जोर दिया था। उनके लंबे करियर में दक्षिण अफ्रीका की अदालतों, अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों और संयुक्त राष्ट्र में निभाई गई जिम्मेदारियां शामिल हैं। इन्हीं क्षेत्रों में मानवाधिकार और न्याय के लिए किए गए उनके प्रयासों के लिए उन्हें 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है।