भोपाल। राजधानी भोपाल में टीईटी परीक्षा को अनिवार्य किए जाने के आदेश के विरोध में बुधवार को प्रदेशभर के शिक्षक संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया। अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शिक्षकों ने लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) मुख्यालय का घेराव कर नारेबाजी की और परीक्षा रद्द करने की मांग उठाई। इसी दौरान इंदौर सहित कई जिलों में कलेक्टर कार्यालयों के बाहर भी प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे गए।

प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों का कहना है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देकर यह आदेश जारी किया है लेकिन इससे हजारों पुराने शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ गई है। उनका आरोप है कि यह फैसला पुराने नियमों पर नए प्रावधान थोपने जैसा है। जो न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि कानूनी रूप से भी कमजोर है।

संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारी उपेंद्र कौशल ने बताया कि 8 अप्रैल को हुए जिला स्तरीय प्रदर्शन के बाद DPI भोपाल के संचालक के.के. द्विवेदी को ज्ञापन सौंप दिया गया है। फिलहाल आंदोलन स्थगित किया गया है लेकिन यदि 11 अप्रैल तक राज्य सरकार टीईटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करती तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जाएगा।

उन्होंने साफ कहा कि यदि तय समयसीमा के भीतर मांगें नहीं मानी गई तो 18 अप्रैल को प्रदेशभर के शिक्षक अपने परिवार के साथ भोपाल में जुटेंगे और अनिश्चितकालीन प्रदर्शन करेंगे। उस स्थिति में राजधानी में डटे रहने की रणनीति भी तैयार है।

प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने सरकार के फैसले पर नाराजगी जताते हुए तंज कसा कि यदि उनकी योग्यता की जांच के लिए दोबारा परीक्षा जरूरी है तो प्रशासनिक अधिकारियों और कलेक्टरों के लिए भी हर पांच साल में यूपीएससी जैसी परीक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए।

दरअसल हाल ही में DPI भोपाल ने आदेश जारी कर कहा है कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच साल से अधिक समय शेष है उन्हें अनिवार्य रूप से टीईटी पास करना होगा। इसके लिए दो साल की समयसीमा तय की गई है। साथ ही तय समय में परीक्षा पास न करने पर सेवा समाप्ति की कार्रवाई तक की बात कही गई है। स्कूल शिक्षा विभाग का दावा है कि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप लिया गया है।

शिक्षक संगठनों का तर्क है कि शिक्षा का अधिकार कानून 2009 में लागू हुआ था और टीईटी को 2011 से अनिवार्य किया गया। ऐसे में जो शिक्षक इससे पहले नियुक्त हो चुके हैं उन पर अब यह शर्त लागू करना गलत है। उनके मुताबिक यह रेट्रोस्पेक्टिव निर्णय है जो पहले से सेवा दे रहे शिक्षकों के साथ अन्याय है।

संगठनों के अनुसार, इस आदेश का असर करीब 1.5 लाख शिक्षकों पर पड़ सकता है। जिनमें से लगभग 70 हजार शिक्षक 2011 से पहले नियुक्त हुए थे। इन शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति के समय टीईटी की कोई अनिवार्यता नहीं थी। इसलिए अब इसे आधार बनाकर उनकी योग्यता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

आंदोलन को लेकर शिक्षक संगठनों ने पहले ही संयुक्त रणनीति तैयार कर ली है। 29 मार्च को हुई बैठक में विभिन्न संगठनों ने एकजुट होकर संघर्ष तेज करने का निर्णय लिया था। इस बैठक में टीईटी के अलावा शिक्षक ऐप से उपस्थिति और सेवा वृद्धि जैसे मुद्दे भी उठाए गए थे।

बैठक में राकेश पटेल, उपेंद्र कौशल, राकेश पाण्डेय, गिरीश द्विवेदी, दर्शन ओढ़, जितेंद्र शाक्य, राजेश साहू, नीलेश आर्य, द्वारका पटेल, राजेंद्र गुप्ता, नितेश नागर, आनंद वाणी सहित कई शिक्षक नेता और महिला प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

आंदोलन के अगले चरण के तहत 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर प्रदर्शन किए जाएंगे। जहां स्थानीय विधायक, मंत्री और सांसदों को ज्ञापन सौंपकर टीईटी आदेश को निरस्त करने और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग दोहराई जाएगी।