अपनी कार्य प्रणाली के कारण तेज तर्रार आईएएस की पहचान बनाने वाली 2011 बैच की अफसर नेहा मारव्या के दर्द की दवा नहीं है। वे तकलीफ में हैं कि एक साल में 4 बार तबादला कर सरकार उनके साथ क्या सलूक करना चाहती है? आईएएस ऑफिसर्स के ग्रुप में एक लंबा संदेश लिखकर अपनी पीड़ा बताते हुए नेहा मारव्या ने आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका सवाल था कि आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन क्या जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए ही गठित हुआ है? इसके जवाब में भी उन्हें कुछ नसीहतें मिली लेकिन दवा तो फिर भी नहीं मिली। 

2017 में शिवपुरी जिला पंचायत सीईओ रहते हुए तत्कालीन कलेक्टर ओपी श्रीवास्तव के साथ उनके मतभेद की खबर सामने आई थी। तब नेहा मारव्या ने कलेक्टर के इस्तेमाल में आ रही गाड़ी के किराए के भुगतान को लेकर आपत्ति जताई थी। राजस्व विभाग में पदस्थापना के दौरान तत्कालीन प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी के साथ भी उनके मतभेद की खबरें सामने आई थीं। आईएएस नेहा मारव्या तब भी चर्चा में आई थीं जब उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैस के करीबी माने जाने वाले अफसर के विरूद्ध जांच में सख्त कदम उठाए थे। नेहा का मारव्या का आरोप था कि इस कारण उन्हें साइड लाइन कर दिया गया।

डॉ. मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर कलेक्टर न बनाए जाने की पीड़ा व्यक्त की थी। उसके बाद जनवरी 2025 में नेहा मारव्या को पहली बार कलेक्टर की फील्ड पोस्टिंग मिली थी। डिंडौरी में भी उनकी कार्यशैली को लेकर उपजे विवाद के बाद करीब आठ महीने में ही उन्हें कलेक्टर पद से हटा दिया गया। डिंडौरी के बाद नेहा को आदिम जाति क्षेत्रीय विकास योजनाओं का संचालक बनाया गया। यहां भी उनके काम करने के तरीके को लेकर विवाद की खबरें सामने आईं।

इस बार तबादले पर नेहा मारव्या ने आईएएस ग्रुप में लिखा कि एक साल में यह चौथा ट्रांसफर है और शिकायतों पर कार्रवाई की जगह उनका ही तबादला किया गया। नेहा ने दावा किया कि उन्होंने अनुशासनहीनता, फाइलें रोके जाने और दुर्व्यवहार की शिकायत उचित माध्यम से की थी। इसके बाद भी उनका ही तबादला कर दिया गया। नेहा मारव्या की पटरी न तो अपने सीनियर आईएएस अफसरों से बैठ रही है और न ही अपने मातहत अधिकारियों-कर्मचारियों से। ऐसे में वरिष्ठ व रिटायर्ड आईएएस ने उन्हें अपने व्यवहार का जांचने की सलाह दी है। 

डीएफओ के लिए कुर्सी नहीं, क्यों जाएं मीटिंग में?

हाल ही जारी हुए आदेश ने आईएएस और आईएफएस के टकराव को नई सूरत दे दी है। प्रशासनिक आदेश जारी हुआ है कि जिले में कार्य प्रगति को लेकर होने वाली कलेक्टर की टाइम लाइन मीटिंग में वन मंडलाधिकारियों (डीएफओ) को खुद जाना होगा। वे अपने प्रतिनिधि को नहीं भेज पाएंगे। 

इस आदेश के बाद डीएफओ में नाराजगी है। वे मान रहे हैं कि यह डीएफओ को कलेक्टर के नियंत्रण में करने की तैयारी है। उनका तर्क है कि यदि डीएफओ को नियमित रूप से लंबी टीएल बैठकों में बैठना पड़ेगा, तो वन और वन्यजीवों सुरक्षा जैसे मूल मैदानी दायित्वों के लिए उनका समय प्रभावित होगा। डीएफओ को आपत्ति है कि कलेक्टोरेट में उनके लिए पद के अनुसार कुर्सी नहीं मिलती है। उन्हें जिले के जूनियर अफसरों के साथ बैठाया जाता है। जबकि उन्हें कलेक्टर के पास बैठाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक सामान्यतः कलेक्टर के साथ बैठक में एसपी, जिला पंचायत सीईओ, एडीएम और एडीएम के बाद डीएफओ की सीट निर्धारित होती है। डीएफओ स्तर के अधिकारियों का एक वर्ग मानता है कि वन विभाग से जुड़ा महत्वपूर्ण एजेंडा होने पर उन्हें बुलाया जाए, विषय पर चर्चा हो और संबंधित मुद्दे के निपटारे के बाद उन्हें बैठक से जाने की अनुमति होनी चाहिए। 

सीएम ने हटाया नहीं तो कोर्ट से अपील

सागर जिले में बंडा और शाहगढ़ क्षेत्र का जहरीली शराब मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय कोर कमेटी सदस्य वैभव सिंह लोधी ने अधिवक्ता गौरव सिंह के माध्यम से याचिका दायर की है। इस जनहित याचिका में की खास बात यह नहीं है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है बल्कि इसमें कहा गया कि कलेक्टर एसपी को हटाए बगैर जांच संभव नहीं है। 

याचिका में दावा किया गया है कि बंडा और शाहगढ़ इलाके में मिलावटी शराब का नेटवर्क सक्रिय था। सागर गोल्ड और बॉम्बे व्हिस्की के नाम से शराब बेची जा रही थी। इसे पीने से कई गांवों में लोग बीमार पड़े और मौतों की बात भी कही गई है। मौतों और बीमारों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं, इसलिए स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए। स्वतंत्र जांच प्रभावित न हो, इसके लिए कलेक्टर और एसपी के तबादले की अंतरिम मांग रखी गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सागर के कमिश्नर तथा आईजी को बदला है लेकिन मांग की जा रही है कि सागर कलेक्टर, एसपी और आबकारी विभाग की भूमिका की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। सरकार ने नहीं सुनी तो मांग कोर्ट के पास चली गई। 

पीठ पर सवार पटवारी, व्यक्ति हटा, समस्या नहीं

सीधी जिले में अपने जूते गंदे होने से बचाने के लिए एक पटवारी ने 65 वर्षीय बुजुर्ग ललवा केवट की पीठ पर सवार होकर नदी पार की। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में जिस नदी को पटवारी बुजुर्ग की पीठ पर बैठकर पार करते दिखाई दे रहे हैं, उसमें पूरे साल थोड़ा-बहुत पानी रहता है। नदी पार करने के बाद ही गांव के बुजुर्ग लालवा केवट के घर और जमीन तक पहुंचा जा सकता है।

करीब एक साल पहले सर्दियों के मौसम में लालवा केवट की फसल को भालू समेत अन्य जंगली जानवरों ने नुकसान पहुंचाया था। इसके अलावा उनके घरों को भी जंगली जानवरों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने की बात सामने आई थी। इसी मामले में सर्वे करने के लिए पटवारी नीलेश नामदेव उनके घर पहुंचे थे। नदी पार करने के लिए पटवारी ने बुजुर्ग से मदद मांगी। इसके बाद लालवा केवट ने पटवारी को अपनी पीठ पर बैठाकर नदी पार कराई। वीडियो सामने आने के बाद मामले की जांच हुई और जांच के बाद पटवारी निलेश नामदेव को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। सवाल तो यही है कि एक व्यक्ति के हटने सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आया है। अपनी मांग को लेकर कई बुजुर्ग दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं और सिस्टम उनकी पीठ पर सवार है।