यह सब एक शांत दोपहर को शुरू हुआ, जब मेरे सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले चचेरे भाई ने गहरी थकान भरी सांस के साथ अपनी नागरिक शास्त्र (सिविक्स) की किताब मेरी मेज़ पर पटक दी। उसने कहा, "मुझे सिविक्स से नफ़रत है।" अगले ही पल मुझे अपना बचपन याद आ गया, जब सिविक्स का मतलब सिर्फ़ रटी हुई पढ़ाई हुआ करता था। लेकिन उसकी शिकायत सिर्फ़ एक बच्चे की झुंझलाहट भर नहीं थी, यह एक बड़ी राष्ट्रीय सच्चाई की छोटी-सी प्रतिध्वनि थी।
2015 में मैग्ना कार्टा ट्रस्ट के एक सर्वेक्षण में यह सामने आया था कि भारत में सर्वेक्षण में शामिल 39 प्रतिशत लोगों ने कभी भारत के संविधान के बारे में सुना ही नहीं था, वही दस्तावेज़ जो हर नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है। यह व्यवस्थागत अनभिज्ञता केवल किसी सातवीं कक्षा के विद्यार्थी की कक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के हर वर्ग में व्याप्त है।
संवैधानिक साक्षरता क्यों मायने रखती है
जैसा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने हमें याद दिलाया था, एक संविधान लोकतंत्र के लिए ढांचा तो दे सकता है, लेकिन उसका असली अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि लोग उसे जानते हैं, समझते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं या नहीं। एक ऐसा संविधान जिसके बारे में नागरिक जागरूक नहीं हैं, वह केवल कागज़ पर लिखे ढांचे बनकर रह जाने का जोखिम उठाता है। एक "कंकाल" जिसमें जनभागीदारी का जीवन नहीं है। अपने अधिकारों, स्वतंत्रताओं और उनके साथ आने वाली ज़िम्मेदारियों को जानना हमें अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने, संस्थाओं से सवाल पूछने, जवाबदेही की मांग करने और लोकतंत्र में सार्थक रूप से भाग लेने में सक्षम बनाता है, बजाय इसके कि हम हालात को नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लें।
संविधान केवल हम पर शासन करने वाला दस्तावेज़ नहीं है; यह एक ऐसा औज़ार भी है जो हमें यह पूछने की ताक़त देता है कि हम किस चीज़ के हक़दार हैं, हम क्या मांग सकते हैं, और नागरिक के रूप में हम अपने समाज को आकार देने के लिए क्या कर सकते हैं। इसी संस्थापक दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान अंगीकरण के अवसर पर कहा था कि इसका सार यह था कि हमारा संविधान एक लोकतांत्रिक उपकरण है, जो व्यक्तिगत नागरिकों को वे अमूल्य स्वतंत्रताएं सुनिश्चित करना चाहता है; भारत ने कभी किसी विचार या आस्था को न तो निर्धारित किया है, न ही उसका उत्पीड़न किया है, और हमारे दर्शन में किसी व्यक्तिगत ईश्वर के भक्त के लिए भी उतनी ही जगह है जितनी एक अज्ञेयवादी या नास्तिक के लिए।
उन्होंने कहा था कि इस तरह हम अपनी परंपराओं से विरासत में मिली विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपने संविधान के तहत व्यवहार में ला रहे होंगे, और इस नई व्यवस्था के तहत वे दुनिया में शांति की स्थापना में अपने गुरु की शिक्षाओं पर चलने और अपने विनम्र तरीक़े से योगदान देने की आशा रखते हैं।
संवैधानिक साक्षरता कोई अमूर्त शैक्षणिक कवायद भर नहीं है बल्कि यह भारत के हाशिए पर पड़े समुदायों, जैसे दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए एक महत्वपूर्ण जीवन-रेखा है। यह गारंटीशुदा कानूनी अधिकारों, सकारात्मक कार्रवाई (एफ़र्मेटिव एक्शन) और भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा के माध्यम से उन्हें सशक्त बनाकर एक सच्चे समावेशी लोकतंत्र के निर्माण में मदद करती है। नागरिकों को उनकी मौलिक स्वतंत्रताओं की गहरी समझ से लैस करके, यह शांतिपूर्ण दावेदारी और लोकतांत्रिक असहमति की संस्कृति को बढ़ावा देती है, जैसा कि हाल के युवा आंदोलनों में देखा गया है, जो अन्याय और राज्य की ज़्यादती के विरुद्ध ढाल के रूप में संविधान और उसकी प्रस्तावना का सहारा लेते हैं।
इतने सारे नागरिक अपने अधिकारों से अनजान क्यों हैं?
यह व्यापक अनभिज्ञता व्यवस्थागत है। जो नागरिक कभी स्कूल गए भी हैं, उनकी कक्षाओं में भी अनुच्छेदों और अवधारणाओं को रटने पर ज़ोर दिया जाता है, न कि विद्यार्थियों के रोज़मर्रा जीवन में अधिकारों की वास्तविक समझ और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर। ब्राज़ीली शिक्षाविद पाउलो फ़्रेरे ने इसे शिक्षा का "बैंकिंग मॉडल" कहा था, जिसमें शिक्षक जानकारी को निष्क्रिय विद्यार्थियों में "जमा" करते हैं, मानो वे खाली बर्तन हों। ऐतिहासिक सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, निरक्षरता और सत्ता के प्रति गहरी जड़ें जमाए आज्ञाकारिता के साथ मिलकर, नागरिकों को शायद ही कभी सत्ता पर सवाल उठाने या यह समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि बुनियादी गरिमा और समानता कानून द्वारा गारंटीशुदा हैं।
अगर हमें यह बदलना है, तो हमें संविधान को अलग ढंग से पढ़ाना होगा और यह सच्चाई केरल के कोल्लम ज़िले में साबित हो चुकी है। "द सिटिज़न" नामक सात महीने के अभियान के ज़रिए, कोल्लम ने दस साल से ऊपर के हर निवासी को संविधान पढ़ाने का लक्ष्य रखा और 16.3 लाख लोगों तक पहुंच बनाई, जिससे यह भारत का पहला संवैधानिक रूप से साक्षर ज़िला बन गया। केरल ने आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र (क्रिटिकल पेडागॉजी) का इस्तेमाल करते हुए यह उपलब्धि हासिल की।
व्याख्यान देने के बजाय, कुदुम्बश्री नेटवर्क की मुख्यतः महिलाओं और युवाओं से बने 2,200 से अधिक प्रशिक्षित स्वयंसेवकों—जिन्हें "सीनेटर" कहा गया—ने घरों, मनरेगा कार्यस्थलों और आदिवासी परिषदों में "समानता मंच" (इक्वालिटी फ़ोरम) आयोजित किए। उन्होंने भारी-भरकम कानूनी भाषा को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ा, और ऐसे सवाल पूछे जैसे: "अनुच्छेद 14 (समानता) आपकी दैनिक मज़दूरी पर कैसे लागू होता है?" या "अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) आपके पीने के पानी की रक्षा कैसे करता है?"
संवैधानिक नैतिकता का विकास
फिर भी, नागरिकों को अधिकारों की तकनीकी बारीकियां सिखाना लड़ाई का केवल आधा हिस्सा है। असली ज़रूरत तो उस चीज़ को विकसित करने की है जिसे "संवैधानिक नैतिकता" कहा जाता है। संविधान सभा को दिए अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने प्रसिद्ध रूप से तर्क दिया था कि एक संविधान, चाहे वह कितनी ही बारीकी से तैयार किया गया हो, महज़ एक कंकाल भर है। इसका अस्तित्व उन लोगों की नैतिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है जो इसे संचालित करते हैं और इसके तहत जीते हैं। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता को केवल कानूनी औपचारिकताओं के प्रति सम्मान के रूप में नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रक्रियाओं के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, गैर-संवैधानिक शॉर्टकट्स के बजाय संवैधानिक माध्यमों के प्रति सम्मान, और अल्पसंख्यक अधिकारों तथा असहमति के स्वरों का सम्मान करने की इच्छा के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है; इसे सायास विकसित करना पड़ता है।
स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की त्रिमूर्ति
संवैधानिक नैतिकता की नींव स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की त्रिमूर्ति में रखी गई है। 26 नवंबर 1949 के अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कहा था—इसका सार यह था कि हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना होगा, क्योंकि सामाजिक लोकतंत्र के आधार के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है एक ऐसी जीवन-पद्धति जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देती है। इन्हें त्रिमूर्ति के अलग-अलग टुकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए—ये मिलकर एक एकता बनाते हैं, और इनमें से किसी एक को बाकी से अलग करना लोकतंत्र के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देना है।
समानता के बिना, स्वतंत्रता कुछ लोगों के बहुसंख्यक जनता पर वर्चस्व को जन्म देती है; स्वतंत्रता के बिना, समानता व्यक्तिगत पहल का गला घोंट देती है; और बंधुत्व यानी सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना के बिना, स्वतंत्रता और समानता स्वाभाविक रूप से टिक नहीं सकतीं। इस त्रिमूर्ति के जीवित रहने के लिए ज़रूरी है कि प्रमुख संस्थाएं सक्रिय रूप से संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखें। सरकारी प्रशासन को अपनी निष्ठा सत्ता में बैठे राजनीतिक दल के निष्क्रिय साधन बनने के बजाय सख़्ती से संविधान में रखनी चाहिए, ताकि बिना किसी पक्षपात के समान सेवा वितरण सुनिश्चित हो सके। साथ ही, न्यायपालिका को अंतिम संरक्षक के रूप में काम करते रहना चाहिए, संवैधानिक नैतिकता को लागू करते हुए कार्यपालिका की ज़्यादतियों पर रोक लगानी चाहिए, असंवैधानिक कानूनों को रद्द करना चाहिए, और बहुसंख्यकवादी जोश के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा करनी चाहिए।
भारत आज भी विरोधाभासों का जीवन जी रहा है। जहां हमने "एक व्यक्ति, एक वोट" के रूप में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को सफलतापूर्वक बनाए रखा है, वहीं हम अब भी सामाजिक और आर्थिक असमानता की स्थिति में जी रहे हैं, जहां "एक व्यक्ति, एक मूल्य" अभी तक हासिल नहीं हो सका है। डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि भारत में लोकतंत्र केवल "एक ऐसी ऊपरी परत है जो मूलतः अलोकतांत्रिक भारतीय मिट्टी पर चढ़ाई गई है।" और इस नाज़ुक लोकतांत्रिक मिट्टी की रक्षा के लिए, उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल का हवाला देते हुए नागरिकों को चेतावनी दी थी कि वे अपनी स्वतंत्रताएं किसी महान व्यक्ति के चरणों में भी न रखें, या उसे इतनी शक्तियां न सौंपें जिनसे वह उनकी संस्थाओं को ही उलट सके।
उन्होंने मिल की इस अंतर्दृष्टि को राजनीति में भक्ति (हीरो-पूजा या श्रद्धा) के विरुद्ध चेतावनी देने के लिए इस्तेमाल किया, यह कहते हुए कि भक्ति भले ही धर्म में मुक्ति का मार्ग हो, लेकिन राजनीति में यह पतन और तानाशाही का पक्का रास्ता है। आज का राजनीतिक परिदृश्य व्यक्तित्व-पूजा के एक पंथ में बदल चुका है, जहां अंधी राजनीतिक भक्ति, विभाजनकारी पहचान-आधारित रणनीतियां, और सत्तावादी शॉर्टकट सक्रिय रूप से संस्थागत अखंडता को खोखला कर रहे हैं।
संविधान की रक्षा करना
जैसा कि अंबेडकर ने कहा था, एक संविधान उतना ही अच्छा है जितने अच्छे वे लोग हैं जो इसे चलाते हैं। आज़ादी ने विदेशी शासकों को दोष देने का बहाना छीन लिया, अगर अब कुछ ग़लत होता है, तो इसके लिए दोषी केवल हम खुद हैं। संविधान की रक्षा करना बहुसंख्यक-तानाशाही को रोकती है, शिकायतों के समाधान के लिए कानूनी तंत्र प्रदान करके सामाजिक शांति बनाए रखती है, और मनमाने राज्य-कार्रवाई के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है।
नागरिक संवैधानिक साक्षरता को केवल सरकार या नागरिक कर्तव्य जागरूकता कार्यक्रम (CDAP) या "हमारा संविधान, हमारा सम्मान" जैसी औपचारिक योजनाओं पर नहीं छोड़ सकते। सच्चे बदलाव के लिए समाज में हर स्तर पर रोज़मर्रा की भागीदारी ज़रूरी है। नागरिक संवैधानिक मूल्यों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे सकते हैं। केरल के "समानता मंच" की तर्ज़ पर स्थानीय भाषाओं में प्रस्तावना पर चर्चा के लिए पड़ोस में वाचन-समूह आयोजित करके, स्कूलों में रटी हुई सिविक्स की जगह इंटरैक्टिव मॉक पार्लियामेंट और वास्तविक दुनिया की बहसों को अपनाकर, और अदालती फ़ैसलों की जटिल भाषा को सुलभ क्षेत्रीय भाषा की कहानियों, पॉडकास्ट, दृष्टांतों और ग्राफ़िक्स में बदलकर। सबके लिए लिखा गया संविधान अंततः सबके द्वारा पढ़ा, समझा और जिया जाना चाहिए।
(लेखक अन्वेषा सुमन संसदीय शोधकर्ता एवं पूर्व LAMP फेलो हैं। वर्तमान में वे ‘संविधान कला यात्रा’ नामक स्वतंत्र परियोजना पर कार्यरत हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।)