इन्दौर में दूषित पेयजल की आपूर्ति के कारण 20 से अधिक नागरिकों की मृत्यु हो जाना एक गहरी मानवीय त्रासदी है। जिन ज़िंदगियों को दूषित पानी ने निगल लिया, उन्हें न तो लौटाया जा सकता है और न ही किसी मुआवज़े से परिजनों का दुःख कम किया जा सकता है। हाँ, एक काम अवश्य किया जा सकता है—यह पता लगाया जाए कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का सीवेज जिम्मेदारी, नैतिकता और उत्तरदायित्व की स्वच्छ जल व्यवस्था में कब और कैसे मिल गया।
अपने सार्वजनिक जीवन में मैं सदैव उत्तरदायित्व स्वीकार करने का पक्षधर रहा हूँ। व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए नैतिक मूल्यों से समझौता करना मैंने कभी स्वीकार नहीं किया। यदि आज इन्दौर में दूषित जल के कारण निर्दोष नागरिकों की मृत्यु हुई है, तो इसकी निष्पक्ष पड़ताल करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय तलाशना केवल एक राजनीतिक दायित्व नहीं, बल्कि एक नागरिक कर्तव्य भी है। व्यवस्था के केंद्र में चाहे कोई भी दल या व्यक्ति हो, उसका प्रथम दायित्व नागरिकों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और भयमुक्त जीवन का बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना होता है।
वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग का गठन कर शहरी विकास के प्रति दूरदृष्टि दिखाई थी। आयोग ने समग्र शहरी नियोजन, जन-भागीदारी और स्थानीय निकायों की सशक्त भूमिका पर बल दिया। दुर्भाग्यवश, उनकी असमय हत्या के कारण आयोग की सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं। यद्यपि इन्हीं सिफारिशों के आधार पर 74वाँ संविधान संशोधन हुआ, जिसने शहरी सुधारों की नींव रखी। प्रश्न यह है कि क्या आज भी शहरी नियोजन में वैसी दूरदृष्टि शेष है, या हम केवल स्मार्ट सिटी के चमकते पोस्टरों में उलझकर अव्यवस्थित शहरीकरण की कठोर सच्चाई से आँखें मूँदे हुए हैं?
इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनिबिलिटी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत का लगभग 70 प्रतिशत पानी दूषित हो चुका है। मध्यप्रदेश में भोपाल, ग्वालियर, इन्दौर और जबलपुर जैसे शहरों के बुनियादी ढांचे को सुधारने और नागरिकों को बेहतर पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2003 में 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्राप्त हुआ था, जो आज के मूल्य पर 18 हजार करोड़ रुपये से अधिक बैठता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस धनराशि का कितना और कैसे उपयोग हुआ, और उसका लाभ आम नागरिक तक क्यों नहीं पहुँचा?
प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय जल जीवन मिशन एक सराहनीय पहल थी, किंतु इसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मध्यप्रदेश में विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने भी इस योजना में लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। विधानसभा में तथ्य सामने आए। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछाने वाली एजेंसियों, सामग्री आपूर्तिकर्ताओं और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की मिलीभगत की खबरें समाचार माध्यमों में आईं, जबकि सरकार इनका खंडन करती रही और स्मार्ट सिटी योजनाओं का महिमामंडन होता रहा।
राज्य की अनेक ग्राम पंचायतों में गुजरात की कंपनियों को किस प्रकार ठेके दिए गए, यह भी सवालों के घेरे में है। कई कंपनियों ने कार्य पूर्ण किए बिना ही भुगतान प्राप्त कर लिया, बाद में उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया, और फिर वही लोग अन्य नामों से पुनः ठेके लेते रहे। के.एस. गोधानी कंस्ट्रक्शन (सूरत), इनफाइनाइट कंस्ट्रक्शन (सूरत), अमृत इन्फ्राप्रोजेक्ट (सूरत), नीलकंठ कॉर्पोरेशन (अहमदाबाद), वेस्टकॉन इन्फ्रा (सूरत), जयखोडियार इंटरप्राइजेस और ग्रीन कंक्रीट कंस्ट्रक्शन (अहमदाबाद) जैसी कंपनियों को किन शर्तों पर ठेके मिले—यह जानने का अधिकार नागरिकों को है। क्या इन्दौर के भागीरथपुरा में भ्रष्टाचार का यही सीवेज पेयजल की पाइपलाइनों में नहीं मिला होगा?
पहाड़ी और वनांचल क्षेत्रों में जल भंडारण के लिए ओवरहेड टैंक नहीं बनाए गए। अनेक गांवों में केवल स्टैंड लगा दिए गए, जिनमें न पाइप हैं, न पानी। आदिवासी क्षेत्रों में कई पंचायत प्रतिनिधियों को तक यह जानकारी नहीं कि उनकी पंचायतों में नल-जल योजना कागज़ों में पूरी घोषित कर दी गई है। जहाँ कहीं कार्य हुआ भी है, वहाँ जल गुणवत्ता परीक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं है। जब राजधानी भोपाल में ही जल परीक्षण के लिए पर्याप्त सुविधाएँ और अमला उपलब्ध नहीं हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों से बेहतर स्थिति की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यदि भारत के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा कई बार हासिल कर चुके इन्दौर में दूषित पानी से लोगों की जान जा सकती है, तो यह मानना कठिन नहीं कि दूरस्थ और वंचित अंचलों में ऐसी मौतें अनदेखी रह जाती होंगी।
भारत की प्राचीन परंपराओं में जल को जीवन का आधार माना गया है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है—“आपो वै प्राणाः”, अर्थात जल ही प्राण है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस जल को, जिसे हम प्राण कहते हैं, पूरी जिम्मेदारी, ईमानदारी और नैतिकता के साथ नागरिकों तक पहुँचा पा रहे हैं? यदि नहीं, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक विफलता भी है।
आजादी के समय देश की मात्र 17 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी, जो आज बढ़कर लगभग 31 प्रतिशत हो चुकी है। अनुमान है कि 2030 तक यह 40 प्रतिशत के आसपास पहुँच जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में घटते रोजगार, पलायन और तेज़ शहरीकरण के दबाव में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह समस्या केवल पाइपलाइन बिछाने से हल नहीं होगी। इसके लिए अवैध बस्तियों पर नियंत्रण, सीवेज और पेयजल लाइनों का स्पष्ट पृथक्करण तथा हर दस वर्ष में नया मास्टर प्लान अनिवार्य है।
भोपाल में मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में 1994 में मास्टर प्लान लागू किया गया था, जिसे 2004-05 में अद्यतन किया जाना चाहिए था। दुर्भाग्यवश, पिछले बीस वर्षों में इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। हम विकास के चमकते पोस्टर लगा सकते हैं, मेट्रो की पटरियों पर खाली गाड़ियाँ चला सकते हैं, किंतु यदि आम नागरिक के घर की नल से स्वच्छ जल नहीं निकलता, तो यह विकास अधूरा है।
अब आवश्यकता है कि ठेकेदार-केन्द्रित सोच से हटकर नागरिक-केन्द्रित व्यवस्था बनाई जाए। जब तक व्यवस्था की नसों में मिले हुए सीवेज और पेयजल को अलग नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियाँ हमें बार-बार चेतावनी देती रहेंगी।
(लेखक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं)