खोल आँखें, जमीन देख, फलक देख, फिज़ा देख,
मशरिख में उभरते हुए सूरज को देख,
इस जलवा-ए-परदा को परदों में छुपा देख,
अय्याम के जुदाई के सितम देख, जफ़ा देख॥
अल्लामा इकबाल

भारत में युवाओं ने करीब 52 साल बाद पुनः मोर्चा संभाला है। पाँच दशक पहले गुजरात के मोरबी के एक महाविद्यालय के कैंटीन से उपजा असंतोष अंततः देश में राजनीतिक बदलाव तक पहुँचा था। गौरतलब है हर समयकाल का अपना जेन-जी होता है, जेन अल्फ़ा होता है, बस संबोधन बदलता रहता है। इस बार भी युवाओं का आव्हान ऐसे समय किया गया, जबकि सारे देश में कमोवेश निराशा का वातावरण बनता जा रहा है। सांप्रदायिकता, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, राजनीतिक पतन और सामाजिक शोषण कमोवेश चरम पर है। इस बार इस नई लहर को धारा में बदलने की मुहिम राहुल गांधी ने उठाई। 

कॉकरोच जनता पार्टी ने इसे नई ऊंचाई तक पहुँचाया। कोटा से प्रारंभ "छात्रों की गूंज" उत्तराखंड, इलाहाबाद, पूना से होती हुई इंदौर तक पहुँचने की यात्रा है। इस यात्रा की गूंज कमोवेश अनुगूंज में बदलती जा रही है। पूना के सम्मेलन में लड़कियों/महिलाओं की वर्तमान स्थिति को लेकर जितने खुलेपन और स्पष्टता से चर्चा हुई वह वास्तव में वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य का दुर्लभ क्षण है। ज्यादातर राजनीतिज्ञ पितृसत्तात्मकता की बात छुपे आवरण में करते हैं, लेकिन राहुल गांधी ने इसे जिस मुखरता से रखा, उससे भारत की महिलाओं को नए तरह से सोचने का हौसला मिलेगा।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वरुप वस्तुतः एक तालाब जैसा हो गया था, जिसमें उठने वाली लहरें भी एक सीमित दायरे में विचरण करती हैं। छात्रों की गूंज को भले ही गैरराजनीतिक कहा जा रहा है, परंतु यह युवाओं में राजनीतिक चेतना विकसित कर रही है। यानी तालाब एक नदी में बदले जाने की प्रक्रिया में हैं। नदी जिसमें हर लहर नई होती है, प्रवाहमान होती है। उसका दायरा व्यापक होता है और वह सबको साथ लेकर चलती है। किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राजनीति से पृथक कर कुछ देख या कर पाना असम्भव सा होता है। देश के छात्रों पर इस वक्त जो सबसे बड़ा और भयानक संकट उतरा है, वह है “नई शिक्षा नीति।"

इसका अवतरण भारतीय शिक्षा प्रणाली द्वारा जो कुछ भी आज़ादी के बाद शिक्षा ने गुणात्मक रूप से अर्जित किया था, उससे टकराहट में है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी कहानी "तोते की शिक्षा" में शिक्षा को लेकर एक स्थापना करते हैं, "सुरक्षित और पिंजरबद्ध, साक्षात संस्कृति"। भारतीय शिक्षा प्रणाली में भी एक तरीके का ठहराव सा आता जा रहा है। इसमें शिक्षा प्रणाली में आए परिवर्तन के समानांतर एक अन्य परिघटना भी महत्वपूर्ण है। यह है विश्वविद्यालयों और उनके परिसर में लुप्त होती जा रही स्वायत्तता। जागरूक विद्यार्थियों को देशद्रोही तक की संज्ञा दी जा रही है। यदि विश्वविद्यालय परिसर ही लोकतांत्रिक नहीं होंगे और असहमति को स्वीकार करने में अक्षम होंगे तो देश में लोकतंत्र जीवन कैसे रहेगा?

महात्मा गांधी ने पहले ग्रंथ "हिन्द स्वराज" (सन 1909) में महाराजा गायकवाड़ द्वारा अपने राज्य बड़ौदा में शुरू की गई लाजिमी शिक्षा पर अपनी टिप्पणी में कहा था, "अगर हम अपनी सभ्यता को सबसे अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ेगा कि यह कोशिश ज्यादातर बेकार है। महाराज साहब और उनके धुरंधर नेता सबको तालीम देने की जो कोशिश कर रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें धन्यवाद ही देना चाहिए। लेकिन उनके हेतु का जो नतीजा आने की संभावना है, उसे हम छिपा नहीं सकते।“ वे बात को आगे बढ़ाते हैं, “शिक्षा : तालीम का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ अक्षरज्ञान ही हो, तो वह एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा भी। एक शस्त्र (औज़ार) से चीर फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और किसी की जान लेने के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। 

“आज करीब 117 वर्षों बाद भी भारतीय शिक्षा पद्धति वहीं कदम-ताल करती नजर आ रही है। बीच के वर्षों में जो कुछ परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही थी, पिछले बारह-तेरह वर्षों से वह आहट सन्नाटे में बदल गई है। वैसे महात्मा गाँधी ने कहा भी था कि, “मेरा कार्य मेरे मरने से समाप्त नहीं हो जाएगा।“ तो शिक्षा में सुधार एक सतत प्रक्रिया है और अतीत का अनर्गल महिमा मंडन इसका ध्येय नहीं हो सकता। शिक्षा भले ही रोजगार मूलक न हो परंतु उसे भेदभाव से दूर ही रहना चाहिए। 

इस वक्त छात्रों के सामने सबसे बड़ा संकट है अपना अध्ययन जारी रखना। हालिया रिपोर्ट बयान रहीं है कि हायर सेकेण्डरी के बाद 73 प्रतिशत छात्र शिक्षा जगत से बाहर हो रहे हैं। तो सोचिए हमारा देश किस दिशा में जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों से उबारने के लिये आवश्यक है कि हम भारत की आजादी के संघर्ष को खासकर महात्मा गांधी के इसमें सन 1915 में पदार्पण के बाद की कार्यप्रणाली पर विस्तृत चर्चा करें और उसका गहन विश्लेषण कर उसकी वर्तमान संदर्भों में उपयोग में आ सकने संबंधी विवेचना करें। आजादी के आंदोलन में बापू का सबसे बड़ा योगदान होते हुए भी उनकी कार्यप्रणाली से पता चलता है कि उनका पूरा श्रम “सहायक” तैयार करने में नहीं “सहयोगी” खड़े करने पर था। वे अपना कार्य करते थे और उनके सहयोगी नेहरु, पटेल, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान आदि अपनी-अपनी तरह से आजादी के संघर्ष में जुटे थे। प्रत्येक का अपना पृथक अस्तित्व भी था। यह बेहद कठिन कार्य और प्रक्रिया है और इसमें हमेशा असहमति का खतरा बना रहता है। परंतु गांधी में अपने समय की असहमतियों को अवसरों में बदल दिया। आज की आवश्यकता भी यही है कि भारत के संवैधानिक और मानवीय मूल्यों को जनसमुदायों तक पहुँचाया जाए। 

राहुल गाँधी का इंदौर दौरा इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इंदौर-भाजपा और संघ की आदिम प्रयोगशाला रही है और यहीं से बहुत कुछ भाजपा की राजनीति में प्रविष्ट हुआ है। शायद इसीलिये राहुल गाँधी की यात्रा के ठीक एक दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अपना भोपाल का कार्यक्रम रद्द करके उसे इंदौर में कर रहे हैं। उधर संघ के सरसंघचालक भी 17-18 को इंदौर उज्जैन में ही हैं। इसलिए इंदौर एकतरह से भारतीय राजनीति के नवीनतम समीकरणों में कितकीश्रेष्ठता है, का निर्धारण भी करने की स्थिति में है। परंतु इस सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जो चेतना युवाओं में जागृत हो रही है, उसका उपयोग व्यवस्था परिवर्तन में किस तरह किस तरह से हो सकता है। 

युवाओं की वर्तमान अभिव्यक्ति ने भारतीय लोकतंत्र और राजनीति पर लगे ग्रहण को थोड़ा घटाने का प्रयास किया है, लेकिन अभी रास्ता लंबा है। यह जागरूकता क्या सकारात्मक राजनीतिक चेतना में परिवर्तित हो पाएगी? और इस कार्य को समय पर नहीं छोड़ा जा सकता है। जिस तरह भारत की आज़ादी के लिए लगातार प्रयत्न किए गए, तब भी यह प्रयत्न जारी रहे, जब लगने लगा था कि अब तो आजादी मिल ही जाएगी। राहुल गांधी ने अपना काम कर दिया है। अब आवश्यकता है इस धारा को प्रवाहमय बनाए रखा जाए। अंत में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की इस बात पर गौर करिए, "बुद्धिमान लोग दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं, जबकि बेवकूफ लोग दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करते हैं और इतिहास बनाते हैं।" 
हम सबको एकसाथ बेवकूफ बनना ही होगा।

(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)