मध्य प्रदेश के सागर जिले की बंडा तहसील के छह गांवों में जहरीली और मिलावटी शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर राज्य की आबकारी व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और राजनीतिक संरक्षण के सवाल को केंद्र में ला दिया है। छह गांवों घूघरा खुर्द, नौराज, बमूरा, पाटन, चौका और दलपतपुर में जहरीली शराब पीने के बाद लोगों की तबीयत बिगड़ी और मौतों का सिलसिला शुरू हुआ। 7 सितंबर की सुबह तक प्रशासन ने 12 मौतों की पुष्टि की थी, जबकि स्थानीय रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 19 तक पहुंचने की बात कही गई है। इस अंतर को भी जांच का विषय बनाया जाना चाहिए। लगभग 30 लोग अभी चिकित्सा निगरानी में बताया गया हैं। प्रारंभिक जांच में शराब की आपूर्ति का संबंध उत्तर प्रदेश के ललितपुर क्षेत्र से जुड़ने की बात सामने आई है। पुलिस ने 30 लोगों को आरोपी बनाया और 14 को गिरफ्तार किया है। आबकारी तथा पुलिस विभाग के कुछ अधिकारियों को निलंबित भी किया गया है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व ही एक दैनिक अखबार ने नकली पैकिंग का मामला प्रकाशित किया था, मगर बिना फॉरेंसिक जांच करवाए शनिवार को उसे क्लीनचिट दे दी गई थी। और एक दिन बाद ही इस जहरीली शराब ने लोगों की जीवन लीला समाप्त कर डाली। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि किसके दबाव में, बिना फॉरेंसिक जांच करवाए पुलिस और आबकारी विभाग ने इस जहरीली शराब को क्लीनचिट दी थी? सवाल केवल यह नहीं है कि जहरीली शराब किसने बनाई और किसने बेची। बड़ा सवाल यह है कि वह शराब प्रशासन की आंखों के सामने गांवों तक पहुंची कैसे? 

सागर की घटना मध्य प्रदेश में जहरीली शराब की पहली त्रासदी नहीं है। वास्तव में यह एक ऐसी श्रृंखला की अगली कड़ी है, जिसमें हर बार कुछ लोगों की गिरफ्तारी, कुछ अधिकारियों का निलंबन, मुआवजे की घोषणा और जांच के आदेश के बाद मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है।आंकड़े बताता है कि समस्या कितनी पुरानी है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में उपलब्ध कराए गए एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में अवैध या मिलावटी शराब के सेवन से वर्ष 2018 में 410, वर्ष 2019 में 190 और वर्ष 2020 में 214 लोगों की मौत हुई है। यानी केवल तीन वर्षों में 814 मौतें दर्ज हुई है। वर्ष 2021 में भी एनसीआरबी ने मध्यप्रदेश में 108 मौतें दर्ज की है। यह आंकड़ा अपने आप में भयावह है। हालांकि इसे शराब से होने वाली सभी मौतों का आंकड़ा नहीं माना जा सकता है। 

एनसीआरबी की यह श्रेणी केवल अवैध या मिलावटी शराब के सेवन से हुई मौतों को दर्ज करती है। फिर भी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जहरीली शराब मध्यप्रदेश में कोई आकस्मिक या नई समस्या नहीं, बल्कि लंबे समय से मौजूद संगठित अवैध कारोबार है।

मध्य प्रदेश विधानसभा के सरकारी रिकॉर्ड में जनवरी 2021 के मुरैना जहरीली शराब कांड में 24 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। बाद में इस मामले में अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी ठहराकर 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। मुरैना के बाद भी कहानी नहीं बदली। भिंड में जनवरी 2022 में अवैध शराब से चार लोगों की मौत हुई थी। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद कहा था कि स्थानीय पुलिस की संलिप्तता के बिना अवैध शराब की आपूर्ति संभव नहीं है।

इस बयान को केवल एक घटना की प्रतिक्रिया मानकर भुला दिया गया। लेकिन आज सागर में वही सवाल फिर खड़ा है। सवाल यह है कि जहरीली शराब बनने और बिकने के बाद प्रशासन कार्रवाई क्यों करता है, उससे पहले क्यों नहीं? शराब की अवैध बिक्री कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं होती। गांवों और कस्बों में कौन शराब बेचता है, कहां से शराब आती है और किन रास्तों से उसका परिवहन होता है,स्थानीय पुलिस और आबकारी तंत्र के पास इसकी जानकारी होती है। फिर भी कार्रवाई अक्सर तब होती है जब कई घरों में मौत हो चुकी होती है। सागर मामले में भी सामने आया है कि नकली शराब की पैकेजिंग कथित तौर पर असली जैसी दिखाई देती थी और जांच में ललितपुर से आपूर्ति का संदेह सामने आया है। पांच दुकानों को सील किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल गांव के किसी छोटे शराब विक्रेता तक सीमित नहीं हो सकती है। यदि बाहर से शराब आ रही थी, स्थानीय स्तर पर उसका वितरण हो रहा था और लोग उसे वैध शराब समझकर खरीद रहे थे, तो सवाल पूरी सप्लाई चेन की निगरानी का है। 

सागर की घटना के संदर्भ में शराब माफिया और सत्ता के गठजोड़ के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन जब तक जांच में ठोस प्रमाण सामने न आता, इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि गंभीर आरोप और जांच के प्रश्न के रूप में देखना चाहिए। फिर भी इस आरोप को पूरी तरह खारिज करना भी आसान नहीं है। क्योंकि अवैध शराब का कारोबार केवल अपराधियों के बल पर लंबे समय तक नहीं चलता। जहां लगातार अवैध कारोबार चलता है, वहां स्थानीय संरक्षण, प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार या राजनीतिक प्रभाव की संभावनाओं की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है। 

मुरैना और भिंड की घटनाओं में भी प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत या लापरवाही के सवाल उठे थे। भिंड की घटना के समय मुख्यमंत्री ने स्वयं पुलिस की संभावित संलिप्तता पर सवाल उठाया था। इसलिए सागर की जांच केवल शराब बनाने वालों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह भी पता चलना चाहिए कि शराब किसने पहुंचाई, किसने बेची, किसने उसे वैध शराब जैसा दिखाया, शिकायतें किस स्तर पर पहुंचीं, किसने कार्रवाई नहीं की और किसे राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण मिला हुआ है। हर जहरीली शराब कांड के बाद कुछ अधिकारियों को निलंबित कर देना आसान प्रशासनिक प्रतिक्रिया है। 

सागर में भी आबकारी अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है। लेकिन निलंबन अपने आप में व्यवस्था का सुधार नहीं है। जरूरत इस बात की है कि जांच यह निर्धारित करे कि किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी और उसने क्या नहीं किया। यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर आंखें बंद की, अवैध कारोबार की जानकारी के बावजूद कार्यवाही नहीं की या किसी कारोबारी को संरक्षण दिया, तो विभागीय कार्यवाही के साथ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इसी तरह केवल शराब बेचने वाले छोटे विक्रेता को पकड़कर पूरा नेटवर्क समाप्त होने का दावा करना भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

सरकार की असली विफलता रोकथाम में है। सरकार के पास आबकारी विभाग है, पुलिस है, खुफिया तंत्र है, सीमा पर जांच व्यवस्था है और लाइसेंसी शराब दुकानों की निगरानी का तंत्र है। इसके बावजूद यदि जहरीली शराब गांवों तक पहुंच जाती है तो सवाल व्यवस्था की क्षमता का है। सबसे बड़ी विफलता यह है कि सरकार घटना के बाद प्रतिक्रिया देती है, लेकिन घटना से पहले रोकथाम नहीं कर पाती। जहरीली शराब से मौत के मामले में उपचार भी चुनौतीपूर्ण होता है। 

मेथनॉल विषाक्तता में धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण गंभीर चेतावनी होते हैं और समय पर उपचार न मिलने पर मृत्यु हो सकती है। सागर में भी कई मरीजों ने धुंधला दिखाई देने की शिकायत की थी। इसलिए प्रत्येक जिले में जहरीली शराब की पहचान और उपचार के लिए स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और आबकारी विभाग के बीच तत्काल प्रतिक्रिया तंत्र होना चाहिए। अब जांच का दायरा बड़ा होना चाहिए कि पहला, शराब की पूरी सप्लाई चेन का पता लगाया जाए। दूसरा, पिछले कुछ महीनों में अवैध शराब के संबंध में मिली शिकायतों और पुलिस-आबकारी कार्यवाही का ऑडिट हो। तीसरा, स्थानीय शराब ठेकेदारों, एजेंटों और संदिग्ध आपूर्तिकर्ताओं के आर्थिक लेन-देन की जांच हो। चौथा, पुलिस और आबकारी अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो। पांचवां, राजनीतिक संरक्षण के आरोपों की जांच भी हो और यदि किसी जनप्रतिनिधि, राजनीतिक व्यक्ति या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी उसी कठोरता से कार्यवाही होनी चाहिए जैसी किसी छोटे शराब विक्रेता के खिलाफ होती है।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)