“कोई कलाकृति तभी मूल्यवान होती है, जब भविष्य की आहटें उसमें मौजूद होती हैं।"
आंद्रे ब्रेतो

आज से ठीक 200 साल पहले 1826 में पहली बार हेलियोग्राफी के माध्यम से पहला छायाचित्र दुनिया के सामने आया। इसके एक्सपोजर में करीब 8 घंटे लगे थे। हेलियोग्राफी मूलतः ग्रीक भाषा से लिया गया शब्द है। हेलियो का अर्थ होता है सूर्य और ग्रिफिआ यानी लिखना। यानी “सूर्य से या रोशनी से लिखना।"
हेलियोग्राफी से फोटोग्राफी तक का लंबा सफर लगातार परिवर्तनों और नवाचार से जुड़ा रहा है। जाहिर है तभी हम देख पा रहे हैं कि 8 घंटे में एक एक्सपोजर से हम आज माध्यम श्रेणी के कैनन-डी 80 कैमरे के ड्राइव मोड में एक बार शटर दबाने पर 1 सेकंड में 7 फोटो खिंच जाते हैं, यानी एक मिनट में करीब 420 फोटो। 

वैसे अब तकनीक इससे भी आगे पहुँच चुकी है। तो रोशनी से लिखाई आज दो सौ बरस बाद भी बदस्तूर जारी है। फोटोग्राफी ऐसी कला है जिसमें दस्तावेजीकरण की क्षमता है और यही फोटोग्राफी का सर्वश्रेष्ठ गुण भी है। प्रौद्योगिकी या तकनीक में लगातार उन्नति के बारे में कहा जाता है कि भविष्य में यंत्र मनुष्य को ऐसे यांत्रिक श्रम से मुक्त कर देंगे जो मनुष्य के लिए अकरणीय माना जाने लगेगा। मगर यंत्र ज्यों-ज्यों अधिक कार्यश्रम तथा पूर्ण होते जाएंगे त्यों-त्यों यह स्पष्ट होता जाएगा कि “अपूर्णता ही मनुष्य की महानता है।" 

सायबरनेटिक यंत्रों की भांति मनुष्य भी एक गतिशील, आत्मपूर्वक व्यवस्था है लेकिन वह अपने आप में पूर्ण नहीं है। फोटोग्राफी के आसान और पहुँच (मोबाइल) में आ जाने से यह अभिव्यक्त करने का सबसे लोकप्रिय साधन बन गया है। वहीं दूसरी ओर इस सबकी वजह से इसकी सृजनात्मकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा और फोटोग्राफी कमोवेश एक नोटबुक में बदलती जा रही है।

यदि हम विशिष्टता पर आएँ तो बात सृजनात्मक फोटोग्राफी पर आती है और सृजनात्मक का एक आयाम है फोटो पत्रकारिता या फोटो जर्नलिज्म। अधिकांश फोटो पत्रकारों का गहन विश्वास सादगी और ईमानदारी में है जो उनके काम में झलकना भी चाहिए। वहीं इसी के समानांतर यह प्रश्न भी उठता है कि क्या फोटो जर्नलिस्ट की अपनी कोई विशिष्ट शैली हो सकती है? यह प्रश्न इसलिए भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि इस वर्ग के छायाकारों को प्रतिदिन भिन्न-भिन्न प्रकार के विषयों पर लगातार कार्य करना होता है, तो ऐसे में किसी विशिष्ट शैली में महारत की कल्पना कैसे की जा सकती है? और यहीं पर रघु राय हमारे सामने आते हैं। वे अपने खींचे चित्रों पर अपनी छाप छोड़ते जाते हैं। वे अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत एक गधे का चित्र खींचने से करते हैं और उसके बाद पूरी ज़िंदगी सृजनात्मक श्रम के बोझ से दबे रहते हैं। कई बार लगता है भारतीय फोटोग्राफी के पिछले करीब 6 दशक उनकी पीठ पर सवार होकर ही गुजरे हैं।

वॉल्टर बेंजामिन कहते हैं, “हमेशा से कला का एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य रहा है, एक ऐसी मांग पैदा करना जिसकी पूर्ति पूरी तरह होने का समय अभी नहीं आया है।" इस संदर्भ में सन 1971-72 में बांग्लादेश के उदय के दौरान भारत आए शरणार्थियों की रघु राय की फोटो सीरीज पर पुनः नजर डालें। वीरान दर्दभरी आँखों वाली एक वृद्धा तो जैसे दर्द की मूर्ति में परिवर्तित हो गई और उसी के बगल में एक छोटा बच्चा जिसकी आँखों में इतने आँसू हैं जो कि समुद्र में भी बाढ़ ला सकते हैं बैठा है। 

एक अन्य चित्र में वृद्धा ईंट के चूल्हे पर खुले आसमान के नीचे खाना बना रही है और उसकी पृष्ठभूमि में बड़े पाइपों के बीच रह रहे लोग हैं। उसी में एक पाईप में एक बूढ़ा जिसके चेहरे पर सिर्फ विस्फारित आँखें भर हैं जो अनंत भय से फैली हुई हैं। कुछ बच्चे हैं जिनके पेट या तो फूले हुए हैं या पिचके हुए हैं और उनके सिर का आकार सबकुछ समझा देता है। वहीं उन सबके बीच जमीन पर लेटी एक गर्भवती लड़की है, जिसकी सूनी आँखें अपने होने वाले बच्चे का भविष्य कहीं अनंत में खोज रही है। 

रघु राय का कैमरा दुनिया की प्राचीनतम भावना “करुणा” को अपने में समेटे हुए और समझाता है कि भविष्य को सुधार लीजिए। उस घटना के 65 साल बाद गजा (गाजा) में जो हो रहा है, जो वहाँ के बच्चों, बूढ़ों, युवा, महिला, पुरुषों के साथ जो हो रहा है, वह बांग्लादेश के उदय की त्रासदी का सिर्फ दोहराव नहीं बल्कि आगे की स्थिति है। नाजी जर्मन अत्याचारों के बाद कभी भी इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की हत्याएं नहीं हुईं। परंतु रघुराय की भरी आँखों वाला वह बच्चा अभी भी दुनिया को शर्मिंदगी में डुबाए हुए है। 

अपने संस्मरणों में बड़े भाई का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि उनके भाई ने उन्हें एक शेर सुनाया था, गालिब का —
"रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं काइल।
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है।।

रघु राय ने अपनी आँखों से तो लहू टपकाया ही है, उनके कैमरे की आँख ने भी लहू टपका दिया। वे एक फोटोग्राफर से जैसे फोटोग्राफी में तब्दील हो गए थे। बहुत बरस पहले महात्मा गांधी ने अपने सहयोगी छोटेलाल जैन, जिन्होंने कि अहिंसात्मक ढंग से मधुमक्खी पालन का काम वर्धा में शुरू किया था को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, “छोटेलाल तो जैसे मधुमक्खी में बदल गया।" रघु राय भी उसी स्थिति में पहुंच गए और हमें समझा गए कि फोटोग्राफी का आविष्कार क्यों हुआ है।

रघु राय द्वारा खींचे गए व्यक्तियों के चित्रों पर गौर करने से समझ में आता है कि वे जैसे विधाता बन गए हैं। इतनी सजीवता से कोई पेंटिंग तो बना सकता है, लेकिन किसी एक फोटोग्राफ में व्यक्ति को पूर्णता दे देना कमोवेश असंभव ही मालूम पड़ता है। परंतु.........! शुरुआत उलट से करते हैं। उन्होंने एक चित्र खींचा पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक का उनके दफ्तर में। वैसा भावबोधक चित्र शायद ही किसी ने खींचा हो। उस चित्र में यूँ तो जिया उल हक मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन उनकी फटी हुई बड़ी-बड़ी गोल आँखें और हँसते समय उनके दाँत जो दृश्य या भाव पैदा करते हैं वह वास्तव में अंदर तक सिहरन पैदा कर देता है। 

क्रूरता की ऐसी स्याह व डरावनी तस्वीर शायद ही किसी और ने खींची हो। उनकी वह तस्वीर वर्तमान तानाशाहों को भी परिभाषित करती है उस तस्वीर पर बात करते हुए वे जनरल के लिए जो शब्द या उपमा का प्रयोग करते हैं, उसे आप खुद खोजिए और सुनिए। इसके ठीक विपरीत उनके द्वारा खींची गई “मदर टेरेसा” की तस्वीरों पर गौर करने पर पाते हैं कि मदर के चेहरे पर पड़ी प्रत्येक झुर्री करुणा की अथाह गहराई है और हम उसमें अपने लिए आश्रय पा सकते हैं। उनका आँख बंद करे हाथ जोड़ा चित्र या एक नन्हे बच्चे को सीने से लगाए मुस्कुराती दिव्यता, कहीं कुछ भी न तो बनावटी है और न ही अतिरिक्त। वह चित्र जिसमें मदर सीढ़ियों से उतर रही हैं और पृष्ठभूमि में जीसस का सूली पर चढ़ा म्यूरल देखकर लगता है जैसे, वे अभी बस जीसस से मिलकर अपने काम पर निकल रही हैं। 

एक और चित्र है एक जीवित कंकाल के पास मिशनरी ऑफ चैरिटी एक अन्य नन बैठी है और पीछे दीवार पर लिखा है "Body of Christ" (ईसा मसीह का शरीर)। उसमें एक चित्र भी है मृत ईसा का कमजोर शरीर। करुणा का चरम वहां परिलक्षित होता है। मदर टेरेसा उस चित्र में नहीं हैं, लेकिन वे वहाँ मौजूद हैं। उनकी सफेद साड़ी की नीली किनारी जो रघु राय के श्वेत श्याम चित्रों में भी न जाने कैसी नीली ही दिखती है। उनके छायाचित्र और एम.एफ. हुसैन की मदर टेरेसा पर बनाई पेंटिंग श्रृंखला एक प्रदर्शनी में रखी जाएँ तो पहचानना कठिन हो जाएगा कि किसने फोटो के द्वारा मदर को अभिव्यक्त किया है और किसने पेंटिंग के द्वारा। वैसा ही कमाल उन्होंने उनके रंगीन चित्रों में भी किया है।

उनकी संगीतकारों और कलाकारों वाली श्रृंखला में से एक शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब के चित्रों को लें। इसमें एक चित्र है जिसमें वे नमाज़ अदा कर रहे हैं जिसमें उनका सिर थोड़ा सा ऊपर आसमान की ओर है, उनके दोनों हाथ हवा में हैं। जब हम उस फोटो और संगीत को एक साथ गुथने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि कलाकार जब अपने प्रदर्शन में चरम पर पहुंचता है, तो वह ठीक उसी स्थिति में होता है जिस स्थिति में खान साहब इस चित्र में हैं। यानी इबादत और प्रदर्शन एकाकार होते हैं, तभी संगीत का चरम सामने आता है और रघु राय ने संगीत के साथ फोटोग्राफी के चरम को भी हमारे सामने ला दिया। 

एक और चित्र है जिसमें उस्ताद मुस्कराते हुए बीड़ी पी रहे हैं और तखत के नीचे उनके जूते रखे हैं। कुछ भी अतिरिक्त नहीं या अनायास नहीं है। खां साहब कहते भी हैं, “संगीत, स्वर, नमाज़ सब एक ही चीज़ है। हम अलग-अलग रास्तों से अल्लाह तक पहुंचते हैं। एक संगीतकार सीख सकता है, सुंदर गा-बजा भी सकता है। परन्तु जब वह अपने संगीत को धर्म से नहीं मिलाता, जब तक उसमें भगवान से मिलने की तड़प नहीं जगती तब तक उसके पास केवल कला है, लेकिन कोई “असर” नहीं है। वह हमेशा समुद्र के किनारे खड़ा रहेगा और कभी भी शुद्धता (पवित्रता) के चरम पर नहीं पहुंच पाएगा।“ 

रघु राय ने तो फोटोग्राफी को ही अपना धर्म बना लिया था। रघुराय अपनी फोटोग्राफी के बारे में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कहते हैं, “मैं वाइड एंगल को लेकर थोड़ा पक्षपाती हूँ, क्योंकि जब मैं किसी व्यक्ति का चित्र खींचता हूँ तो उस दौरान भी मैं चाहता हूँ कि उस क्षण वातावरण, परिवेश भी साथ हो।" यह विशेषता हमें उनके तमाम चित्रों में स्पष्ट दिखाई भी देती है। वे फोटोग्राफी को अपना दर्शन (Philosophy) मानते थे और कहते भी थे, “मैं जहां भी जाता हूँ मेरा दर्शन कैमरे के माध्यम से साथ होता है और मैं इसी के माध्यम से अपने भगवान से मिलता हूँ।" कौन थे उनके भगवान? जिससे वे रोज मिलते थे? फोटोग्राफी या कोई और?

उनकी साठ बरस से भी लंबी फोटोग्राफी यात्रा में इतने सारे मौके आते हैं कि जब उनका एक चित्र कमोवेश पूरी किताब के विषय में विस्तारित हो जाता है। इतिहास को समकालीनता से जोड़ने और सौंदर्य बोध (Aesthetics) की ऊंचाई को पकड़ पाने में उनकी महारत थी। यह बात उनकी ताजमहल पर की गई श्रृंखला में उभर कर आती है। सामान्यतः हम लोग ताज की नक्काशी और आकल्पन से वशीभूत हो वहीं तक सीमित हो जाते हैं। हम सभी जानते हैं ताजमहल एक मकबरा है और शाहजहां ने मुमताज बेगम को यहाँ दफनाया था। बाद में वे स्वयं भी यहीं पूर्ण विश्राम को आए। साथ ही इसके निर्माण में बहुत धन भी खर्च हुआ था। यह मूलतः राजसी वैभव के प्रदर्शन का चरम है। 

वहीं रघु राय ने इस श्रृंखला के एक चित्र में एक गरीब महिला अपना फटा पुराना सा कपड़ा झाड़ियों पर सुखाने जा रही है और पृष्ठभूमि में ताजमहल है। इसी क्रम में एक और बेहद अनूठा चित्र है जिसमें यमुना पार स्थित एक गाँव का घर है, जो सिर्फ गोबर से लिपा है और एक महिला घर की मुंडेर पर सिगड़ी जला रही है, जिसमें से धुआं निकल रहा है और इस पृष्ठभूमि में कहीं दूर छोटा सा ताजमहल दिखाई पड़ता है। विरोधाभास के होते अजीब सी साम्यता भी नजर आती है, इस चित्र में। धुएं से जुड़ा हुआ ताज का उनका एक और चित्र है, जिसमें भाप के इंजन से बड़ी मात्रा में काला धुआं निकल रहा है और उस धुएं के उस स्याह गुबार के पीछे बगुले सा चमकता ताज नजर आता है। 

एक और बेहद जटिल सा कंपोजीशन है, इसमें जमुना के पार दर्जनों गिद्ध बैठे हैं और उनको पार करता कैमरा ताजमहल को “केप्चर” कर रहा है। ऐसे तमाम चित्र हमें ताज के अतीत को वर्तमान से, एक मकबरे को जीवंतता से और अथाह समृद्धि को शाश्वत गरीबी के नजरिये से देखने को बाध्य कर देते हैं। परंतु इस सब से अलग एक और चित्र है। इसमें बारिश की रात में आकाश में बिजली चमकी है और चमक की उस रेखा में उभरता चमकता ताजमहल है। यह तस्वीर वास्तव में अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है। रघु राय सिर्फ सूर्य की रोशनी से लिखने में ही पारंगत नहीं थे।

ऐसा ही अनोखा चित्रण खजुराहो का भी है। इस पर उनकी पुस्तक का मुख पृष्ठ ही अपने आप में पूरी पुस्तक की कहानी कह देता है। इसमें दो नाईकाओं के शिल्प हैं, जिसमें से एक का सिर भी नहीं है और नीचे एक महिला जो वहां तालाब में नहा रही है, का पीछे से लिया गया चित्र है जिसमें पूरा शरीर साड़ी पर पड़ी सिलवटों से अटा है। सच में यह सौंदर्यबोध का अप्रतिम उदाहरण है। इस श्रृंखला में भी खजुराहो के मंदिर अनेक फ्रेम में पृष्ठभूमि में है और मुख्य भूमिकाओं में जैसे समाज है, लोग हैं, मेले-उत्सव हैं, नहाती और दर्शन करती स्त्रियाँ हैं। वहीं बहुत सुंदर तरीके से एक सारस के माध्यम से खजुराहो के मंदिर और स्थानीय समाज का चित्रण वास्तव में हतप्रभ कर देता है। सारस जैसे उस समाज का अविभाज्य बन जाता है। उन्होंने बेहद कलात्मकता के साथ खजुराहो की कामुक (Erotic) मूर्तियों का चित्रण किया है, वहीं दूसरी ओर पूरी तरह से घूंघट में छिपी पारंपरिक बुंदेली महिला भी उन्होंने कैमरे से कैद की है। 

यहीं पर अतीत का खुलापन और वर्तमान के बंधन भी स्पष्ट तौर पर उजागर हो जाते हैं। यह सही है कि प्रत्येक खंडहर या प्राचीन स्मारकों का अतीत के साथ एक वर्तमान भी होता है। रघु राय इतिहास को वर्तमान में लाते हैं और उसके वर्तमान में भविष्य की गूंज दिखाते हैं, अपने छायाचित्रों के माध्यम से। 
सिलसिला लम्बा ही नहीं, अंतहीन है। उनकी पैनी नजर को पत्रकारिता के नजरिये से भी देखने पर बहुत सारे तथ्य और समाधान सामने आते हैं। उन्होंने भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी एक फोटो श्रृंखला की है। तमाम चित्र उनकी गरिमा और व्यक्तित्व को उभारते है। 

इनमें ही रघु राय का एक चित्र है प्रधानमंत्री कार्यालय का। दृश्य है कुर्सी पर बैठी हैं और टेबल के दूसरी ओर सारी मंत्रीपरिषद जिसमें पुरुष ही दिखाई दे रहे हैं, आज्ञाकारी की भूमिका में खड़े हैं। यह इंदिरा गाँधी की ताकत का द्योतक है। वहीं एक और चित्र ध्यान में आता है, जो सन 1977 में उनके चुनाव हारने के बाद का है। इसमें कचड़ा बीनने वाली एक महिला चुनावी पोस्टर जिसमें इंदिरा गांधी का बड़ा सा चित्र है को फाड़ते हुए अपने कचड़े के बोरे में डाल रही है। अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। पर उनका कैमरा यहाँ नहीं रुकता। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद इंदिरा गांधी धरने पर बैठी हैं, तब का चित्र एक अलग छवि बनाता है और वह पुनः प्रधानमंत्री बनती हैं। यह सिर्फ इंदिरा गांधी का व्यक्तिगत सफर नहीं है। यह लोकतंत्र का भी सफर है, जिसे हम रघु राय के चित्रों में समझ सकते हैं। 

रघु राय के तमाम चित्र हमें समाज से जोड़ते हैं और नए सिरे से सोचने को मजबूर कर देते हैं। परन्तु इस सबसे अलग कई छायाचित्र ऐसे हैं जो हमें स्तब्ध सा कर देते हैं। ऐसा ही उनका एक चित्र है रंभाती हुई गाय का। जैसे वह गाय कमोवेश करुणा की अभिव्यक्ति हो गई है। बुद्ध भी “गौतम” इसीलिये कहलाए क्योंकि उनमें गाय जैसी करुणा थी। ऐसा ही गाय का एक और चित्र है, जैसे तालाब का किनारा है और वहाँ दुर्गा की दो मूर्तियाँ विसर्जन को रखी हैं। उनके इस चित्र में एक बड़ा सा पेड़ है जिसके पीछे से गाय का सिर्फ मुंह दिख रहा है और पेड़ के इस तरफ सफेद साड़ी में एक बूढ़ी महिला है। पृष्ठभूमि में तालाब और एक नाव भर है। 

यह चित्र देखकर उनके वायड एंगल से प्रेम का चरितार्थ होना साफ नजर आता है। अंत में एक ऐसे चित्र का जिक्र अनिवार्य है जो हमारी सभ्यता को नये सिरे से व्याख्यायित करता है। भोपाल गैस कांड के असंख्य फोटो प्रकाशित हुए हैं। परन्तु एक फोटो है दफन होते हुए बच्चे का जिसकी पथराई आँखें खुली हैं, जो उनसे इस दुनिया को शायद देख रहा है। जानकारों का कहना है कि दो अन्य फोटोग्राफर्स ने भी ठीक इसी कोण से फोटो लिया था, परंतु रघु राय का चित्र इसलिए बेहद अनूठा और मार्मिक बन पड़ा क्योंकि उसमें उस बच्चे के चेहरे को शायद सहलाता हुआ एक हाथ है। यह हाथ वेदना को कहीं दूर तक ले जाता है। 

बात को रोकते हैं। कहते हैं न कि मानस के प्रत्येक चौपाई पर पीएचडी की जा सकती है, वैसे ही रघु राय की अनंतकाल तक बात हो सकती है। बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि, “मोटर कार पहले-पहल बनी तो उसका स्वरूप घोड़े वाली बग्घी जैसा रखा गया। मगर इंजिन रूपी नई अंर्तवस्तु पुराने रूप से ज्यादा शक्तिशाली निकली। बढ़ती रफ्तार की मांगों से नए स्वरूप विकसित हुए और प्रौद्योगिकी एक नई तरह की सुन्दरता को जन्म देने वाली बनी।" रघु राय ने तो प्रौद्योगिकी को ही नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया। किसी ने ठीक ही कहा है, “मैं नहीं चाहता कि जीवन कला का अनुकरण करे। मैं चाहता हूं कि जीवन ही कला बन जाए।“ रघु राय तो स्वयं फोटोग्राफी के पर्याय हो गये। उन्हें सलाम।