मैं बालक हूँ आप बढ़े हैं,
बल में कितने बढे चढ़े हैं
लेकिन कुछ परवाह नहीं है,
डर सकता क्या वीर कहीं है।

सन 1932 हिन्दुस्तानी बुक डिपो से यह कविता प्रकाशित हुई थी। इसे राघव प्रसाद सिंह ने लिखा था। इसमें बालक गणेश अपने सर्वशक्तिमान पिता शंकर को संबोधित हैं। यह कविता कक्षा तीन और चार की पाठ्य पुस्तक में शामिल थी और इस पुस्तक का संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया था। इसके बाद 22 अक्टूबर 1937 को महात्मा गाँधी ने सेवाग्राम, वर्धा में नई तालीम की नींव रखी और विद्यालयीन शिक्षा का एक नया खाका देश के सामने प्रस्तुत किया। वे कहते थे कि "मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार शिक्षा को आजीविका का साधन समझना नीच-वृत्ति कही जाएगी। आजीविका का साधन शरीर है और पाठशाला चरित्र निर्माण की जगह है।" इसी दिन सम्मेलन में प्रस्ताव भी पारित किया था "देश के सब बच्चों के लिए सात वर्ष की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध होना चाहिए।"

करीब नौ दशक बाद और आजादी के आठ दशक बाद हम शिक्षा को लेकर अभी तय नहीं कर पा रहे हैं कि शिक्षा का स्वरूप क्या हो। स्वरूप तो दूर की बात है अभी इसे लेकर ही प्रतिबद्धता नहीं बन पाई कि बच्चों को शिक्षा देनी भी है या नहीं? वैसे यह कोई नया प्रश्न नहीं है। देश भर में करीब एक लाख विद्यालयों का बंद होना। इनमें दुगने से ज्यादा में एक ही शिक्षक की नियुक्ति। जो बचे हैं उनमें बिजली और शौचालय तक नहीं हैं। और यह सब अनायास नहीं हो गया या हो रहा है। 

संविधान का अनुच्छेद 21 क, शिक्षा के अधिकार को जीवन के अधिकार की श्रेणी प्रदान करता है। वहीं वर्तमान समय में शिक्षा की स्थिति बता रही है कि हम अपने बच्चों के उनके जीवन के अधिकार का हनन कर रहे हैं। परंतु अधिकांश राजनीतिज्ञ तो स्वयं ही संविधान का पर्याय होते जा रहे हैं, तो ऐसे में क्या कुछ हो पाना संभव है?

शुरूआती कविता में बाल गणेश को भगवान शंकर को कमोवेश चुनौती देने की मुद्रा में देखा है। आज वही परिस्थिति आ गई है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड जिसमें देश की करीब दो-तिहाई आबादी निवास करती है, के विद्यालयीन छात्र अपनी शिक्षा को लेकर बेहद उद्देलित होकर सड़कों पर उतर आए हैं। विशेष बात यह है कि अधिकांशतः छात्राएँ ही प्रशासन और सरकार के सामने उठ खड़ी हुई हैं। ऐसा कैसे हो पाया से ज्यादा जरूरी प्रश्न है कि यह क्यों हो रहा है? दूसरी ओर छात्रों के माता-पिता आदि या तो आजीविका की विभीषिका झेल रहे हैं या उनमें बच्चों के भविष्य को लेकर निर्लिप्तता सी आ गई है। कुछ यह मानते होंगे कि मध्यान्ह भोजन ही शिक्षा व्यवस्था की सर्वोत्तम उपलब्धि है। 

सन 1948 में छपी विशाल त्रिपाठी की "अंधेर" शीर्षक कविता की पंक्तियाँ हैं,
"जमींदार के लड़के होते, डिप्टी और कलक्टर होते।
सेठ और लाला के लड़के, हल्के में इंस्पेक्टर होते।
पर गरीब के घर के बेटे, चौकीदार और चपरासी।
बहुत बढ़े- हरकारे हों, या प्लेटफार्म के बने खलासी।।
बच्चों के प्रति व्यवस्था की बेरुखी और लापरवाही कोई नई बात नहीं है लेकिन पिछला करीब डेढ़ दशक सार्वजनिक विद्यालयीन शिक्षा के लिए कहर बनकर बरपा है। और नवीन शिक्षा नीति ने तो गरीब माता-पिता के बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। गौर करिए सरकारी रिपोर्ट बता रही हैं कि 73 प्रतिशत छात्र ग्यारहवीं से पहले शिक्षा से स्वयं को अलग कर लेते हैं, या छूट जाते हैं या कर दिये जाते हैं। कोई भी कारण चुन लीजिए, वे शिक्षा जगत से तो बेदखल हो ही रहे हैं।

इधर विद्यालयीन छात्र जनरेशन-अल्फा हो गए हैं। यह संबोधन उन्हें उनके विद्यार्थी होने के गौरव से दूर करता है। मीडिया फिर वह जैसा भी हो, इस असंतोष को विद्यार्थी असंतोष या जागरण को कहने से बच रहा है, कतरा रहा है। प्रो.कृष्ण कुमार लिखते हैं, "हर प्राइवेट स्कूल का एक नाम होता है, इसके इर्द-गिर्द उसके प्राचार्य की छवि, कुछ प्रतीक, कुछ परम्पराएं रचने की खासी कोशिश की जाती है। सरकारी स्कूल का कोई अलग नाम नहीं होता, ये सभी "शासकीय उच्चतर माध्यमिक" स्कूल कहलाते हैं। प्राचार्य और शिक्षक तबादले पर आते-जाते रहते हैं। स्कूल की कोई परम्परा, कोई पहचान नहीं होती। सरकारी स्कूल को बस उस इलाके या स्थान के नाम से जाना जाता है, जहाँ वह स्थित है।" आजकल सरकार कुछ नए नामकरण करके "उच्च श्रेणी" का एक विद्यालय किसी क्षेत्र में बनाती है और समीय के 10-12 किलोमीटर के प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों को उस नए विद्यालय में जबरिया घुसैड देती है। इस वजह से बच्चों की विद्यालयीन दिनचर्या 12 घंटे तक की हो गई है और दूरी की वजह से विद्यार्थी खासकर लड़कियाँ शिक्षा की परिधि से ही बाहर होती जा रही हैं।"

प्रो. कृष्ण कुमार अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बताते हैं, "इस अंतर का बच्चे की आत्मछवि पर प्रभाव ऐसे मौकों पर स्पष्ट देखा जा सकता है, जब कोई बड़ा उनसे पूछे, 'तुम कौन से स्कूल में पढ़ते हो?' इस तरह का प्रश्न पूछा ही ऐसे समाज में जा सकता है, जहाँ उसकी शिक्षा व्यवस्था खंडित हो। जापान में यह प्रश्न बच्चे से पूछा ही नहीं जाता, क्योंकि वहाँ हर बच्चा अपने घर के पास के सार्वजनिक स्कूल में पढ़ने जाता है। प्रश्न में यह पूर्व धारणा छिपी रहती है कि बच्चा किसी प्रायवेट स्कूल में पढ़ता होगा/होगी। वहीं हमारे यहाँ तो राष्ट्रीय अखबारों के मुखपृष्ठ में कभी-कभार यह खबर छपती है कि, "अमुक राज्य के अमुक जिले के कलेक्टर ने अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में पढ़ने भेजा!"

विशाल त्रिपाठी की कविता की अगली पंक्तियाँ हैं,
पढ़ने में सबसे अच्छा था, मंगू भिखमंगे का लड़का।
मैला-मैला लंबा-लंबा, जग जाता था होते तड़का।
भीख न माँगी, घर से भागा, अरे! न जाने क्या-क्या होता,
यह देखो अँधेर कि मंगू, पड़ा रह गया बोझा ढोता।
आज़ादी के अस्सी साल बाद भी, मंगू के पोते के जीवन में ज्यादा कुछ परिवर्तन नहीं आया होगा। यह इसलिये क्योंकि शिक्षा भारत के नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में सबसे निचली पायदान पर है। पहली प्राथमिकता सैकड़ों हजारों करोड़ रुपयों के देवलोकों का धरती पर निर्माण है। भले ही लड़कियाँ शौचालय न होने के कारण विद्यालय न जा पा रही हों, परंतु देव लोक के शौचालय तो "वर्ल्ड क्लास" के होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में हुए तमाम अध्ययन, वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण तथा 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में सामाजिक क्षेत्र में नकद भुगतान हस्तांतरण वाली योजनाओं को लेकर चिंता जताई गई है। 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सामाजिक क्षेत्र में होने वाला खर्च सन 2011-12 से कमोवेश स्थिर है। वहीं 2020-21 के बाद तो स्थिति और भी गंभीर हो गई है एवं इन मदों पर जीडीपी के आधार पर होने वाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है। इस ओर भी ध्यान देना जरूरी है कि राज्यों के कुल खर्च का करीब 44 प्रतिशत तो ब्याज चुकाने, पेंशन और वेतन में ही चला जाता है। इसके बाद सामाजिक कार्यों के लिए बचता ही कितना है? वहीं राज्य सरकारें बजाए अधोसंरचना और व्यवस्थागत व्यय के नकद भुगतान हस्तांतरण में ज्यादा विश्वास रख रहीं हैं। इसका तात्कालिक लाभ चुनावों में मिल जाता है। यदि मध्यप्रदेश की बात करें तो शिक्षा पर होने वाले कुल व्यय का करीब 42 प्रतिशत नकद हस्तांतरण में ही चला जाता है। अतएव धन की कमी के चलते विद्यालयों के भवन, शिक्षकों, पुस्तकालय आदि पर खर्च न के बराबर ही होता है। परंतु वर्तमान परिस्थितियों से बचने का यह रास्ता नहीं हो सकता।

विद्यालयीन विद्यार्थियों में उपजा असंतोष यह तथ्य सामने ला रहा है कि परिस्थितियाँ चरम असफलता की सीमा का भी अतिक्रमण कर चुकी हैं। सार्वजनिक या सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या में छात्र प्रवेश लेते हैं। चूंकि उनमें से अधिकांश आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्ग से होते हैं, अतएव, वे नीति-निर्माताओं के लिये "उपयोगी उत्पाद" की श्रेणी में नहीं आते। राज्य सरकारें बेहद चालाकी और हृदयहीनता से विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या घटा रही हैं और नए शिक्षक अधिकांशतः संविदा पर ही रखे जा रहे हैं। इसके अलावा जितनी भी बेगार है वह भी शिक्षकों से ही कराई जा रही है। 

वहीं दूसरी ओर देखते ही देखते शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को ध्वस्त कर दिया गया। सरकारी विद्यालयों में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को कमतरी का भान करा दिया गया। परंतु परिस्थितियों में एक मोड़ आया और विद्यालयीन छात्रों को यह समझ में आया कि उनके साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार से उन्हें स्वयं ही दो-दो हाथ करना पड़ेंगे। समस्या सिर्फ विद्यालय के भीतर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे पूरे परिवेश में मौजूद है। छात्रों के लिए विद्यालय तक पहुँचना भी एक बड़ा उपक्रम बन गया है। छात्राओं के लिए तो असुरक्षा अब लगातार बढ़ती जा रही है।

अनुपम मिश्र ने व्याख्यान शिक्षा: कितना सृजन, कितना विसर्जन में बड़ी मार्के की बात कही है। वे विनोबा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि विनोबा कलकत्ता के शोभाबाजार में उस पाठशााला में गए जहाँ रवींद्रनाथ टैगोर ने अध्ययन किया था। वहाँ की नाम पट्टिका में उनका नाम दर्ज है। इसके बाद वे विद्यालय से अलग एक बिल्कुल उलट संस्था "कारावास" का जिक्र करते हुए कहते हैं, स्कूल संस्था है गुणों के सृजन की तो दूसरी संस्था है दुर्गुणों के विसर्जन की। वे कहते हैं, "जिस किसी कारावास में बड़े-बड़े लोग बंदी बनाकर रखे जाते हैं, बोर्ड पर उनका नाम भी जोड़ दिया जाता है। जैसे यरवदा जेल में महात्मा गांधी और नैनी जेल में पं. जवाहरलाल नेहरू। जाहिर है स्कूल और कारागर तो एक-दूसरे से नितांत भिन्न, एकदम अलग-अलग संस्थाएं होनी चाहिए। एकदम अलग-अलग स्वभाव की व्यवस्थाएं होनी चाहिए। कारागर की समस्याएँ भी पूरी दुनिया में एक सी है और स्कूल की समस्याएँ भी एक सी। कारागर में सुधार होना चाहिए- इसे कहते सब हैं, मानते सब हैं। थोड़ा बहुत योगासन वगैरह हो जाता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। कारागार सुधर नहीं पाते और हमारे स्कूल की अब वैसे बनने लगे हैं। 

गौरतलब है रवींद्र बाबू ने "सदोष और तंग तालीम" के कारण स्कूल को कारावास कहा था। विनोबा ने पूछा था आखिर स्कूल में सुधार कब होगा? गौरतलब रवींद्र बाबू को गए 85, महात्मा गांधी को 78 और विनोबा को गए 44 बरस हो गए। परंतु विद्यालय नहीं सुधरे। भारत में संभवतः पहली बार इतने व्यापक स्तर पर विद्यालयीन विद्यार्थी सड़क पर उतरे हैं और उन्होंने अपनी शिक्षा और स्वयं के बारे में बात की है। यह हमारे लिये शुभ संकेत है। छात्रों को समझ में आया कि उन्हें यह संघर्ष स्वयं लड़ना होगा क्योंकि वे न तो मतदाता हैं और न ही आर्थिक रूप से लाभदायक। राज्य भी उन्हें गैरजरूरी मानता है, क्योंकि उसे उन पर खर्च करना पड़ता है। यह खर्च उन्हें अनुत्पादक लगता है। मीडिया की भाषा में शिक्षा विभाग "मलाईदार" विभाग भी नहीं है। उच्च शिक्षा तो फिर भी---!

विद्यालयीन छात्रों ने सत्ता के मुखौटे या आवरण को बेनकाब कर दिया है। विश्वविद्यालयीन छात्रों और युवाओं के असंतोष को लेकर उन पर बहुत से आरोप लगाए जा रहे हैं। परंतु विद्यालयीन विद्यार्थी तो अभी बच्चों की श्रेणी में आते हैं और यदि उनमें यह भाव पैठ कर गया है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है तो इसे हमारी शासन प्रणाली को गंभीर चेतावनी और देश को अपने पर आसन्न संकट की तरह लेना चाहिए। शासन को अपनी गलती और असफलता को स्वीकारते हुए सार्वजनिक विद्यालयीन शिक्षा में सुधार तत्काल प्रभाव से किये जाने चाहिए। भारत के वंचित बच्चों की आर्तनाद हमारे विवेक को जगा पाएगा, यह उम्मीद होनी चाहिए। 

इब्ने इंशा की कविता, "ये किसका बच्चा है" की अंतिम पंक्तियाँ हैं, "इस जग में सब कुछ रब का है/ जो सबका है वह सबका है/ सब अपने हैं, कोई गैर नहीं/ हर चीज में सबका साझा है/ जो कपड़ा है, जो कम्बल है/ जो चाँदी है, जो सोना है/ वो सारा है इस बच्चे का/ जो तेरा है जो मेरा है/ ये बच्चा किस का बच्चा है/ ये बच्चा सब का बच्चा है।"

हम सब भारत के हर बच्चे के बारे में सोचें क्योंकि सबकुछ उसका ही तो है। यानी भविष्य उसका है।

(लेखक चिन्मय मिश्र मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)