इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों की घटना के बाद इंदौर में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर चिंता अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि सरकारी अस्पतालों से सामने आई एक नई रिपोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के 9 प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों के पेयजल की जांच में 6 अस्पतालों के पानी में ई कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं। मरीजों और उनके परिजनों के लिए लगाए गए आरओ प्लांट, वाटर कूलर और अन्य पेयजल स्रोतों से लिए गए नमूनों की जांच NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में कराई गई थी।

इन बैक्टीरिया की मौजूदगी पानी में संभावित मलजनित प्रदूषण का संकेत मानी जाती है। अस्पतालों में स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि यहां पहले से बीमार मरीजों के साथ नवजात और गंभीर हालत में भर्ती मरीज भी इलाज कराते हैं। ऐसे में दूषित पानी संक्रमण का अतिरिक्त खतरा पैदा कर सकता है।

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मामले में एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नोडल अधिकारी डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव ने बताया कि अस्पताल संक्रमण नियंत्रण समिति यानी Hospital Infection Control Committee (HICC) की ओर से समय-समय पर अस्पतालों के पानी के नमूने जांच के लिए भेजे जाते हैं। उनका कहना है कि जांच में किसी तरह की कमी सामने आने पर संबंधित अस्पताल प्रबंधन को आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं। यानी यह जांच किसी अचानक सामने आई शिकायत के बाद ही नहीं बल्कि अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था के तहत की जाने वाली नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, इस बार सामने आए नतीजों ने सरकारी अस्पतालों की पेयजल व्यवस्था की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच के लिए इंदौर के 9 सरकारी चिकित्सा संस्थानों से पेयजल के नमूने लिए गए थे। इनमें मरीजों और उनके परिजनों के इस्तेमाल वाले पानी के स्रोतों को शामिल किया गया। प्रयोगशाला जांच के बाद 6 संस्थानों के नमूनों में ई कोलाई और कॉलीफॉर्म की मौजूदगी मिली। जिन अस्पतालों के पानी के नमूने जांच में खराब पाए गए उनमें एमवाय अस्पताल, पीसी सेठी अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, मानसिक चिकित्सालय और जिला अस्पताल शामिल हैं। वहीं, एमटीएच, बाणगंगा और एमआरटीबी अस्पताल के नमूने मानव उपयोग के लिहाज से ठीक पाए गए।

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जांच के दौरान केवल पानी के नमूनों में बैक्टीरिया मिलना ही चिंता का कारण नहीं रहा। अस्पतालों की पेयजल व्यवस्था में रखरखाव से जुड़ी कमियां भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर आरओ प्लांट बंद मिले। जबकि, कुछ वाटर कूलरों के आसपास साफ-सफाई की स्थिति ठीक नहीं थी। जिससे पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे फिल्टर, टंकियों, कूलर और स्टोरेज व्यवस्था की नियमित सफाई और निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्ट में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की पेयजल व्यवस्था का भी उल्लेख है। यहां सातवीं मंजिल के आरओ प्लांट और कैंटीन से जुड़े पानी के नमूनों में ई कोलाई और टोटल कॉलीफॉर्म पाए गए हैं। वहीं, कुछ अन्य संस्थानों में भी पेयजल स्रोतों से लिए गए नमूने जांच में दूषित मिले हैं। फिल्टर या आरओ प्लांट लगे होने के बावजूद पानी में बैक्टीरिया मिलना इस बात की जांच की जरूरत बताता है कि समस्या पानी के मूल स्रोत में, पाइपलाइन में, टंकी में या फिर फिल्ट्रेशन और स्टोरेज की प्रक्रिया में है।

जिला अस्पताल की पानी वितरण व्यवस्था को लेकर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। यहां मरीजों को पानी उपलब्ध कराने के लिए एक सामाजिक संस्था की ओर से दिए गए लोटों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है। अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर पानी के वितरण और बर्तनों की साफ सफाई को संक्रमण नियंत्रण के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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ई कोलाई की मौजूदगी सामान्य तौर पर पानी में मलजनित प्रदूषण की संभावना का संकेत देती है। दूषित पानी के सेवन से पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। अस्पतालों में इसका जोखिम इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि कई मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर होती है। भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में दूषित पानी के कारण 36 लोगों की मौत के बाद यह मामला इंदौर के लिए और संवेदनशील हो जाता है। उस घटना के बाद शहर में पानी की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर पहले ही गंभीर सवाल उठ चुके हैं।

डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव के मुताबिक, HICC की जांच में कमी मिलने पर संबंधित अस्पताल प्रबंधन को आवश्यक सुधार करने के निर्देश दिए जाते हैं। अब सवाल यह है कि जिन 6 सरकारी अस्पतालों के पानी में ई कोलाई और कॉलीफॉर्म पाए गए हैं वहां दूषण के स्रोत की पहचान कर उसे कितनी जल्दी दूर किया जाता है। साथ ही आरओ प्लांट, पानी की टंकियों, पाइपलाइन और वाटर कूलरों की सफाई तथा दोबारा सैंपलिंग के जरिए यह सुनिश्चित करना अहम होगा कि मरीजों और उनके परिजनों को सुरक्षित पेयजल मिल रहा है।

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