मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों डर के कारण की गई 'घेराबंदी' की चर्चा है। प्रशासन ने कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान का डर खत्म करने के लिए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की यह घेराबंदी की थी। रायसेन में आयोजित कृषि मेले में जा रहे जीतू पटवारी को भारी पुलिस बल का इस्तेमाल कर रोका जाना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि यह पॉलिटिकल वॉर का हिस्सा है। अपने संसदीय क्षेत्र रायसेन में आयोजित मेला कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए प्रतिष्ठा आयोजन था। जीतू पटवारी ने घोषणा की थी कि वे अंतिम दिन मेले में शामिल होंगे। 

जीतू पटवारी ने कहा कि सोमवार सुबह उनके पास एक सीनियर पुलिस अधिकारी का फोन आया और बताया कि सरकार नहीं चाहती कि वह मेले में पहुंचें। जीतू पटवारी ने बार−बार कहा कि उनका उद्देश्य किसी तरह का विरोध करना नहीं था। वे खुद किसान हैं और मेले में हो रहे नवाचार व नई तकनीकों को देखने जा रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार “नकारात्मक राजनीति” कर रही है, जबकि ‘किसान कल्याण वर्ष’ में सभी की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। 

उनकी किसी बात पर प्रशासन को भरोसा नहीं हुआ। उन्हें भोपाल से लौटा दिया गया। अकेले नेता के कृषि मेले में जाने से तंत्र इतना डरा क्यों? इसका कारण जीतू पटवारी की 'आक्रामक राजनीति' है। जीतू पटवारी ने अपनी कार्यशैली को आक्रामक और इवेंट-बेस्ड बना लिया है। कभी वे खाद की बोरी कंधे पर लादकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बंगले पर पहुंच जाते हैं, तो कभी बारदाना संकट को लेकर 'उपवास' की घोषणा कर देते हैं।

उनके कदमाें का अंदाजा लगाना मुश्किल हाेता है। 'अनप्रिडिक्टेबल' बन गए जीतू पटवारी सिर्फ मंच से भाषण देकर चले नहीं जाते बल्कि वे हंगामा खड़ा कर प्रदर्शन को इवेंट बना देते हैं। उन्हें रायसेन जाने से रोकना इसी 'सबक' का नतीजा था। सोशल मीडिया व बयानों से जिस तरह जीतू पटवारी सरकार को कृषि नीतियों पर घेर रहे थे, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को यह आशंका होगी कि पटवारी अकेले भी मेले के भीतर पहुंच गए, तो किसानों के बीच कोई नया हंगामा शुरू कर देंगे जिससे सरकार की किरकिरी हो सकती है। इसलिए सरकार ने कोई रिस्क नहीं लिया। 

यह शैली बतौर विपक्ष कांग्रेस के मोर्चा खोलने के नए तरीके का एक अंग है। विधानसभा में भी इसी तरह इवेंट बनाकर सरकार को नीतिगत रूप से घेरा जाता है। सोशल मीडिया रील्स के इस दौर में एक विजुअल सौ भाषणों पर भारी पड़ता है। यही 'अटैकिंग विजुअल पॉलिटिक्स' अब बीजेपी के लिए सिरदर्द बन रही है। सरकार ने 'बैरिकेड' के जरिए जीतू पटवारी को रायसेन जाने से रोक लिया मगर जीतू पटवारी के नेतृत्व में कांग्रेस इस तरह की पाबंदियों को लांघने के नए रास्ते तलाशेगी। 

क्या फेल हो गया बीजेपी का राज्यसभा फार्मूला?

मध्य प्रदेश की राजनीति में जब भी राज्यसभा की खाली सीटों का जिक्र होता है, तो विधायकों में तोड़फोड़ सबसे पहले सुर्खियों में आती है। मई 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर भी यही माहौल था। चर्चाएं आम थीं कि बीजेपी अपनी भारी बहुमत और 'क्रास वोटिंग' रणनीतियों के दम पर कांग्रेस के खाते वाली तीसरी सीट भी अपनी झोली में डालने की तैयारी में है। अब मिल रहे संकेत बताते हैं कि बीजेपी के इस फार्मूले की हवा निकल गई है। बीजेपी तीसरी सीट के लिए फिलहाल हाथा−पैर नहीं मार रही है। 

इस संबंध में पूर्व मंत्री पीसी शर्मा का यह बयान चर्चा में रहा कि असल में बीजेपी फेल हो गई। वह कांग्रेस में तोड़फोड़ नहीं कर पा रही है इसलिए चुप बैठ गई है। पीसी शर्मा के मुताबिक, बीजेपी ने पूरी कोशिश की थी कि वे कुछ कांग्रेसी विधायकों को अपने पाले में कर लें, लेकिन जब बात नहीं बनी, तो चुप्पी साध ली। यह चुप्पी दरअसल एक रणनीतिक हार की तरह देखी जा रही है। खासकर तब जब दतिया सीट को तुरंत ही खाली घोषित की गई व बीना विधायक निर्मला सप्रे की योग्यता पर डेढ़ साल में कोई फैसला नहीं किया गया है। बीजेपी में शामिल हो चुकी विधायक निर्मला सप्रे स्वयं को कांग्रेस में ही बता रही है। 

संभव है कि मई में होने वाले राज्यसभा के चुनाव तीन नहीं बल्कि चार सीटों पर हों क्योंकि मध्य प्रदेश से राज्य सभा सदस्य केंद्रीय मंत्री डॉ. एल. मुरुगन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। यदि वे जीत  जाएंगे प्रदेश की चौथी सीट खाली होगी। फिलहाल, मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीटों का यह खेल अब एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों पर संतोष करती दिख रही है और कांग्रेस अपनी इकलौती सीट को बचा ले जाने के आत्मविश्वास से लबरेज है। तीसरी सीट पर मुकाबले से ज्यादा अब बीजेपी में दो सीटों पर दावेदारी कर रहे नेताओं में से उपयुक्त का चयन करना बड़ी चुनौती है। 

राजेंद्र भारती के इस दर्द का इलाज क्या?

दतिया की विधानसभा सीट खाली होना केवल एक कानूनी फैसला नहीं है बल्कि राजनीतिक घमासान बन गया है। दतिया से जीत कर भी कोर्ट में हार गए कांग्रेस नेता राजेंद्र भारती ने अपनी सजा को एक गहरा राजनीतिक षड्यंत्र करार देते हुए पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा और बीजेपी सरकार पर तीखे हमले किए। भारती ने कहा कि उन्हें झुकने और बिकने के लिए 70 करोड़ रुपए तक का प्रलोभन दिया गया था, जिसे ठुकराने पर उन्हें निपटाने की धमकी दी गई थी। मई 2024 में दिल्ली में एक केंद्रीय मंत्री के ओएसडी ने मुझसे मुलाकात की। उन्होंने मुझे पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का संदेश देते हुए कहा कि आप सारे केस वापस ले लीजिए, बीजेपी में आ जाइए और आपको किसी निगम-मंडल का अध्यक्ष बना दिया जाएगा।

दल न बदल कर आज वे हारे हुए हैं। मामला उच्च न्यायालय में पहुंच गया है। वहां तो सुनवाई होगी ही लेकिन राजेंद्र भारती अपनी कुर्सी गंवा चुके हैं। वे कानूनी लड़ाई तो लड़ ही रहे हैं, लेकिन उनकी असली पीड़ा 'विश्वासघात' की है। विश्वासघात जो व्यवस्था के स्तर पर उनके साथ हेने का वे दावा कर रहे हैं। विश्वासघात जो उन्होंने प्रलोभन में आ कर नहीं किया। दल न बदलने की कीमत उन्हें विधायकी खोकर चुकानी पड़ी। उनकी पीड़ा का इलाज तो जनता के पास ही है। यदि उपचुनाव होता है तो जनता के पास राजेंद्र भारती की पीड़ा पर अपना निर्णय देने का अवसर होगा। इस पीड़ा का मरहम कानूनी राहत से ज्यादा दतिय का 'जनादेश' होगा। 

अमित शाह के साथ इस मुलाकात के क्या अर्थ, राहत या इंकार 

मध्य प्रदेश के सबसे अमीर विधायक संजय पाठक बीते कुछ दिनों से संकटों से घिरे हुए हैं। जबलपुर (सिहोरा) में उनसे जुड़ी कंपनियों द्वारा स्वीकृत सीमा से अधिक अवैध उत्खनन की शिकायत हुई। मामले की जांच के बाद खनिज विभाग ने लगभग 443 करोड़ की पेनल्टी लगाई है। इसके अलावा हाई कोर्ट के जज को फोन करने के आरोपों के बाद, न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज किया है। उन्हें 21 अप्रैल 2026 को व्यक्तिगत उपस्थिति होने के निर्देश दिए गए हैं। 

इन परिस्थितियों में बीजेपी विधायक संजय पाठक ने राहत पाने के लिए हर स्तर पर प्रयत्न किए हैं। उनकी मुराद बीते सप्ताह पूरी हुई जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात का समय मिल गया। मुलाकात हुई भी व सोशल मीडिया पर तस्वीर वायरल भी हुई। इस तस्वीर में हावभाव देख कर कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी विधायक संजय पाठक को राहत का आश्वासन मिला या संकट बरकरार है।