अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक नई रिसर्च ने हिमालयी पर्यावरण को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। 25 सालों के सैटेलाइट आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया है कि भारत के मैदानी क्षेत्रों से उठने वाला प्रदूषण अब सीधे हिमालय के ग्लेशियरों को नुकसान पहुंचा रहा है। अध्ययन के अनुसार, जहरीले धुएं और सूक्ष्म प्रदूषण कणों के कारण हिमालय की बर्फ तेजी से काली पड़ रही है। जिसकी वजह से ग्लेशियर सामान्य से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।
रिसर्च में साल 2000 से 2024 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों, हिमालयी इलाकों और उत्तर पूर्व भारत में पार्टिकुलेट मैटर (PM) प्रदूषण में 20 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, वाहनों से निकलने वाला धुआं और बायोमास जलाने जैसी गतिविधियां इस बढ़ते प्रदूषण की बड़ी वजह हैं। इन स्रोतों से वातावरण में ऑर्गेनिक कार्बन और सल्फेट कणों की मात्रा करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
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शोधकर्ताओं ने बताया कि ये सूक्ष्म कण हवा के साथ हिमालय तक पहुंच रहे हैं और बर्फ की सतह पर जम रहे हैं। इससे बर्फ का प्राकृतिक सफेद रंग प्रभावित हो रहा है और ग्लेशियरों पर काले धब्बे दिखाई देने लगे हैं। यही बदलाव ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का बड़ा कारण बन रहा है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट में प्रकाशित किया गया है।
रिपोर्ट में एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) के आधार पर प्रदूषण का स्तर मापा गया। यह हवा में मौजूद धुएं और सूक्ष्म कणों की मात्रा को दर्शाता है। बोस इंस्टीट्यूट कोलकाता से जुड़े स्रोतों के मुताबिक, इस सूचकांक में बिहार और पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रभावित राज्य पाए गए। बिहार का स्कोर 0.71 और पश्चिम बंगाल का 0.70 दर्ज किया गया जो देश में सबसे ज्यादा है। वहीं, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा का संयुक्त स्कोर 0.51 रहा। उत्तर पूर्व भारत का स्कोर 0.40 रिकॉर्ड किया गया। रिपोर्ट में बिहार और पश्चिम बंगाल को देश के सबसे बड़े प्रदूषण हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया गया है।
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वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को एल्बेडो इफेक्ट से जोड़कर समझाया है। सामान्य तौर पर साफ और सफेद बर्फ सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। जिसकी वजह से पहाड़ी क्षेत्र ठंडे बने रहते हैं। लेकिन जब बर्फ पर काले प्रदूषण कण जम जाते हैं तो उसकी परावर्तन क्षमता कम हो जाती है। इसके बाद बर्फ सूरज की गर्मी को अधिक मात्रा में सोखने लगती है जिससे ग्लेशियर तेजी से गर्म होकर पिघलने लगते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदूषण के स्तर पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया तो हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भविष्य में जल संकट, बाढ़ और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है। यह अध्ययन नीति निर्माताओं और पर्यावरण एजेंसियों के लिए भी गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
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