मध्‍य प्रदेश की राजनीति का एक घटनाक्रम चर्चा में है। हाईकोर्ट ग्‍वालियर ने विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्‍होत्रा का चुनाव शून्‍य घोषित कर दूसरे नंबर के प्रत्‍याशी बीजेपी के रामनिवास रावत को विधायक घोषित कर दिया है। हालांकि, इस फैसले के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील का समय देते हुए हाईकोर्ट ने 15 दिन तक अपने आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि मुकेश मल्होत्रा ने नामांकन पत्र और चुनावी शपथ पत्र में गलत व अधूरी जानकारी दी थी, जो चुनाव आयोग के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।  इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई। विजयपुर सीट हाईप्रोफाइल सीट है क्‍योंकि यहां से विधायक चुने गए रामनिवास रावत के कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में चले गए थे। विधायक के दल बदलने के कारण उपचुनाव हुए थे। इस उपचुनाव में आदिवासी समाज के मुकेश मल्‍होत्रा ने रामनिवास रावत को हरा दिया था। अब कोर्ट ने मल्‍होत्रा के चुनाव को शून्‍य घोषित कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। 
इस फैसले से विजयपुर क्षेत्र में नहीं बल्कि करीबी दतिया विधानसभा क्षेत्र में भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दतिया में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्‍तम मिश्रा को हराया है। आर्थिक धोखाधड़ी के एक मामले में विधायक राजेंद्र भारती के लिए खिलाफ भी एक प्रकरण दिल्‍ली न्‍यायालय में विचाराधीन है। पूर्व गृहमंत्री नरोत्‍तम मिश्रा के समर्थकों को आस बंध गई है कि दिल्‍ली कोर्ट में सुनवाई अंतिम चरण में है और वहां का फैसला नरोत्‍तम मिश्रा के पक्ष में आ जाए तो उन्‍हें बैठे बिठाए विधायकी मिल जाएगी और एक पल में दुर्दिन दूर हो जाएंगे।

हारे हुए बीजेपी नेताओं के लिए हरि नाम 

कहते हैं अंधा क्‍या चाहे दो आंखें। एमपी बीजेपी के कई वरिष्‍ठ नेता इन्‍हीं दो आंखों यानी पद के इंतजाम में जमीन-आसमान एक कर रहे हैं। हारे को तो हरि का सहारा है लेकिन एमपी बीजेपी के हारे हुए नेताओं को पद का सहारा नहीं मिलेगा। अपना राजनीतिक वर्चस्‍व बचाए रखने की जुगत लगा रहे इन नेताओं के लिए दिल तोड़ने वाली यह बात बीजेपी प्रदेश अध्‍यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कही है। पार्टी की ओर से नामों पर लगभग सहमति बन चुकी है, बस अब केंद्रीय नेतृत्व की अंतिम मुहर का इंतजार है।

यह जानकारी देते हुए मीडिया से अनौपचारिक चर्चा में प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने साफ कह दिया है कि हारे हुए नेताओं को निगम मंडल में पद नहीं दिए जाएंगे। पार्टी इस बार उन  कार्यकर्ताओं को मौका देना चाहती है जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं, और जिनकी छवि जमीनी काम करने वाले नेता की रही है। यानी, टिकट नहीं मिला या चुनाव हार गए इसका मतलब यह नहीं कि सीधे निगम-मंडल में जगह मिल जाएगी। ऐसा हुआ तो नरोत्‍तम मिश्रा, रामपाल सिंह, इमरती देवी, कमल पटेल, अरविंद भदौरिया जैसे नेताओं के अरमान पर पानी फिर जाएगा। 

कैबिनेट बैठक से गायब दो मंत्री कहां पाएंगे आसरा

मोहन सरकार की दो कैबिनेट बैठकों में लिए गए निर्णयों से ज्‍यादा चर्चा इन बैठकों में दो मंत्रियों की अनुपस्थित को लेकर है। मोहन कैबिनेट के दो कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तथा प्रह्लाद पटेल बीती दो कैबिनेट बैठकों में शामिल नहीं हुए हैं। 

इस अनुपस्थिति के भी अपने कारण है। यह माना जा रहा है कि अपेक्षाकृत जूनियर नेता मोहन यादव के नेतृत्‍व में काम करना कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल जैसे वरिष्‍ठ नेताओं के लिए अपने तरह का संकट है। जब बीजेपी नेतृत्‍व ने उज्‍जैन से विधायक डॉ. मोहन यादव को मुख्‍यमंत्री चुना था तब भी ये चर्चाएं आम थी कि सीनियर नेताओं के साथ तालमेल कैसे बैठेगा। माना यही गया कि केंद्रीय नेतृत्‍व की समझाइश के बाद ही इन दोनों नेताओं ने मंत्री बनना स्‍वीकार किया। तीसरे बड़े नेता नरेंद्र सिंह तोमर को विधानसभा अध्‍यक्ष बना कर संशय से बाहर निकाल लिया गया था। 

सरकार गठन के बाद ही राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों में दोनों वरिष्‍ठ मंत्रियों कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल की असहमतियां, नाराजगी और अपने विरोध रहे हैं। यह मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव को असहज कर देने वाली स्थिति है। ऐसे में शिकायतें दिल्‍ली तक पहुंची। बीते माह मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव और बीजेपी प्रदेश अध्‍यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने दिल्‍ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इसके ठीक बाद अमित शाह के कार्यालय से दोनों वरिष्‍ठ मंत्रियों कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल को दिल्‍ली बुलाया गया था। 

दिल्ली में अमित शाह के साथ हुई बैठक के बाद से दो वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल लगातार दो बार से कैबिनेट बैठक में शामिल नहीं हुए हैं। जबकि वे इस दौरान कहीं अधिक जरूरी कार्य में व्यस्त भी नहीं थे। संकेत हैं कि मोहन सरकार में जारी तनाव को कम करने के लिए अब दोनों मंत्री कहीं और आसरा पाएंगे। यह आसरा केन्द्रीय संगठन भी हो सकता है। कहा यही जा रहा है कि बीजेपी की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी में मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ नेताओं को जगह मिलने वाली है। मगर पार्टी ने युवाओं को आगे लाने का अपना अभियान जारी रखा तो फिर ये नेता मन मार कर ही सही लेकिन कुछ दिनों बाद कैबिनेट में दिखाई देंगे।  

आदिवासी राजनीति चमकाने का मौका
आपदा में भी अवसर निकाल लेना कुशल राजनीति का गुण है। एमपी कांग्रेस के पास अवसर है कि मुकेश मल्होत्रा की विधायकी जाने को अवसर बना कर बीजेपी के आदिवासी वोट में सेंध लगा ले। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने इस मामले में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। जीतू पटवारी ने कहा कि यह पूरा मामला बीजेपी की खरीद-फरोख्त और उसके 'चाल, चरित्र और चेहरा' को उजागर करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की सोच आदिवासी विरोधी है और पार्टी को यह नागवार गुजरा कि विजयपुर से एक आदिवासी विधायक विधानसभा तक कैसे पहुंच गया। उन्होंने आदिवासी समाज से जुड़े बीजेपी सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं से भी सवाल किया कि क्या वे इस फैसले को सही मानते हैं। 

इसके समानांतर मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासियों के लिए अलग 'धर्म कोड' की मांग उठाकर नया राजनीतिक दांव चल दिया है। अनूपपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उमंग सिंघार ने आदिवासी समाज से अपील की है कि वे अपनी पहचान बचाने के लिए एकजुट हों और देश के सर्वोच्च पदों तक अपनी आवाज पहुंचाएं। उमंग सिंघार ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर आदिवासी समुदाय को अन्य धर्मों के अंतर्गत गिना जाता रहा, तो उनकी विशिष्ट पहचान हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने तर्क दिया कि आदिवासियों की अपनी अलग परंपराएं और संस्कृति हैं, जिन्हें सुरक्षित रखने के लिए जनगणना में अलग धर्म कोड मिलना अनिवार्य है। सिंघार ने प्रदेश भर के आदिवासियों से आह्वान किया कि मध्यप्रदेश से कम से कम 50 लाख आवेदन राष्ट्रपति को भेजे जाने चाहिए ताकि यह संदेश स्पष्ट रूप से केंद्र तक पहुंचे। 

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में 21.1 प्रतिशत लगभग 2 करोड़ आदिवासी आबादी है। 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य आदिवासी-बहुल सीटों को अपनी तरफ करना है। आदिवासियों को साधने के लिए आक्रामक रुख अपना कांग्रेस ने आदिवासी कांग्रेस का गठन कर अपने इरादे साफ किए हैं। अब मौका है कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास, अधिकारों के हनन और आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ माहौल बना रही कांग्रेस नए मुद्दे को लेकर मैदान में निरंतर सक्रिय रहे और इस माहौल को चुनाव परिणाम तक बना कर रखे।