आधुनिक विकास के तमाम-ओ-तमाम खटरागों की तरह हमारे यहां खेती भी दिनों-दिन बदहाल होती जा रही है। कमाल यह है कि इस बदहाली को समाज, सरकार और सेठ की हैसियत के नागरिक विकास मानते और जपते रहते हैं। सवाल यह है कि क्या मौजूदा तौर-तरीकों से खेती की जाती रही तो वह कब तक बच पाएगी? और क्या यह संकट इंसानों के वजूद को ही प्रभावित नहीं करेगा?
 
देश की उपजाऊ मिट्टी में रसायनों का जहर घुल रहा है। खेत बंजर होते जा रहे हैं। ‘केंद्रीय कृषि मंत्रालय’ की ताज़ा रिपोर्ट (2025-26) में खुलासा हुआ है कि सर्वाधिक ‘डीएपी’ (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की खपत वाले देश के शीर्ष 100 जिलों में मध्य प्रदेश के 11 जिले शामिल हैं। यानी रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में मध्य प्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया है। 
 
इस सूची में मध्य प्रदेश के अधिकांश जिले वे हैं, जहां ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती होती है। विशेषकर नर्मदा किनारे के जिलों में ‘डीएपी’ और ‘यूरिया’ की खपत सबसे अधिक है। नर्मदा क्षेत्रों में होशंगाबाद (नर्मदापुरम), सीहोर, हरदा और जबलपुर में मूंग की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का भारी उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में ‘नियंत्रक महालेखा परीक्षक’ (कैग) की रिपोर्ट बताती है कि 91 प्रतिशत किसानों को कृषि विभाग से उर्वरक संबंधी प्रशिक्षण या सलाह नहीं मिली। 
 
‘आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25’ के अनुसार, कृषि और संबद्ध क्षेत्र ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) में लगभग 16 प्रतिशत का योगदान करता है और 46 फीसदी से अधिक आबादी के लिए भरण-पोषण एवं आजीविका उपलब्ध करवाता है। इसके लिए प्रतिवर्ष लगभग 601 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरक और 55 से 60,000 टन रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। भारत दुनिया में उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ‘केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय’ की रिपोर्ट के अनुसार 1950-51 में भारतीय किसान मात्र सात लाख टन रासायनिक उर्वरक का उपयोग करता था। 
 
उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी कच्चा माल आयात करना पड़ता है। ‘यूरिया’ के कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ओमान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आता है। ‘डीएपी’ के मामले में अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ज्यादा है। ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ और प्रमुख जलमार्गों में व्यवधान के कारण ‘यूरिया’ और ‘डीएपी’ बनाने के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। 
 
उर्वरक आयात और प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों के कारण भारत सरकार पर सब्सिडी का बोझ तेजी से बढ़ा है। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2026 में कुल उर्वरक सब्सिडी 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। दूसरी तरफ, कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से न सिर्फ फसल प्रभावित होती है, बल्कि जमीन की सेहत और फसल खाने वाले इंसानों और जानवरों की सेहत के साथ ही पर्यावरण पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ता है।
 
अनाज और सब्जियों के माध्यम से लोगों के शरीर में पहुंचे जहर से तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ (सीएसई) की रिपोर्ट के मुताबिक रासायनिक खाद के बढ़ते इस्तेमाल के कारण देश की 30 फीसदी जमीन बंजर होने की कगार पर है। यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल ने नाइट्रोजन चक्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ‘नाइट्रस-ऑक्साइड’ एक ‘ग्रीनहाउस गैस’ है, जो जलवायु परिवर्तन के संकट को बढाने में बड़ा योगदान देती है। कीटनाशकों के प्रयोग से भूजल और पर्यावरण में जहर घुल रहा है। 
 
भारतीय कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है - 1967-68 में शुरू हुई ‘हरित क्रांति।’ इसकी मुख्य बात थी, सिंचाई की गारंटी के साथ अधिक फसल वाले बीजों, अधिक उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल। ‘हरित क्रांति’ के कारण देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो हो पाया, लेकिन 1980 के दशक से ‘हरित क्रांति’ भी संकट में फंस गई। खेती में बढ़ती लागत के कारण किसान कर्ज के दलदल में फंसकर आत्महत्या करने को विवश हो गए। यह स्थिति केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि आगामी पीढ़ियों के अस्तित्व का संकट है। 
 
भारत के सामने चुनौती है, पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्यता, बढ़ती जनसंख्या और कृषि क्षेत्र की मांगों के बीच संतुलन बनाने की, परन्तु इस दलदल से किसानों को निकालने के लिए जैविक खेती की ओर लौटना ही होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में धीरे-धीरे और सावधानी से कमी लाना संभव भी है और जरूरी भी। इस बदलाव को सफल बनाने के लिए जैव-उर्वरकों, जैविक-खाद, कंपोस्ट, नैनो उत्पादों जैसे विकल्पों और भविष्य में ग्रीन-अमोनिया का सहारा लेना होगा। 
 प्राकृतिक और ‘जैविक खेती’ ऐसी पद्धति है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उत्पादन बढ़ा सकती है। ‘प्राकृतिक खेती’ से कार्बन उत्सर्जन में 35% से 50% तक की कमी आ सकती है। ‘प्राकृतिक खेती,’ जिसे ‘नो-इनपुट’ या ‘जीरो-बजट’ खेती कहा जाता है, ‘बाहरी इनपुट’ (जैसे उर्वरक, कीटनाशक, यहां तक कि खाद) के उपयोग को कम या खत्म करने पर जोर देती है और इसकी बजाय प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैसे कि मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को प्रोत्साहित करती है। 
 
देश की खेती-किसानी को एक नया मोड़ देने के लिए केंद्र सरकार ने इस साल जून में एक बेहद खास कदम उठाया है। उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को देखते हुए, कृषि मंत्रालय ने 'खेत-बचाओ अभियान' की घोषणा की है। ‘केंद्रीय कृषि मंत्रालय’ और ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ की देखरेख में एक जून से 30 जून 2026 तक पूरे देश में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जा रहा है। इस अभियान का सबसे बड़ा और मुख्य उद्देश्य मिट्टी की घटती उपजाऊ शक्ति को बचाना और खेती में लगने वाली भारी-भरकम लागत को कम करना है। 
 
वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में शुरू की गई ‘पीएम-प्रणाम योजना’ का उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने के लिए राज्यों को पुरस्कृत करना है, जिसके तहत सब्सिडी से होने वाली बचत को स्थानीय विकास परियोजनाओं में लगाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों से आग्रह किया गया है कि वे उर्वरकों का विवेकपूर्ण उपयोग और कुशल वितरण सुनिश्चित करें। देश के लगभग 15 करोड़ किसानों में से केवल 40 लाख किसान ही जैविक खेती कर रहे हैं। इस क्षेत्र में अग्रणी राज्य मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान हैं। सिक्किम 2016 में ही पूरी तरह से जैविक खेती वाला राज्य बन गया है। 
 
‘किसान एवं कृषि कल्याण विभाग’ के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख टन जैविक उत्पाद तैयार हो रहे हैं। इसमें पांच लाख टन से अधिक जैविक उत्पाद निर्यात किया जाता है। भारत में जैविक उत्पादों की मांग और उत्पादन दोनों में वृद्धि हो रही है। भारतीय जैविक बाजार 16,800 करोड़ रुपये का है। देश में बढ़ती ‘डीएपी’ और ‘यूरिया’ की खपत संकेत देती है कि खेती धीरे-धीरे रासायनिक निर्भरता के ऐसे चक्र में फंसती जा रही है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होगा। यदि आज मिट्टी की उर्वरता, जैव-विविधता और किसानों की आर्थिक स्थिति को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)