भोपाल। एम्स भोपाल में दवाओं और मेडिकल सामग्री की खरीद को लेकर सामने आई आंतरिक रिपोर्ट ने सरकारी खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमृत फार्मेसी से मिली कुछ वस्तुओं की सप्लाई दरें संस्थान के अन्य अनुबंधित सप्लायरों की दरों से कई गुना अधिक थी। सबसे बड़ा अंतर 200 सेंटीमीटर लंबी हाई प्रेशर एक्सटेंशन ट्यूब की कीमत में दर्ज किया गया। इसकी एक अनुबंधित दर 14.27 रुपये थी। जबकि, अमृत फार्मेसी की सप्लाई दर 943.49 रुपये दर्ज की गई। यानी दोनों दरों में 929.22 रुपये का अंतर था और अमृत की दर करीब 66 गुना अधिक थी। इसी बीच एम्स भोपाल में खरीद का बजट भी साल 2022-23 के 145 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 245 करोड़ रुपये पहुंच गया है। इन आंकड़ों के बाद खरीद की दरों, खर्च की निगरानी और जिम्मेदारी तय करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

एम्स भोपाल की 31 मई 2025 की तुलनात्मक रिपोर्ट में दवाओं, इंजेक्शन और मेडिकल उपकरणों की कीमतों का मिलान संस्थान के दूसरे सप्लायरों के रेट कॉन्ट्रैक्ट से किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, कई वस्तुओं के मामले में अमृत फार्मेसी की सप्लाई दर और अन्य अनुबंधित दर के बीच बड़ा अंतर मिला। दवाओं में टेरलिप्रेसिन इंजेक्शन की अनुबंधित दर 22.33 रुपये के मुकाबले अमृत फार्मेसी की दर 649.56 रुपये दर्ज की गई। इनकी कीमत में 627.23 रुपये का अंतर था जो करीब 2,809 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह जेंटामाइसिन इंजेक्शन की दर 3.63 रुपये के मुकाबले 64.87 रुपये, एसाइक्लोविर की दर 19.76 रुपये के मुकाबले 327.60 रुपये और आयरन सुक्रोज की दर 14.49 रुपये के मुकाबले 144.14 रुपये दर्ज की गई।

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रिपोर्ट में मेथरजिन, नियोस्टिगमीन मिथाइल सल्फेट इंजेक्शन, थायमिन एचसीएल, फॉस्फोमाइसिन सोडियम और सेफोपेराजोन इंजेक्शन की दरों में भी अंतर दर्ज किया गया। इसके अलावा पाइपेरासिलिन टैजोबैक्टम, रोक्युरोनियम, डेक्समेडेटोमिडिन, वैसोप्रेसिन और ऑक्ट्रियोटाइड जैसी दवाओं की कीमतों में भी उल्लेखनीय अंतर सामने आया। मेडिकल सामग्री में शिशुओं को दूध पिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फीडिंग ट्यूब, स्टेराइल सर्जिकल गाउन और थोरैसिक ड्रेनेज कैथेटर भी शामिल थे। रिपोर्ट में थोरैसिक ड्रेनेज कैथेटर के अलग-अलग विवरणों के साथ कई प्रविष्टियों में दरों का अंतर दर्ज किया गया है।

दवाओं और मेडिकल सामग्री की कीमतों को लेकर शिकायतें मिलने के बाद एम्स भोपाल के तत्कालीन निदेशक प्रो. डॉ. अजय सिंह के निर्देश पर तुलनात्मक जांच शुरू की गई थी। इसके लिए 15 अप्रैल 2025 को समिति गठित हुई थी। समिति ने अमृत फार्मेसी की सप्लाई दरों का संस्थान में अन्य सप्लायरों के रेट कॉन्ट्रैक्ट से मिलान किया और 31 मई 2025 को रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट में दर्ज अंतर के बाद यह सवाल उठा कि क्या अधिक दरों पर हुई खरीद की वित्तीय समीक्षा की गई थी और क्या संबंधित सप्लायरों या अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई। 

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, रिपोर्ट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों को भी भेजी गई थी। हालांकि, इस पर क्या कार्रवाई हुई इसकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि रिपोर्ट में दर्ज दरों का अंतर अपने आप में अनियमितता या भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है। उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता, पैकिंग, सप्लाई की शर्तों और अन्य संबंधित पहलुओं की जांच के बाद ही खरीद की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी में ऐसे सभी पहलुओं के विस्तृत निष्कर्ष सामने नहीं आए हैं।

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एम्स भोपाल की स्थायी वित्त समिति (एसएफसी) की जनवरी 2026 में हुई बैठक में संस्थान के खरीद बजट में बढ़ोतरी का मुद्दा भी सामने आया। बैठक में दर्ज जानकारी के अनुसार, साल 2022-23 में खरीद का बजट 145 करोड़ रुपये था। जो साल 2024-25 में बढ़कर 245 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह दो वित्तीय वर्षों के दौरान बजट में 100 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। समिति ने बढ़ते खर्च पर ध्यान देते हुए अधिकारियों को व्यय कम करने की सलाह दी है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बजट में हुई बढ़ोतरी के कारणों की जांच किए जाने का उल्लेख नहीं है।

यह स्पष्ट नहीं है कि इस वृद्धि में दवाओं और मेडिकल सामग्री की कीमतों का कितना योगदान था या अन्य मदों में खर्च बढ़ने की क्या भूमिका रही। रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई थी कि यदि दवाओं और मेडिकल सामग्री की खरीद अधिक दरों पर होती है तो इसका असर आयुष्मान भारत योजना के तहत निर्धारित पैकेज की वित्तीय व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसके अलावा गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित बजट पर भी दबाव बढ़ने की चिंता व्यक्त की गई थी।

एम्स भोपाल के वर्तमान मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता ने बताया कि उनके पद संभालने के बाद इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि अमृत फार्मेसी को एल-1 दरों पर दवाएं और मेडिकल सामग्री उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, एम्स अपने स्तर पर भी रेट कॉन्ट्रैक्ट कर रहा है। आगे अमृत फार्मेसी से खरीद को सीमित रखते हुए केवल आपात परिस्थितियों में ही वहां से सामग्री लेने की व्यवस्था रखी जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य खरीद के लिए निर्धारित दरों के आधार पर आपूर्ति सुनिश्चित करना है।

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मामले में तत्कालीन मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. शशांक पोरवाल से भी संपर्क किया गया। उन्होंने कहा कि अब वह इस पद पर नहीं हैं और इस विषय में वर्तमान मेडिकल सुपरिंटेंडेंट से बात की जानी चाहिए। वहीं, अमृत फार्मेसी के मध्य प्रदेश प्रभारी नरेंद्र धाकड़ ने कहा कि उन्हें संबंधित रिपोर्ट की जानकारी नहीं है। उन्होंने रिपोर्ट देखने के बाद ही इस पर कोई टिप्पणी करने की बात कही।

रिपोर्ट पर हुई कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की स्थिति जानने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव विजय नेहरा को आधिकारिक ईमेल भेजकर सवाल किए गए। हालांकि, तक मंत्रालय की ओर से जवाब नहीं मिला। जवाब मिलने पर संबंधित जानकारी शामिल किए जाने की बात कही गई है। इस मामले में अब प्रमुख सवाल यह हैं कि तुलनात्मक रिपोर्ट में सामने आए दरों के अंतर की विस्तृत जांच हुई या नहीं, खरीद के दौरान कीमतों में अंतर के कारणों का आकलन किस स्तर पर किया गया और क्या वित्तीय जिम्मेदारी तय करने के लिए कोई कदम उठाया गया।