मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची के SIR से जुड़े फैसलों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल कुछ मामलों में अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति या बहुमत के बिना किया गया है। याचिका में ज्ञानेश कुमार को व्यक्तिगत रूप से ऐसे अधिकारों का प्रयोग करने से रोकने और मामले के लंबित रहने तक उन्हें CEC के कार्यों से निलंबित करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति जताई है।

याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है। इसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के साथ आयोग के तीन सदस्यीय ढांचे में फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि कथित तौर पर आयोग की सामूहिक शक्तियों का अकेले इस्तेमाल करने के मामले में ज्ञानेश कुमार से यह पूछा जाए कि उन्होंने किस अधिकार के तहत ऐसा किया। इसके लिए quo warranto प्रकृति की रिट जारी करने की मांग की गई है।

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याचिका में नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कम से कम 14 मौकों पर लिखित आपत्तियां या असहमति दर्ज किए जाने का दावा किया गया है। याचिका के अनुसार, ये आपत्तियां SIR, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटा के प्रबंधन तथा संबंधित तकनीकी प्रक्रियाओं से जुड़े फैसलों को लेकर थी। कुछ रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में यह आरोप भी शामिल था कि कुछ कदम दोनों आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना उठाए गए हैं।

याचिका में निर्वाचन आयोग की बहु सदस्यीय व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को दिए गए अधिकार किसी एक पदाधिकारी के व्यक्तिगत अधिकार नहीं हैं। याचिकाकर्ता ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया है। जिसमें आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति और मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय की व्यवस्था है।

मामले का एक प्रमुख हिस्सा मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव से जुड़ा है। याचिका में आरोप है कि SIR के दौरान ECINet/ERONet पोर्टल पर Form-6 में ऐसी अतिरिक्त जानकारी मांगी गई जिसका संबंध आवेदक या उसके रिश्तेदारों की पिछली SIR सूची में मौजूदगी से था। याचिकाकर्ता ने इन बदलावों को हटाकर मूल वैधानिक Form-6 बहाल करने की मांग की है।

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याचिका में SIR से जुड़े एकतरफा फैसलों, निर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को भी अमान्य घोषित करने की मांग की गई है। इसके साथ मतदाता सूची और चुनावी डेटाबेस में हुए बदलावों की स्वतंत्र जांच के लिए SIT गठित करने तथा तकनीकी, फॉरेंसिक और प्रशासनिक स्तर पर जांच कराने का अनुरोध किया गया है।

निर्वाचन आयोग ने दूसरी ओर इन आरोपों और याचिका में लगाए गए निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया है। आयोग का कहना है कि किसी निर्वाचन आयुक्त की ओर से किसी प्रस्ताव पर टिप्पणी या आपत्ति दर्ज करना अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। ECI के अनुसार, उसके निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत आयोग की मंजूरी से लिए जाते हैं और SIR से संबंधित फैसले भी आयोग के स्तर पर स्वीकृत हुए हैं। हाल में आयोग ने तीनों आयुक्तों की बैठक के बाद Form-6, मतदाता डेटा और IT सिस्टम से जुड़े कई मुद्दों पर फैसले भी घोषित किए।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई राहतों पर अभी कोई अंतिम न्यायिक फैसला नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी है और अगली सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष होने की जानकारी सामने आई है। अदालत अब यह देखेगी कि याचिका में उठाए गए सवालों पर किस सीमा तक न्यायिक हस्तक्षेप किया जा सकता है।

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