नर्मदा नदी में रेत खनन की समस्या को अरावली पर्वतमाला में हुए खनन के अनुभव के संदर्भ में समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि अरावली आज हमारे सामने एक चेतावनी के रूप में खड़ी है। दोनों ही मामलों में प्रकृति के साथ वही भूल दोहराई जा रही है, “विकास” के नाम पर पारिस्थितिक आत्महत्या। 

अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका काम भूजल को रिचार्ज करना, मरुस्थलीकरण को रोकना, जैव विविधता का संरक्षण और स्थानीय जलवायु संतुलन को बनाए रखना है। लेकिन अवैध और अंधाधुंध खनन ने इसे लगभग नष्ट कर दिया है। अरावली में खनन के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट, धूल और प्रदूषण से श्वसन रोग,
वन्यजीवों का पलायन, मरुस्थलीकरण का विस्तार और प्राकृतिक पहाड़ियों का समतलीकरण हो गया। 

नर्मदा में रेत खनन की वही कहानी दोहराई जा रही है। रेत नदी की रीढ़ होती है, जो नदी के तल को स्थिर रखती है और जलीय जीवों का आवास एवं भूजल रिचार्ज की कुंजी है। लेकिन जब रेत को मशीनों से निकाला जाता है, तो नदी की आत्मा ही खत्म हो जाती है। नर्मदा नदी में अनियंत्रित और अवैध रेत खनन से पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर नुकसान हो रहा है। इसके प्रमुख प्रभावों में नदी तल का कटाव, भूजल स्तर में गिरावट, जलीय जीवों (विशेषकर महाशीर मछली) के आवास का विनाश, मछुआरों की आजीविका पर संकट, और नदियों में गाद जमा होने से बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। 

अवैध खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह और तल का आकार बदल रहा है। नदी तल के क्षरण से जल स्तर नीचे जा रहा है। नदी के पानी का स्तर कम होने से आसपास के क्षेत्रों में भूजल स्तर गिर रहा है, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। नर्मदा में रेत खनन के प्रभाव को अरावली से तुलना करने से पता चलता है कि अरावली खनन से पहाड़ खोखले हुए तो नर्मदा रेत खनन से नदी का तल गहरा हुआ। अरावली में जल स्रोत सूखे तो नर्मदा किनारे के कुएं और हैंडपंप सूख गए। अरावली में मरुस्थलीकरण बढ़ा तो नर्मदा नदी का तट कटाव बढ़ा है। अरावली में वन्यजीवों का संकट बढ़ा तो नर्मदा में मछलियां, कछुए नष्ट हो गए। 

अरावली में स्थानीय किसान एवं पशुपालकों का आजीविका खत्म हुआ तो नर्मदा में मछुआरे और किसान प्रभावित हो रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अरावली में पहाड़ मरे, नर्मदा में नदी मर रही है। खनन के अतिरिक्त बांधों के कारण नर्मदा का प्रवाह रूकने और प्रदूषण भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। रेत खनन इस संकट को तीन गुना बढ़ा देता है। बांधों से गाद रुकती है और रेत खनन से नदी खुद को भर नहीं पाती है। नतीजा नदी स्थायी रूप से कमजोर हो रही है। 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने नदी तल से मशीन द्वारा खनन प्रतिबंधित किया, सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण स्वीकृति अनिवार्य किया और खनिज नियम सीमित और नियंत्रित खनन की अनुमति देता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि रात में जेसीबी और पोकलेन का इस्तेमाल कर रेत खनन किया जा रहा है। प्रशासनिक चुप्पी और स्थानीय विरोध को अनसुना किया जा रहा है। ठीक वैसा ही, जैसा अरावली में दशकों तक होता रहा। 

अरावली से हमने नहीं सीखा, तो नर्मदा घाटी में जल संकट होगा, खेती पर गहरा असर, धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था को आघात, बाढ़ और कटाव की तीव्रता और भविष्य में नदी पुनर्जीवन असंभव होगा। इसलिए अरावली को दर्पण बनाकर नर्मदा को बचाना होगा। नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं,जीवनदायिनी है,सांस्कृतिक धरोहर है और मध्य भारत की जल-रेखा है। यदि आज रेत खनन नहीं रुका, तो आने वाली पीढ़ियां नर्मदा को किताबों और तस्वीरों में ही देखेंगी, ठीक वैसे ही जैसे आज अरावली की हो गई है।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं।)