पर्यावरण के साथ पूंजी के संबंध मामले में पहले की तमाम बुराइयां आज उन क्षेत्रों में प्रकट हो गयी है जिन्हें आमतौर पर "पर्यावरण संकट" कहते हैं, जिसके अंतर्गत ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन सतह का ध्वंस, उष्णकटिबन्ध के जंगलों का विनाश, मछलियों का बेतहाशा मरना, प्रजातियों का विलोप, जैव विविधता का नुकसान, वातावरण और भोजन में घुलता जहर, मरूस्थलीकरण, जलापूर्ति का सिकुङना,साफ पानी का अभाव और रेडियो एक्टिव प्रदुषण शामिल हैं। इसलिए पर्यावरण संबंधी जिन दशाओं के मानव समाज पर सर्वाधिक प्रत्यक्ष प्रभाव पङते हैं, उनको लेकर आर्थिक विकास की योजना इस तरह बनाने की जरूरत होती है ताकि उसमें जल संसाधन और उनके विस्तार,साफ पानी की उपलब्धता, संसाधनों का वितरण और संरक्षण, कचरे का निबटारा तथा आबादी और औधौगिक परियोजना के लिए चुने गये विशेष स्थान से संबंधित पर्यावरण प्रभाव जैसे कारकों को देखते हुए बजट बनाना ज्यादा प्रासंगिक है।

बजट केवल आंकड़े और योजनाएं प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि वे विकास की एक गहरी अवधारणा को भी प्रतिबिंबित करती है कि विकास क्या है और देश आर्थिक वृद्धि कैसे हासिल करना चाहता है। बजट आवंटन इस बात को दर्शाता है कि किन चीजों को महत्व दिया जाता है, किसके हितों की रक्षा की जाती है और विकास की पारिस्थितिकी लागत कौन वहन करता है। ऐसे समय में जब जलवायु संकट, पर्यावरण का क्षरण और सामाजिक असमानताएं बढ़ती जा रही है, बजट का पारिस्थितिक परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण करना आवश्यक है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दो ऐसे लक्ष्य हैं जिनका संतुलन रखना आज सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है। 

विकास कार्यक्रम, बुनियादी ढांचा, रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि पर ज़ोर देना आवश्यक है, परंतु इसके साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से भारत का केंद्रीय राज्य है, जिसकी अर्थव्यवस्था कृषि, वन एवं खनिज संसाधनों पर आधारित है। राज्य में सूखा, अनियमित मानसून, बाढ़, हीट वेव और जंगल में आग जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष संकेत हैं। अतः 2026–27 का बजट केवल आर्थिक दस्तावेज न होकर जलवायु-जोखिम प्रबंधन का नीति-पत्र भी होना चाहिए था। 

मध्य प्रदेश सरकार ने 2026–27 का 4,38,317 करोड़ रुपए का बजट पेश किया है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मात्र 31 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के 39 करोड़ रुपए से लगभग 20 प्रतिशत कम है। बजट में सौर ऊर्जा, हरित ऊर्जा निवेश, ई-वाहन प्रोत्साहन जैसे उपायों पर जोर है।परंतु सूखा-प्रबंधन, वर्षा जल-संचयन, जलग्रहण विकास, जल-सरंक्षण आधारित कृषि, और जलवायु-लचीली फसलों पर व्यय तुलनात्मक रूप से कम दिखता है। जबकि राज्य की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। जलवायु जोखिमों के अन्तर्गत बुंदेलखंड में सूखा, नर्मदा-घाटी में बाढ़,आदिवासी क्षेत्रों में वन क्षरण के अनुसार बजट में स्पष्ट प्रावधान नहीं है। 

बजट में वनीकरण, कैंपा फंड उपयोग और वन्यजीव संरक्षण के प्रावधान तो हैं, लेकिन सामुदायिक वन प्रबंधन और ग्राम सभा आधारित संरक्षण पर अपेक्षित जोर नहीं है। खनन और अवसंरचना परियोजनाओं को दी गई प्राथमिकता वनों पर दबाव बढ़ाएंगी। विकास प्रधान मॉडल और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन स्पष्ट नहीं दिखता है। नर्मदा, ताप्ती, बेतवा जैसी नदियों के पुनर्जीवन कार्यक्रमों की घोषणा सकारात्मक पहल है। परंतु बड़े बांधों और नहर परियोजनाओं पर अधिक खर्च, छोटे जल-संरक्षण मॉडल जैसे तालाब, चेक-डैम, परंपरागत जल संरचनाएं की तुलना में ज्यादा है। विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के बजाय केंद्रीकृत ढांचे पर निर्भरता जलवायु लचीलापन कम कर सकती है। 

जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए विशेष बजटीय संरक्षण का अभाव है। बजट में स्मार्ट सिटी और शहरी अवसंरचना पर व्यय है, परंतु शहरी हरित क्षेत्र, जल निकासी सुधार और हीट एक्शन प्लान के लिए पृथक आवंटन स्पष्ट नहीं है। जब प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसम की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। प्रदेश में बढ़ते तापमान के कारण 2050 तक गेहूं उत्पादन में 6 से 23 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है। 2023 की तुलना में 2024 में गेहूं उत्पादन 33 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई, जो भारत में सबसे अधिक है। इसे नियंत्रित करने के लिए प्रभावी और ठोस कार्ययोजना का बजट में अभाव है। दूसरी ओर केंद्रीय बजट 2026-27 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को लगभग 3,759.46 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 8% अधिक है। पर विशेषज्ञों के अनुसार यह अभी भी भारत के विशाल पर्यावरणीय जोखिमों और आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त नहीं है। 

केंद्रीय बजट बुनियादी जीवाश्म ईंधन, खनन, और पारंपरिक अवसंरचना पर बजट में भारी ध्यान है, जबकि पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी लागतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। उच्च-कार्बन उद्योगों से आर्थिक निर्भरता हटाने में बजट कदम पर्याप्त नहीं हैं और अभी भी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर भारी निवेश हो रहा है। बजट का एक बड़ा हिस्सा “बङी इन्फ्रास्ट्रक्चर” पर केंद्रित है,यानी राजमार्गों, शहरों, बंदरगाहों और अन्य बड़े ढांचागत परियोजनाओं पर भारी खर्च करने का है। सरकार का दावा है कि इससे रोजगार सृजित होंगे और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। लेकिन जो बात अक्सर छूट जाती है, या जानबूझकर उल्लेख नहीं की जाती है। वह है इन परियोजनाओं का पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव। 

केंद्र की आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि विकास परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृतियां एक बाधा है, जबकि व्यवहार में सरकार द्वारा स्वीकृतियां अक्सर तेजी से दी जाती है। कुल मिलाकर, बजट ने अवसंरचना को इस तरह बढ़ावा दिया मानो उसके पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभाव महत्वहीन हों। जब जंगलों को बाधा के रूप में देखा जाता है, जब सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के बजाय लग्जरी ट्रेनों पर जोर दिया जाता है और जब समुद्री तटों को निजी कंपनियों को सौंप दी जाती हैं, तब हम केवल निर्माण नहीं कर रहे होते हैं बल्कि हम पर्यावरण और समुदायों को जोखिम में डाल रहे होते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण ने यह स्वीकार किया गया है कि केवल 37 प्रतिशत शहरी आबादी को सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है, लेकिन बजट में इसे सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं दिखता है। 

शहरों की कल्पना कारों और हवाई अड्डों से भरे भविष्य के रूप में की जा रही है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्थान (नीरी) नागपुर ने अपने अध्ययन में बताया है कि देश की 30 प्रतिशत भूमि में उत्पादकता समाप्त हो गई है। इसलिए किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करने के लिए निवेश की जरुरत है। जबकि कृषि बजट उर्वरक सब्सिडी पर केंद्रित रहता है। स्वस्थ भूमि संपन्न अर्थव्यवस्थाओं का आधार है, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का आधा से अधिक हिस्सा प्रकृति पर निर्भर है। फिर भी हम इस प्राकृतिक पूंजी को खतरनाक दर से नष्ट कर रहे हैं। इससे जैव विविधता का नुकसान होता है, सूखे का खतरा बढ़ता है और समुदाय विस्थापित होते हैं।मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा हमारे समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं करता है। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट बजट लाइन, समर्पित वित्तीय रणनीति और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करे, ताकि जलवायु कार्य योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और कमजोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान की जा सके।

(लेखक राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हुए हैं।)