“गद्दी हासिल करने की सात या दस वर्षीय योजनाएं बनाना एक मानी में गलत है। यह गद्दी हासिल करने पर और उनके जरिए भलाई करने पर अधिक जोर देती है। ये आदमी में गद्दी की भूख जगाती है जिसका नतीजा यह होता है कि आदमी के चरित्र में छोटी और स्वार्थी वृत्तियां कम नहीं होतीं और उसके तिकड़म और झूठ मिलकर ऐसे राजनीतिक काम किए जाते हैं, जिसमें जीत की संभावना दीख पड़ती है।”
डॉ. राम मनोहर लोहिया

भारतीय संसद के एक अंग "लोकसभा" का विशेष सत्र बुलाया गया नारी शक्ति वंदन अधिनियम को नए सिरे से पारित कर सन 2029 के आम चुनावों में उसे लागू करने के लिए, परन्तु क्या वास्तविक मंशा यही थी? गौरतलब है उपरोक्त विधेयक तो सितंबर-2023 में ही पारित हो गया था और उसे राष्ट्रपति की अनुमति या अनुमोदन भी प्राप्त हो गया था। तो इसके बावजूद पिछले तीन वर्षों में इसे लागू करने को लेकर क्या कार्यवाही हुई? होती भी कैसे यह कानून लागू हो ही नहीं सकता था, क्योंकि इस विधेयक के लागू होने की अधिसूचना 16 अप्रैल 2026 को जारी की गई। 

यानी वस्तुस्थिति यह है कि कानून के लागू होने से पहले ही उसमें बदलाव की जरूरत महसूस होने लगी। चूँकि संशोधन के लिए आवश्यक होता है कि सर्वप्रथम कानून को लागू किया जाए। जाहिर है यदि कानून लागू ही नहीं हुआ तो संशोधन के क्या मायने हैं। तो लोकसभा में जब संशोधन पर बहस शुरू हो गई तब अधिसूचना जारी की गई। इस “तत्परता” के बावजूद सरकार और भाजपा का मानना है कि इस अधिनियम के पारित होने में विपक्ष की रजामंदी नहीं है। गौरतलब है कि विपक्ष के प्रत्येक नेता ने चर्चा के दौरान कहा कि सन 2023 के विधेयक को लागू कीजिए, सभी साथ देंगे। 

परंतु....... सत्ताधारी और सत्ताधारी दल दोनों संभवतः यह भूल गए कि “संसद अभी चुनाव आयोग नहीं बन पाई है।“ भविष्य की बात तो कोई नहीं जानता। परंतु सन 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर लोकसभा में सदस्यों की संख्या 850 करने की मंशा सिर्फ सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं बल्कि आकांक्षा के “ययाति” हो जाने की ओर भी इशारा कर रही है। सत्ता को अनंत काल तक अपने कब्जे में रखने की आकांक्षा से आगे की चाहत है,शक्ति की अनंतता। कोई बाधा, कोई रोक-टोक, कोई असहमति, कोई विरोध स्वीकार्य न होने के अलावा किसी के मन में ऐसी कोई जिज्ञासा भी नहीं होनी चाहिए कि ये ऐसा क्यों होना चाहिए। “क्यों“ भारतीय राजनीति में आज वर्जित शब्द की तरह चुभने लगा है। 

वास्तविकता यह है कि अब साहब की “आकांक्षा” को ही “आदेश” मान लेना चाहिए। परंतु संविधान निर्माता “ययाति” की मानसिकता से परहेज रखने वाले थे, इसलिए उन्होंने कुछ मामलों में “दो-तिहाई” बहुमत की अनिवार्यता का प्रावधान कर दिया। वे जानते थे कि सत्ता में साधारण बहुमत जुटाना कमोवेश आसान है और दो तिहाई का अर्थ है, कमोवेश पूरे देश की सहमति। संसदीय लोकतंत्र का लचीलापन ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जिन लोगों ने कभी गुलेल चलाई होगी वो जानते हैं कि जिस गुलेल का रबड़ जितना लचीला होता है, उसकी मार उतनी ही घातक होती है। भारतीय संविधान भी अपने लचीलेपन की वजह से बेहद कारगर है।

घम्पपद में कहा है, "विवेक की, धर्म की, ज्ञान की एक बात ही भली, अविवेक की सैकड़ों बातें भी नहीं।"
धर्म का एक पद, ज्ञान की एक गाथा, मतलब की एक बात, बेमतलब की सैकड़ों बातों से अच्छी।

हमें विचार करना होगा कि लोकतंत्र में इतने व्यापक परिवर्तन की बात विवेकहीनता से कैसे हो सकती है? इन परिवर्तनों को सदन में रखने से पहले न कोई सर्वदलीय बैठक हुई। न मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन हुआ, जिसमें तय होता कि राज्य किस तरह से परिसीमन चाह रहे हैं। न ही राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई, जिसमें तय होता कि यह देश के अनुकूल है या नहीं। खोज का विषय तो यह है कि इस मामले पर केंद्रीय मंत्रीपरिषद और भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड में भी किसी तरह का कोई विमर्श हुआ था? एकाएक देश भर के अखबार नारीशक्ति वंदन अधिनियम के विज्ञापनों से भर गए और भाजपा सांसदों की आरती “उतारकर” उन्हें विमान से दिल्ली भेज दिया गया। 

मज़ेदार बात यह है कि “विजय” से पहले “विजय जुलूस” निकल गए और लड्डू भी सबने खा लिए। डॉ. लोहिया बड़ी मार्के की बात कहते हैं कि, “राजनीति में अनुशासन अन्दरूनी उतना ही होना चाहिए जितना बाहर हो। अनुशासित या स्थिर बुद्धि के आदमी की तुलना बहुत पहले एक स्मरणीय श्लोक में कछुए से की गई है, जो अपने शरीर के हिस्सों पर पूरा नियंत्रण कर सकता है, और उन्हें समेट सकता है। बाहरी उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अन्दरूनी अनुशासन बहुत जरूरी है।" 

अक्सर संघ व भाजपा आदि के अनुशासन की गौरव गाथाएं चाशनी में डुबोकर हमें परोसी जाती हैं। संगठन का अनुशासन और व्यक्ति का अन्दरूनी अनुशासन दो बेहद अलग-अलग स्थितियां हैं। अति आत्मविश्वास वस्तुतः आंतरिक अनुशासन के अभाव से ही उत्पन्न होता है। लोकसभा में विधेयक पर चर्चा चल रही है। चर्चा के बीच में हस्तक्षेप करते हुए गृह मंत्री कुछ नई स्थापनाओं को सामने रखते हैं, वे प्रत्येक राज्य में 50 प्रतिशत सदस्यों के बढ़ने की बात रखते हैं। 

यह बात सामने आने पर कि ऐसा प्रावधान प्रस्तावित कानून में है ही नहीं, वे कहते हैं, मुझे एक घंटे का समय दीजिए, मैं वह प्रावधान करवा देता हूं। क्या देश की राजनीति में होने वाले सबसे बड़े बदलाव को लेकर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और कानून मंत्री में कोई मंत्रणा ही नहीं हुई होगी? क्या गृह मंत्री ने प्रस्तावित कानून का अध्ययन ही नहीं किया होगा? वे अध्ययन करें या न करें, परंतु वह यह कैसे मान लेते हैं कि विपक्ष भी अध्ययन नहीं करेगा। वह आंखों में पट्टी बांध कर खाली स्थान पर हस्ताक्षर कर देगा?

संत ज्ञानदेव कहते हैं,
“बांधोनिया शिला पोहूं जाता सिंधु।
पावे अति मंदु मृत्यु शीघ्र।।"

अर्थात जो कमर में शिला बांधकर समुद्र पार करने जाएगा, वह अतिमंद शीघ्र मृत्यु का शिकार हो जाता है।“ दो तिहाई बहुमत की शिला कमर में बांधकर बिना किसी सहारे सहमति के मोदी सरकार लोकसभा को कैसे पार कर लेना चाहती थी? राजनीतिज्ञों में भी चालाकी और चालबाजी के बीच के अंतर को बनाए रखना होगा। अगर यह अंतर मिट गया तो वो भी मिट जाएंगे। कुछ बातें लगातार कौंधती हैं और बार-बार उनकी अभिव्यक्ति भी होती रहती है, जैसे नेपोलियन एक लोकक्रांति के बाद तानाशाह - स्वतंत्र सम्राट कैसे बन गया। वहीं जर्मनी में हिटलर का उदय लोक कल्याण की संभावनाओं को जगाकर हुआ और यह आज भी नए शोध का विषय है कि उसने कैसे स्वयं को कमोवेश भगवान की तरह शक्तिशाली बना लिया? वह 1933 में चुनकर आया। उसने नाजीवाद का सपना जर्मन जनता के सामने रखा और कहा कि यह पूरी तरह से साकार होगा एक हजार वर्ष में। 

वह यहीं नहीं रुका और बोला, “हमें भले ही एक हजार बरसों में मगर धरती को “यहूदी” जाति से विहीन करके आर्यों की धरती बनाना है। एक उदाहरण हमारे पडौसी पाकिस्तान का है जहाँ घृणा को जगाकर भुट्टो ने कहा था, “भारत से हमारी लड़ाई हजार बरसों तक चलेगी। हम सपना पूरा किए बिना दम नहीं लेंगे।" अभी अमेरिका के राष्ट्रपति की एक पूरी सभ्यता को नष्ट करने की बेशर्मी भरी धमकी हम सुन रहे हैं। उधर हंगरी में लोकतांत्रिक तानाशाही को नवीनतम प्रतीक के रूप में उभरे ओरबान की बेदखली इसी हफ्ते हुई है।

लोकसभा में जो सामने आया है, उससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संविधान और लोकतंत्र पर मंडरा रहा खतरा खत्म हो गया है। अभी इतना ही कहा जा सकता है कि यह कुछ समय के लिए टला भर है। इसे स्थायी बनाने के लिए जरूरी है कि जो एकता और आपसी सौहार्द विपक्ष ने लोकसभा में दिखाया है, उसकी उतनी ही शक्तिशाली अभिव्यक्ति व्यापक समाज में भी हो। हमें समझना होगा कि लोकतंत्र हमेशा एक निश्चित दिशा में धीमी गति से विचरण करता है। कई बार लगता है कि चलते-चलते उसका अपहरण हो गया है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अदृश्य होते हुए भी वह सतत प्रवाहमान बना रहता है। 

आपाधापी में सरकार यह भूल गई कि 850 सदस्यों को किस तरह समायोजित किया जाएगा? प्रश्नकाल में कितने प्रश्न लिए जाएंगे? वर्तमान सदस्य संख्या के चलते ही अनेक सदस्यों को बोलने का मौका नहीं मिल पाता। इसके अलावा यह भी सोचा जाना चाहिए कि लोकसभा के समानांतर “राज्यसभा” जो कि राज्यों का सदन कहलाता है, उसकी सदस्य संख्या भी क्यों नहीं बढ़ाई जाएगी? जो अभी प्रस्तावित किया गया था, उसके बाद तो राज्यसभा जैसे श्रीहीन हो ही जाती। संसद के संयुक्त सत्रों में लोकसभा का वर्चस्व होगा। राष्ट्रपति चुनाव भी पूरी तरह से लोकसभा आश्रित ही हो जाता है।

अमेरिकी इतिहासकार ग्रेन विल्ले ऑस्टिन ने अपनी पुस्तक, “The Indian Constitution : Cornerstone of a Nation” में बहुत महत्वपूर्ण स्थापना की है। वे भारतीय संविधान के गठन और कार्यशैली को लेकर लिखते हैं “संविधान सभा एक दल की इकाई थी और (भारत) अनिवार्यतः एक दल का देश था। संविधान सभा कांग्रेस थी और कांग्रेस ही भारत थी। इसमें एक तीसरा बिंदु भी है, जो त्रिकोण बनाता है। वह है सरकार, अर्थात प्रांत और केंद्र में चुनी हुई सरकारें, और कांग्रेस सरकार भी थी। कोई भी (व्यक्ति) जो किसी अन्य देश में एकाधिकारवादी राजनीतिक प्रणाली के चरित्र से पूरी तरह से अवगत और सजग हो, सहज ही समझ सकता है कि भारत में जनता के जबरदस्त समर्थन वाला दल एक कठोर और संकीर्ण रुख अपना सकता था और वह शक्तिशाली नेतृत्व सभी असहमतियों को चुप करा सकता था तथा नीतियां बनाने और निर्णय लेने का अधिकार कुछ ही लोगों तक सीमित कर सकता था।"

लंबी टिप्पणी के अंत में वे लिखते हैं, “उसके (कांग्रेस) पास अपार शक्तियाँ थीं। परंतु इसके बावजूद संविधान सभा पूर्णतया लोकतांत्रिक थी। भारतीय संविधान अनेकानेक लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है, न कि कुछ गिने-चुने लोगों की इच्छाओं की।" 

अतएव वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आएं उन्हें समझना होगा कि नए भारत की नींव मूलतः लोकतंत्र पर ही टिकी है जो कांग्रेस की देन है। आज जिस अधिनायकवादी प्रवृत्ति का प्रस्फुटन हम देख रहे हैं वह भारत की मूल आत्मा के अनुरूप नहीं है। संविधान संशोधन विधेयक का पारित न होना यह दर्शाता है कि जिन लोगों ने भारत के संविधान का निर्माण किया, वे वास्तव में दूरद्रष्टा थे। भारतीय जनता पार्टी अपनी प्रत्येक विफलता को सफलता की संकल्पना देती है। आज के अखबारों में भी नारीशक्ति वंदन के विज्ञापनों से अपने पृष्ठ अटे पड़े हैं। 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में संविधान के प्रति प्रतिबद्धता दिखा रही है। परन्तु इस प्रयास की सफलता तभी संभव होगी, जब प्रत्येक कार्यकर्ता स्वयं को इससे जोड़ेगा। स्वार्थपरक राजनीति में ऐसा हो पाना काफी कठिन है। अभी जनगणना का काम शुरू हुआ है। गांधीजी ने भी आजादी के पहले जनसंख्या से संबंधित प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक बार अपना धंधा “राजनीति” बताया था। 

जवाब सुनकर किसी ने कहा, "मगर बापू, राजनीति तो नीति की हद तक लापरवाह होती है।" कुछ दिन बाद उन्होंने एक भेंटवार्ता में कहा था, “मैंने जनसंख्या के आंकड़ों को इकट्ठा करने वाले उस भाई को अपना धंधा “राजनीति” ठीक ही बताया था। मैं लोगों के सुख-दुख सामने रखकर अपने काम करता हूँ। सच्ची राजनीति भी लोगों के सुख को बढ़ाने और दुख को कम करने का काम करती है। लोगों के कल्याण को ध्यान में रखकर अपनी गतिविधियों को चलाना पवित्र काम है। मेरे लिए तो वह धर्म ही है।" क्या भारतीय राजनीति धर्म का अनुसरण करेगी?

प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम संबोधन की आड़ में भयानक राजनीतिक बयानबाजी कर, उसे एक चुनावी भाषण में तबदील कर गए। आदर्श आचार संहिता के विधमान रहने के बावजूद चुनाव आयोग चुप है।