महाराष्ट्र के सांगली जिले की जाट तहसील के निगड़ी गांव में रहने वाले नवनाथ गोरे आज एक खेत मज़दूर हैं। अपना और अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दूसरों के खेतों में मज़दूरी करते हैं। इसके लिए भी उन्हें कई बार अपने घर से 25 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। इसके बाद भी ये तय नहीं होता कि उन्हें काम मिलेगा या नहीं। लेकिन अब से कुछ महीने पहले तक हालात ऐसे नहीं थे।

अब से करीब दो साल पहले नवनाथ गोरे को उनके पहले ही उपन्यास ‘फेसाटी' के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार मिला था। इससे वे अचानक ही मशहूर हो गए थे। तमाम मराठी चैनलों पर उनके इंटरव्यू प्रसारित किए गए। मराठी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुके नवनाथ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के बाद ही अहमदनर के एक कॉलेज में अस्थायी लेक्चरर की नौकरी भी मिल गई थी। अपने उपन्यास के नायक की तरह ही गरीबी और अभावों का मुकाबला करके शिक्षा हासिल करने वाले नवनाथ की जिंदगी शायद बेहतर दिनों की ओर बढ़ रही थी। लेकिन लॉकडाउन ने उनसे सबकुछ छीन लिया।

इस साल फरवरी के अंत में अपने पिता का निधन हो जाने के बाद नवनाथ गोरे गांव गए थे। लेकिन वे काम पर लौटते उससे पहले ही मोदी सरकार ने देश भर में लॉकडाउन का एलान कर दिया। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले का वह कॉलेज भी बंद हो गया, जहां पर नवनाथ गोरे मराठी के अस्थायी लेक्चरर थे। और अब एक बार फिर वे गरीबी और अभावों से जूझ रहे हैं। पिता का निधन होने के बाद मां और विकलांग बड़े भाई की जिम्मेदारी भी उनके ऊपर ही है।

32 साल के नवनाथ अप्रैल से ही खेतों में मजदूरी कर रहे हैं। अगर पूरे दिन काम मिला तो 400 रुपये तक कमा लेते हैं। आधे दिन का ही काम मिले तो कमाई भी आधी हो जाती है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह काम भी रोज़ मिल ही जाए।

नवनाथ को फिक्र इस बात की है कि खेतों में काम खत्म हो जाने के बाद कोई काम मिलेगा भी या नहीं? उन्हें पता नहीं कि अगर कोई काम नहीं मिला तो बुजुर्ग मां और दिव्यांग भाई का पेट वो कैसे भरेंगे? नवनाथ बताते हैं कि उनकी मां ही है, जिसने तमाम आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्हें पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन 4 घंटे के नोटिस पर किए गए लॉकडाउन ने हालात इतने बिगाड़ दिए हैं कि रोज़ी-रोटी कमाने में न तो उनकी शिक्षा किसी काम आ रही है और न ही साहित्य का पुरस्कार।